img


व्यक्तित्व का गठन मूलत: विचारों पर निर्भर है। चिन्तन मन को ही नहीं, शरीर को भी प्रभावित करता है। मनोकायिक गड़बडिय़ाँ चिन्तन की गिरावट का ही परिणाम है। इस बात को प्राय: सभी मनोवैज्ञानिक एकमत से स्वीकार करते हैं। चिन्तन की उत्कृष्टता को अपनाने तथा उसे व्यावहारिक जगत में उतारने से ही भावनात्मक तथा सामाजिक समंजन प्राप्त हो सकना सम्भव है।
इस प्रकार के समंजन की सरल किन्तु सक्षम प्रक्रिया बता पाने में आधुनिक मन:शास्त्री असमर्थ पाये जाते हैं। मनोविज्ञानी की जाह्नवी का गोमुख सदृश उद्गम स्थल उपनिषद् है। उपनिषद् में ऋषियों ने इस प्रकार के भावात्मक एवं सामाजिक समंजन स्थापित करने राग- द्वेष आदि विरोधी भावों से उठने हेतु एक पूर्णतया सक्षम, सशक्त  प्रक्रिया उद्भूत की है जिसे ‘उपासना’ कहते हैं। 
नि:संदेह उपासना श्रेष्ठ चिन्तन एवं उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का सशक्त माध्यम है। मन की बनावट कुछ ऐसी है, वह चिन्तन के लिए आधार खोजता है। जैसा माध्यम होगा उसी स्तर का चिन्तन चल पड़ेगा तदनुरूप क्रिया- कलाप होंगे। निम्नस्तरीय चिन्तन वाले व्यक्ति के क्रिया- कलाप भी घटिया होना स्वाभाविक है। ऐसा व्यक्ति अपने जैसे दुराचारी- अनाचारी व्यक्ति विर्निमित करने में ही सहायक होगा, जबकि उच्चस्तरीय चिन्तन करने वाले संत- मनीषी महात्माओं के अनुरूप उनके क्रिया- कलाप भी उत्कृष्ट कोटि के होते हैं। तदनुरूप उनके सान्निध्य में रहने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भी उसी ढाँचे में ढलकर सुघड़ स्वरूप प्राप्त करता है। वर्तमान समय में श्रेष्ठ व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्तियों का अभाव है। बहुलता हेय, गये- गुजरों की है। इनसे सामाजिक समंजन की अपेक्षा करना एक विडम्बना है। इन परिस्थितियों में समस्या एक खड़ी होती है कि मानवी व्यक्तित्व को श्रेष्ठ कैसे बनाया जाय? विचार करने पर एक ही रास्ता दिखाई देता है- उपासना का अवलम्बन। 
उपासना से जुड़ी आदर्शवादी मान्यताएँ एवं प्रेरणायें ही चिन्तन को श्रेष्ठ एवं व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बना सकने में समर्थ हो सकती है। उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली- भाँति समझा जा सके, तो व्यक्तित्व निर्माण का सबल आधार मिल सकता है। उपासना का लक्ष्य है- व्यक्तित्व का परिष्कार। इसके निर्धारण से उससे जुड़े आदर्शों एवं उच्चस्तरीय सिद्धान्तों द्वारा उपासक को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उपास्य में तन्मय होने का अभिप्राय है उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धान्तों में लीन हो जाना और उनके अनुरूप आचरण करना। उपासना द्वारा निर्माण की यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस का माँ काली का दर्शन करना, महाप्रभु चैतन्य का श्रीकृष्ण से एकाकार हो जाना, स्वामी रामतीर्थ का ब्रह्मभाव में प्रतिष्ठित हो, अपने अस्तित्व को भूल जाना, उपासना की तन्मयता एवं उसकी प्रतिक्रियाओं का प्रभाव है। 
उपासना निराकार की करें या साकार की? इष्ट निर्धारण क्या हो? यह व्यक्तिगत अभिरूचि एवं मन:स्थिति के ऊपर निर्भर करता है। चिन्तन को लक्ष्य की ओर नियोजित किए रखने के लिए साकार अथवा निराकार कोई भी अवलम्बन किया जा सकता है। यह आवश्यक है और उपयोगी भी ।। इस प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए चिन्तन प्रवाह में आदर्शवादिता का जितना अधिक पुट होगा उसी स्तर की सफलता प्राप्त होगी। इष्ट से तादात्म्य और उससे मिलने वाले दिव्य अनुदानों से वह आधार बन जाता है जिससे उपासक अपने चिन्तन एवं गतिविधियों को श्रेष्ठता की ओर मोड़ सके। 
व्यक्ति के अध:पतन एवं चिन्तन- चरित्र व्यवहार की त्रिवेणी में बढ़ते जा रहे प्रदूषण को रोकने तथा इसको परिशोधन कर निर्मल परिष्कृत एवं ऊध्र्वगामी बनाने में उपासना की आवश्यकता ही नहीं अनिवार्यता भी है। पुरातनकाल के ऋषियों तथा आधुनिक काल के संतों ने इसका अवलम्बन कर स्वयं के व्यक्तित्व को सुघड़ बनाने के साथ ही समूची मानव जाति के समक्ष प्रकाश संकेतक के रूप में स्वयं को उभारा। आज भी भावनात्मक सामाजिक समंजन सर्वतोमुखी परिष्कार एवं समग्र प्रगति के सभी आधार इसमें विद्यमान हैं। समस्याओं की जटिलता से उबरने तथा अपने व्यक्तित्व को गढऩे के लिए यह राजमार्ग ही सर्वाधिक उपयुक्त है। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


Write Your Comments Here:


img

त्रिविध दु:खों का निवारण पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

समस्त दु:खों के कारण तीन हैं- अज्ञान, अशक्ति और अभाव। इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा। अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता.....

img

उच्च मानसिकता के चार सूत्र पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को.....

img

उचित- अनुचित की कसौटी पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

उचित-अनुचित का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना है, किधर नहीं इसका निर्णय करने की उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण.....