शांतिकुंज परिवार केदारनाथ त्रासदी के तुरंत बाद से राहत कार्यों में जुट गया था। तब से ही गायत्री परिवार के सैकड़ों कार्यकर्त्ता पहाड़ के विभिन्न क्षेत्रों में सर्वे व सेवा कार्यों में तन-मन-धन से राहत कार्य में लगे रहे। इसी क्रम में शांतिकुंज टोली केदारनाथ मंदिर व रामबाड़ा क्षेत्र के लिंचोली में नि:शुल्क लंगर चलाकर आज वापस लौट आयी। केदारनाथ मंदिर के निकट भोजनालय चलाने में महेश राठौर, दयाराम सित्ती कुमार आदि की टोली जुटी थी, तो वहीं लिंचोली में नरेन्द्र ठाकुर, काशीराम यादव, विक्रम मुजाल्दा का दल ने भोजन व्यवस्था की कमान संभाला था।शांतिकुंज लौटे कार्यकर्त्ताओं की कुशलता जानने के बाद उनका उत्साहवर्धन करते हुए गायत्री परिवार प्रमुख आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं संस्था की अधिष्ठात्री आदरणीया शैल जीजी ने कहा कि सुख बाँटना, दु:ख बँटाना, यही संत की सबसे बड़ी पहचान है। सामाजिक संवेदना मानवता की सच्ची परिभाषा है। हमारे ऋषि-मनीषी ज्ञानी तो थे ही, समाज की हर समस्या के समाधान के लिए भी सजग थे। व्यवस्थापक श्री गौरीशंकर शर्मा ने बताया कि पहाड़ में राहत कार्य के अंतर्गत जून के मध्य से चलाया जा रहा नि:शुल्क लंगर 5 नवंबर तक चलता रहा है। उन्होंने आगे भी आवश्यकतानुसार चलाये जाते रहेंगे।शांतिकुंज के भोजनालय में कबीना मंत्री श्री अजय भट्ट, रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी से लेकर एसडीएम, तहसीलदार आदि भोजन करने समय-समय पर पहुंचे तो केदारनाथ दर्शनार्थ आये स्विसजरलैंड, रूस, आस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि देशों के लोगों ने भी शांतिकुंज के भोजनालय में आकर अपनी क्षुधा मिटाई। प्रात: चाय, नाश्ता, और दोपहर व रात्रि कालीन भोजन के लिए भी बड़ी संख्या में स्थानीय लोग व केदारनाथ मंदिर के स्वच्छता अभियान में जुटे सैकड़ों लोग नियमित रूप से पहुँचते रहे। लोगों ने नियमित रूप से चावल, रोटी, दाल, सब्जी का आनंद लिया। लिंचोली में भोजनालय की व्यवस्था देख रहे नरेन्द्र ठाकुर ने बताया कि पहाड में इन दिनों बर्फ पड़ना भी प्रारंभ हो गया, तब उनकी जिंदगी की परीक्षा फिर शुरु हो गयी है। केदारनाथ मंदिर के निकट खाने खिलाने का कार्य संभालने वाले महेश राठौर ने बताया कि केदारनाथ दर्शनार्थ आने वाले श्रद्धालुओं व पुनर्वास कार्य कराने वाले प्रशासनिक अधिकारियों, मीडियाकर्मी, वैज्ञानिक, शोधार्थियों को नियमित रूप से भोजन कराते थे। उन्होंने बताया कि दोनों भोजनालय में औसतन 300 लोग नियमित रूप से भोजन करने आते थे।


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