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किस दान की महिमा कब अत्यधिक बढ़ी- चढ़ी मानी जाती है? इसके उत्तर में एक ही बात कही जा सकती है कि जब जिस विपत्ति का अत्यधिक प्रकोप हो, तब उसके निराकरण का उपाय ही सर्वश्रेष्ठ दान है। प्यास से संत्रस्तों को पानी, भूख से तड़पतों को अन्न, अग्निकाण्ड का शमन करने के लिए जल, बाढ़ की चपेट से घिरों को नाव, दुर्घटनाग्रस्तों को अत्यधिक त्रास सहन करना पड़ रहा है। 
वर्तमान समय में आस्था संकट के रूप में और दुर्भिक्ष जन- जन के ऊपर प्रेत- पिशाच की तरह चढ़ा हुआ है। लोग बेतरह भूल- भुलैयों में भटक रहे हैं। दृष्टिकोण में ऐसी विकृति समा रही है कि उलटा सीधा और सीधा- उलटा दीखता है। कौरवों को नवनिर्मित राजमहल में प्रवेश करते समय जल में थल और थल में जल दीख पड़ा था। इस कारण वे मतिभ्रम में पड़े, दुर्गति को प्राप्त हुए और उपहासास्पद भी बने। 
इन दिनों जो चिन्तन, प्रचलन, व्यवहार एवं लक्ष्य अपनाया जा रहा है, वह लगभग उल्टे स्तर का है। हर किसी को आपाधापी पड़ी है। जो जितना भी, जिस प्रकार भी बटोर  सकता है, उसमें कमी नहीं रहने दे रहा है। साथ ही जो उपलब्ध है, उसका भोंडा उपयोग करने में ही अहंकार की पूर्ति मानी जा रही है। उद्दण्डता की समर्थता का पर्यायवाची बनने का प्रयत्न कर रही है। आदतों में घुसी पड़ी विकृतियाँ अशान्ति और उद्विग्नता को दिन- दिन बढ़ावा दे रही हैं। असंतोष, खीझ, थकान, निराशा के साथ- साथ आक्रमण और प्रतिशोध का कुचक्र ऐसा चल रहा है जिसका ओर- छोर कहीं दीख नहीं पड़ता। 
अपने समय में सबसे बड़ा अभाव और कष्ट यह है कि लोगों को मानवोचित स्तर पर सोच सकना और तदनुरूप क्रिया- कलापों को ढाल सकने में सफल होना कठिन जान  पड़ता है। पानी ढलान की ओर से सहज बह निकलता है, पर उसे ऊँचा उठाने में असाधारण कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इस सत्साहस के क्षेत्र में चरम सीमा की दुर्बलता छाई हुई है। भ्रष्ट चिन्तन अपनाते ही दुष्ट आचरण बन पडऩे का सिलसिला तेजी से चल पड़ता है। यही सामाजिक विकृतियों की उद्गम स्थली है। जहाँ उभरने वाला  प्रवाह अपने प्रभाव क्षेत्र में कीचड़ ही कीचड़ भरता है। पाचन तंत्र खराब हो जाने पर बढ़ती हुई विषाक्तता असंख्य आकार- प्रकार के रोग उत्पन्न करने लगती है। ठीक इसी प्रकार विकृत- चिन्तन का अन्धड़ उमड़ पडऩे पर आँखों में धूल भर जाती है और यथार्थता को सही रीति से देख पाना कठिन पड़ता है। 
सुधार का उपचार करना हो, तो एक ही उपाय अपनाना पड़ेगा कि कुविचारों के प्रभावों को मोड़ा और उसकी दिशाधारा को सदुद्देश्यों के साथ जोड़ा जाय। इतना बन पडऩे पर वह सब सरल हो जायेगा, जो इन दिनों अपेक्षित है। विचारों की गंदगी यथावत बनी रहने पर मनुष्य रच तो सज्जनता और उदारता के पाखण्ड भी सकता है पर उनके पीछे श्रेष्ठ आधार न होने पर रची हुई विडम्बना कागज की नाव जैसी अपनी असमर्थता प्रदर्शित करने लगती है। 
जगह- जगह परिस्थितियों और प्रचलनों के अनुरूप असंख्य प्रकार की अवांछनीयताएँ अनेक रूप में उभरती देखी जाती हैं। लोग स्वतंत्र समस्या समझकर सामयिक एवं  स्थानीय उपाय ही अपनाते हैं। इसका परिणाम आहात स्थान पर सुन्न करने वाले लेप लगा देने जैसा होता है। हाथों- हाथ तो कुछ सुधार दीख पड़ता है पर जैसे ही उस लेप का प्रभाव हलका होता है व्यथा ज्यों की त्यों फिर उभर आती है। इस खिलवाड़ में समय नष्ट करते रहने की अपेक्षा उपयुक्त यही है कि विचार- क्रान्ति का तूफानी सरंजाम जुटाया जाय और उसे इतना प्रबल बनाया जाय कि जो कुछ भी कचरा जहाँ भी गया है, वह अन्धड़ के साथ उड़ता और कहीं से कहीं पहुँचता जाता दिखाई पड़े। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज , हरिद्वार 


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