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साधना से सिद्धि मिलती है, इसमें दो राय नहीं हैं। सिद्धि वस्तुत: अपने आपको, अपनी अंतरात्मा को सिद्ध करने का ही दूसरा नाम है। साधना हम अपनी इन्द्रियों की, अपने मन, बुद्धि और चित्त की करते हें। इनके सध जाने पर अंत:करण परिष्कृत हो जाता है। परिष्कृत अंत:करण ही वह कल्पवृक्ष है, जिसकी छाया में बैठा हुआ व्यक्ति अपनी मनचाही मुरादें पूरी कराता रह सकता है। अस्तु, सिद्धियों का रहस्य अपनी आत्म- समीक्षा द्वारा आत्म परिष्कार का मार्ग बनाना है। मात्र कपोल कल्पनाओं का सहारा लेकर आत्म सुधार का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता और सही ढंग से की गई आत्म समीक्षा में अगर कोई कमी रह जाती है, तो उसे प्रयास करके प्राप्त किया जा सकता है। 
कर्मकाण्डों के बल पर भौतिक जीवन में भी प्रगति बन पड़ती है। बिना कुछ किए तो भोजन भी मुँह में नहीं जाता, पर यदि लक्ष्य ईश्वर को प्राप्त करना हो, तो मात्र कर्मकाण्डों के ही बल पर लक्ष्य को प्राप्त करना संभव न होगा। इसके लिए अपना आंतरिक परिष्कार ही करना पड़ेगा, अपने चिंतन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादी मान्यताओं को समाविष्ट करना पड़ेगा। 
आत्म निरीक्षण करते समय सर्वप्रथम शरीर और आत्मा को एक दूसरे से सर्वथा भिन्न अनुभव करना चाहिए। इसके बिना माया और ब्रह्म, स्थूल एवं चैतन्य के बीच का अंतर अनुभव कर पाना संभव नहीं है। जब तक चेतना अपने को शरीर और उसकी शुभ चिंतक मानती रही है, तब तक जीव, माया- जाल में बँधा रहता है। 
आत्म तत्त्व का भी शरीर के समान विकास संभव हो सके, इसके लिए आर्षग्रंथों से लेकर अनुभवी ऋषि- मुनियों ने जो मार्ग बताए हैं, उनमें प्रथम हैं तपश्चर्या। अर्थात् अपनी नियमित जीवनचर्या में हो रही त्रुटियों का कठोरतापूर्वक दमन। अभ्यास में, आदत में आ गई दुष्प्रवृत्तियाँ आसानी से पीछा नहीं छोड़ती। इसके साथ कठोरता का ही व्यवहार करना पड़ता है। तपश्चर्या रूपी कठोरता का यह अभिप्राय कदापि न लगाया जाय कि शरीर को पीड़ा या कष्ट देना ही तपश्चर्या है। यहाँ तपश्चर्या की कठोरता का अर्थ संकल्पपूर्वक एक सशक्त मनोबल का विकास करना है, जो दुष्प्रवृत्तियों से, अभ्यस्त कुपथगामी आदतों से मल्लयुद्ध करके उन्हें परास्त कर सके। इसी को आत्मिक परिष्कार भी कहा जा सकता है। 
दूसरा पक्ष श्रेष्ठता के प्रतिष्ठापन, अभिवर्धन का है। इसी को योगाभ्यास या उपासना भी कहा जाता है। उपासना अर्थात् इष्ट के समीप बैठना और योग का अर्थ जोडऩा है। अर्थात् संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊपर उठकर ईश्वर के साथ सम्पर्क जोडऩा। इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु ज्ञान, कर्म या भक्ति किसी भी मार्ग का अनुसरण किया जा सकता है। ध्यान यही रखा जाना चाहिए कि साधक का दृष्टिकोण समतामूलक और कार्य सर्वजन हिताय के होने चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य कोई शार्टकट रास्ता ईश्वर तक पहुँचने, उसके साक्षात्कार, तादात्म्य स्थापित करने का नहीं है। जो भी व्यक्ति अच्छे गुुरुओं के मार्गदर्शन की अभिलाषा रखते हों, उन्हें सर्वप्रथम इस आत्मशोधन प्रक्रिया का प्रारंभिक पाठ अभ्यास में लाना ही पड़ेगा। 
साधना प्रत्येक सफलताओं की अनिवार्य आवश्यकता है। साधना चाहे श्रम साधना से भौतिक सफलता प्राप्त करने की हो अथवा योगाभ्यास द्वारा आध्यात्मिक प्रगति की साधना, सबमें एक निष्ठ साधना आवश्यक है। 
  
गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज हरिद्वार 


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