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एक समय था जब अवांछनीयता व्यक्तियों या तत्त्वों को हटाने के लिए प्रधानतया शस्त्रबल से ही काम लिया जाता था, तब विचार-शक्ति की व्यापकता का क्षेत्र खुला न था। यातायात के साधन, शिक्षा, साहित्य, ध्वनि विस्तारक यंत्र, प्रेस आदि की सुविधाएँ उन दिनों न थीं और बहुसंख्यक जनता को एक दिशा में सोचने, कुछ करने या संगठित करने के लिए उपयुक्त साधन भी न थे। इसलिए संसार में जब भी अनाचार, पाप, अनौचित्य फैलता था, तब उसके निवारण के लिए, उस अनौचित्य के केन्द्र बने हुए व्यक्तियों की शक्ति को युद्ध द्वारा-शस्त्रबल से निरस्त किया जाता था। प्राचीनकाल में युग परिवर्तन की यही भूमिका रही है।
रावण, कंस, हिरण्यकश्यप आदि अनीतिमूलक वातावरण उत्पन्न करने वालों निरस्त करने के लिए जिन्होंने परास्त किया, उन महामानवों को अवतार, देवदूत आदि के सम्मानों से सम्मानित किया गया। भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान नृहसिंह आदि को इसी संदर्भ में सम्मानपूर्वक पूजा-सराहा जाता है। पिछले कई वर्षों में विज्ञान ने अद्ïभुत प्रगति की है। संसार की समस्याओं को नया स्वरूप दे दिया। संसार के सुदूरवर्ती देश अब यातायात सुविधा के कारण गली-मुहल्ले की तरह अत्यंत निकट आ गये। तारे और डाक ने जानकारियों का आदान-प्रदान सुलभ बना दिया। मीडिया ने ज्ञानवद्र्धक की अनुपम सुविधाएँ प्रस्तुत कर दीं। संसार की अनेक सभ्यताओं और विचारधाराओं ने एक-दूसरे को प्रभावित करना आरम्भ कर दिया। साथ ही ऐसे कई दूर तक मार करने वाले शस्त्रों का आविष्कार आरम्भ कर दिया, जिससे युद्ध केवल दो ही देशों के बीच सम्भव न रह गया। व्यक्तिगत लड़ाइयाँ तो सरकारी कानून के अन्तर्गत असम्भव हो गईं। आज किसी देश का प्रधानमंत्री भी किसी का वध कर डाले, तो उसे उचित सजा भुगतना ही पड़ेगा।
इसी प्रकार युद्ध भी अब इतने महँगे और जटिल हो गये, जिन्हें करने की हिम्मत सहसा पड़ती ही नहीं। पुराने जमाने में योद्धा लोग तलवार से एक दूसरे को सिर काट कर परस्पर निपट लेते थे, पर अब तो पूरे देश की समस्त जनता को प्रकारान्तर से अपने देश की युद्ध व्यवस्था में भाग लेना पड़ता है। युद्ध के अस्त्र-शस्त्र तथा क्रियाकलाप भी इतने महँगे हैं कि एक सैनिक को मारने में प्राय: हजारों रुपये खर्च पड़ जाता है। विजय सैन्य सफलता में ही नहीं, उसके पीछे अंतर्राष्टï्रीय गुटबंदी और सहायताएँ, सहानुभूतियाँ भी काम करती हैं। इस विज्ञान युग में पिछले दो युद्ध अनंत संहारक साधनों से लड़े गये, फिर भी उनसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ। वे समस्याएँ ज्यों की त्यों आज भी मौजूद हैं, जो इन युद्धों से पहले थीं और जिनके लिए ये युद्ध लड़े गये थे। 
कहने का तात्पर्य इतना भर है कि प्राचीनकाल में अनीति एवं अनुपयुक्त परिस्थितियों के मूल कारण बने हुए कुछ व्यक्तियों को निरस्त कर देने से वातावरण बदल जाता था, पर अब वैज्ञानिक प्रगति ने इस संभावना को समाप्त कर दिया। पहले कुछ शक्तिशाली शासक ही भला बुरा वातावरण बनाने के निमित्त होते थे। अब जनता के हर नागरिक को अपनी शक्तियाँ विकसित करने और उपयोग करने की ऐसी सुविधा मिल गई है कि वह स्वयं एक स्वतंत्र इकाई के रूप में समाज पर भारी प्रभाव छोड़ता है। अस्तु, अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होने के शाश्वत सत्य को ध्यान में रखते हुए, इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि विकृत मन:स्थिति ही एकमात्र वह कारण है, जिसने अनेकानेक संकटों के तूफान खड़े कर दिये हैं, अन्यथा जब पुराने समय में स्वल्प साधनों के रहते लोग हँसते-हँसाते, खिलते-खिलाते जीवन जीते रहे, तो अब साधन सुविधाओं की विपुलता होते हुए भी व्यक्ति को विपन्न और समाज को उद्विग्न स्थिति में दिन गुजारने का अन्य कोई कारण हो नहीं सकता। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार


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