img

‘साधना से सिद्धि’ का सूत्र भारत के ऋषि -मनीषियों की दिव्य अनुभूतियों से निकला है। युगऋषि ने इसे समय के अनुरूप नये स्वरूप में अपने निजी अनुभवों के आधार पर प्रस्तुत किया है। सिद्धि क्या है? इसे आम भाषा में लम्बे अभ्यास से उभरी उच्च स्तरीय कुशलता कह सकते हैं। संगीतकार उचित मार्गदर्शन में लम्बे समय तक संगीत साधना करते हैं तो वे उस विद्या में कुशल हो जाते हैं। कलाकार इसी प्रकार कला की साधना से कला में पारंगत हो जाते हैं। निरंतर साधना अभ्यास से सधे हुए व्यक्तियों को सिद्धहस्त कहा जाता है। अर्थात् वे इतने कुशल हो चुके हैं कि उनके द्वारा किया हुआ कार्य निश्चित रूप से श्रेष्ठ स्तर का ही होगा। जीवन साधना के संबंध में भी यही सूत्र लागू होता है। मानव जीवन ईश्वर द्वारा दी गयी तमाम श्रेष्ठ अनुपम विभूतियों से सम्पन्न है। शरीर की इंद्रियाँ और भीतर के अंग-अवयव, सभी अनोखी विशेषताओं से सम्पन्न हैं। इन्हें साधकर व्यक्ति स्वस्थ, निरोग, पहलवान, खिलाड़ी, कलाकार बन जाता है। इसके साथ अंतःकरण चतुष्टय-मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार आदि अनुपम दैवी क्षमताओं से भरे हैं।मन के संकल्प से नीरस वस्तुएँ सरस तथा सरस वस्तुएँ नीरस हो जाती हैं। सबल मन के संकल्प से निराकार को साकार और साकार को निराकार बना देना संभव होता है। शिव संकल्प उपनिषद् में मन की गति और क्षमताओं के बारे में इतना कुछ लिखा है कि पढ़कर आश्चर्य होता है।बुद्धि के चमत्कारों से तो यह दुनियाँ भरी पड़ी है। बुद्धि के संयोग से जड़ कहे जाने वाले पदार्थों को चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करने वाला बना दिया है। वर्तमान विज्ञान और तकनीक ने आज असंभव को संभव बना दिया है। ज्ञान की तमाम धाराएँ सबके लिए सहज सुलभ बनायी गयी हैं।चित्त के संस्कारों के सहारे मन, बुद्धि को किसी भी दिशा में प्रेरित, प्रयुक्त किया जा सकता है। अहंकार को शुद्ध करके आत्मा को परमात्मा के स्तर पर पहुँचाया जा सकता है। यदि जीवन साधना के द्वारा आत्मशक्ति जगाकर इन्हें साध लिया जाये तो जीवन में लौकिक संपदा और यश के साथ देवोपम चरित्र, आत्मिक सिद्धियाँ और परम गति पाने के रास्ते खुल जाते हैं। जीवन साधना सध जाने पर निरक्षर कबीर से लेकर आदि शंकराचार्य तक तथा गाड़ीवान रैक्य से लेकर राजा जनक तक सभी अपने-अपने क्षेत्र के सिद्ध पुरुष बन गये। साधना के अभाव के दुष्परिणाम !लम्बे समय से लोगों ने विभिन्न साधन तथा लौकिक कौशल बढ़ाने की साधना की है, इसलिए वे बढ़ गये हैं। लेकिन जीवन साधना के अभाव में उनका सदुपयोग नहीं होने पा रहा है। साधन अपने आप में भले-बुरे नहीं होते, वे सदुपयोग से भले और दुरुपयोग से बुरे बन जाते हैं। शारीरिक बल, बुद्धिबल, धनबल, सांसारिक कौशल आदि तो रावण, कंस और दुर्योधन के पास भी थे, किंतु वे कल्याणकारी, हितकारी कहाँ सिद्ध हुए?आज भी मनुष्य के पास शक्ति, ताकत खूब है। मजबूत शरीर सामान्य हथियारों से लेकर आणविक अस्त्र-शस्त्रों की कोई कमी नहीं है। किंतु जीवन साधना के अभाव में वे सुरक्षा देने की जगह आतंक और विनाश में लग रहे हैं। धन खूब बढ़ा है, लेकिन वह पोषण का माध्यम कहाँ बन पा रहा है? जीवन साधना के अभाव में हमारी अनगढ़ प्रवृत्तियाँ उसका उपयोग व्यसन, फैशन, शोषण में कर रही हैं। जिनके पास है, वे उदार होने की जगह अहंकारी बन रहे हैं। शांति-संतोष की जगह असंतोष और उत्तेजना के शिकार हो रहे हैं। प्रेमपात्र बनने की जगह ईर्ष्या और द्वेश के पात्र बन रहे हैं।बुद्धिबल जिनके पास है वे लोगों को दिशा देने, उनकी समस्याएँ हल करने की जगह उन्हें भ्रमित करने और दूसरों के लिए समस्याएँ पैदा करने में अधिक सक्रिय हैं। भावनाशील प्रेम की शक्ति का उपयोग भेदभाव मिटाने में कहाँ कर पा रहे हैं? वे तो मोहग्रस्त होकर भाई-भतीजावाद, परिवारवाद, पार्टीवाद, संप्रदायवाद को बढ़ावा देने में ही अधिक तत्पर दिखाई देते हैं। कलाकार, साहित्यकार अपनी विद्या से लोगों की सौम्य संवेदनाएँ बढ़ाने की जगह उनकी हविश को, अनगढ़ कामनाओं को ही भड़ाकाने में अधिक प्रवीणता दिखा रहे हैं। प्रकाश का अभाव ही अंधकार कहलाता है। जीवन साधना से उभरने वाली सुसंस्कारिता, सदाशयता के अभाव में कुसंस्कारों और दुराशयता का साम्राज्य बढ़ता चला जा रहा है। अंधकार को झाड़ू से बुहारकर या बल प्रयोग से धक्का मारकर किसी स्थान से बाहर कर देना संभव नहीं। अंधकार का उपचार तो एकमात्र प्रकाश पैदा करने से होता है। इसी प्रकार बढ़ती दुश्चरित्रता, उद्दण्डता, छल-फरेब, अव्यवस्था आदि को दूर करने के लिए अपने अंदर सुसंस्कारों, सहृदयता, सहकारिता, स्नेह-सद्भाव जैसी सत्प्रवृत्तियों को विकसित करना अनिवार्य है। इसी साधना के अभाव में विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका, मीडिया आदि तंत्र भी अपने-अपने दायित्वों को उचित ढंग से पूरा करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। इन्हें ठीक-व्यवस्थित करने के प्रयास भी उचित परिणाम नहीं ला पा रहे हैं। थोड़े से भले लोग प्रयास करते भी हैं तो उनके प्रयास भी नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसे ही सीमित प्रभाव वाले रह जाते हैं, सामाधान निकल नहीं पा रहे हैं। समाधान के ऋषि सूत्रयुगऋषि ने कहा है कि समस्याओं का रोना रोने या उन्हें कोसने से उनका समाधान नहीं निकलता। उन्हें पैदा करने वालों पर दोषारोपण करने से भी बात बनती नहीं। समाधान तो तभी निकलता है, जब उसके लिए सही दिशा में सतत प्रयास किये जायें। पेड़ की पत्तियाँ मुरझा रही हों तो पत्तियों पर पानी छींटने से थोड़ी देर के लिए ही प्रभाव दिखता है। स्थायी प्रभाव के लिए तो जड़ों में उचित मात्रा में खाद-पानी देने की व्यवस्था बनानी पड़ती है। रक्त विकार से शरीर में फुन्सियाँ  निकल रही हों, तो उन पर मरहम लगाने से थोड़ा-सा ही आराम मिलता है, स्थायी लाभ तो रक्त को शुद्ध करके उसे विकार मुक्त करने से ही होता है। इसी तरह परिवार और समाज में फैली अव्यवस्था को दूर करने के लिए कुछ बाहरी नियम बनाने से थोड़ा ही समाधान निकलता है। मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियाँ उन नियमों से बचकर खुराफात करने की तिकड़म बिठा लेती हैं। स्थायी समाधान निकालने के लिए, दुष्प्रवृत्तियों को प्रभावहीन करने के लिए बड़ी संख्या में सत्सप्रवृत्ति सम्पन्न व्यक्तियों को जाग्रत्, विकसित और संगठित करना होगा। देश और दुनिया में जितने भी सफल-सार्थक परिवर्तन हुए हैं, उनकी सफलता के पीछे यही रीतिनीति रही है। आज सरकारी स्तर पर तथा सामाजिक स्तर पर अनेक अच्छी योजनाएँ बनायी और लागू की जा रही हैं, लेकिन वे इसीलिए प्रभावहीन रह जाती हैं कि उन्हें सफल बनाने के लिए जितनी संख्या में नैतिक बल सम्पन्न व्यक्ति चाहिए, वे मिल नहीं पाते। इस तरह के व्यक्ति कहीं आसमान से उतरने वाले नहीं हैं, उन्हें तो समाज में से ही खोज-खराद कर काम में लगाना होगा। लोकहित की योजनाओं को सफल बनाने के लिए चाहिए उद्देश्य से न डिगने वाली प्रामाणिकता और बाधाओं को चीरकर आगे बढ़ने की प्रखरता। यह प्रामाणिकता और प्रखरता केवल बहस या उपदेशों के सहारे विकसित नहीं हो सकती, इसके लिए तो नियमित जीवन साधना को ही आधार बनाना पड़ता है। ईश्वरीय योजना के अनुसार मनुष्यमात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य लाया ही जाना है। राग-रागिनी प्रकट होते हैं सधे हुए कण्ठों या हाथों के माध्यम से। सुंदर कलाकृतियाँ प्रकट होती हैं सधे हुए कलाकारों के माध्यम से। सफाई सधती है स्वच्छ उपकरणों से। इसी तरह उज्ज्वल भविष्य आयेगा उज्ज्वल चरित्रों के माध्यम से।किसी समर्थ की योजना में जो भागीदार बनते हैं, उन्हें योजना का लाभांश भी प्राप्त होता है। जो उसमें बाधक बनते हैं, समर्थ प्रवाह उन्हें धकेलता, गिराता हुआ आगे बढ़ जाता है। इसी तरह जो नर-नारी ईश्वर की उज्ज्वल भविष्य की योजना में भागीदार बनना चाहें उन्हें उज्ज्वल चरित्र की साधना करनी चाहिए। युग का प्रवाह उन्हें लाभांश, इनाम देता हुआ आगे बढ़ेगा। इसके विपरीत जो इसमें शामिल नहीं होंगे या विरोध करेंगे, युग प्रवाह उनकी उपेक्षा करता हुआ, उन्हें दण्ड देता हुआ आगे बढ़ेगा। इसलिए प्रत्येक समझदार व्यक्ति को जीवन साधना-युग साधना करने का प्रयास करना चाहिए।जीवन साधना के सूत्र !जीवन साधना के सूत्र और स्वरूप को समझने के लिए कम से कम उनकी लिखी दो पुस्तकें १. जीवन देवता की साधना-आराधना तथा २. जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र तो पढ़ ही लेनी चाहिए। उनके आधार पर साधना का अभ्यास करना चाहिए। संक्षेप में सूत्र इस प्रकार हैं -१. भावभरी उपासना :- ईश्वर इस सृष्टि को बनाता भी है और नियंत्रित-व्यवस्थित भी रखता है। हम उसके अंश हैं। हमें भी अपने-अपने जीवन को बनाने और व्यवस्थित रखने में सक्षम होना चाहिए। यदि इस सामर्थ्य में कमी दीखती है तो उस पिता से, समर्थ मालिक से काम चलाऊ क्षमता तो ले ही लेनी चाहिए। अग्रि के पास बैठने से गर्मी मिलती है, बर्फ के पास बैठने से ठंडक मिलती है। इसी प्रकार ईश्वर के पास बैठने से ईशत्व अर्थात् अपने परिवेश को व्यवस्थित, अनुशासित, विकसित करने की क्षमता मिलती है। परमात्मा के पास बैठने से आत्मा-आत्मशक्ति विकसित होती है, जो अपने जीवन की सभी धाराओं को विकसित, व्यवस्थित बनाने में समर्थ होती है।आजकल उपासना के नाम पर अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा उपचार आदि करने की भ्रमित मान्यता ही अधिकतर क्षेत्र में हावी दिखाई देती है। उपासना में अपने अन्दर मानवीय-ईश्वरीय गुणों, विशेषताओं को विकसित करने की भावना की जानी चाहिए। उज्ज्वल भविष्य के लिए उज्ज्वल चरित्र का आधार बनाने का निवेदन करना चाहिए।२. प्रखर साधना :- ईश्वर से जो प्रेरणा, गुण, शक्ति आदि प्राप्त हो, उन्हें स्वयं में मनुष्यता के, ईश्वरत्व के गुणों को विकसित करने के लिए संकल्पपूर्वक लगाया जाना चाहिए। एक बार प्रयास सफल न हो तो बार-बार प्रयास करना चाहिए। सद्विचारों का स्वाध्याय तथा संयम द्वारा अपनी विभूतियों को जाग्रत्, रक्षित और सत्प्रयोजनों में प्रयुक्त करने के नियमित प्रयास साधना को बल देते हैं, इसलिए उन्हें भी साधना में शामिल करना चाहिए।३. आराधना भाव से सेवा :- अपना व्यक्तित्व विकसित हुआ या नहीं, यह प्रमाण सेवा-साधना के माध्यम से मिलता है। अपने अंदर जो क्षमताएँ बढ़ी हैं, उन्हें बिना अहंकार के, गौरव का बोध करते हुए किसी के हित साधने में लगाना सेवा-साधना है। इसे विराट विश्वरूप ईश्वर की आराधना मानकर करना चाहिए।४. इनके लिए समय और साधन लगाना :- उक्त तीनों प्रक्रियाओं को नियमित रूप से, प्रगतिशील ढंग से चलाते रहने के लिए प्रतिदिन २४ घण्टे में से कम से कम एक घण्टे का समय तथा अपनी क्षमता के अनुसार नियमित धनराशि निकालनी चाहिए। प्रारम्भ में यह भले ही आधा कप चाय या आधी रोटी की कीमत जितनी ही है। जैसे-जैसे साधना आगे बढ़ती है, उसके लाभ जीवन में प्रकट होने लगते हैं, वैसे ही वैसे अपने समय और साधनों के अधिक अंश जीवन साधना के लिए स्वतः ही निकलने लगते हैं।साधक मण्डल :-जीवन की ऊँचाइयों पर चढ़ना दुर्गम पहाड़ों पर चढ़ने जैसा होता है। समर्थ और कुशल व्यक्ति भी कभी भी फिसल कर गिर सकते हैं। इसीलिए पर्वतारोही कठिन चढ़ाइयों में मजबूत डोरियों से एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। कोई एक फिसलता है तो दूसरे उसे सहारा देकर सँभाल लेते हैं। इसी तरह जीवन साधना के साधकों को भी परस्पर स्नेह की डोरियों से बँधे रहना चाहिए। साधक मण्डल बनाकर चलना चाहिए। किसी एक का मन डगमगाये या परिस्थितियाँ बाधक बनें तो अपने सहयोगियों के सहारे से वह उबर जाता है।साधक अपने निकटवर्ती क्षेत्र के साधकों के साथ मिलकर एक साधक मण्डल बना लें। वे जीवन साधना के लिए संकल्पित हों। अपने-अपने ढंग से वे जीवन साधना के सूत्रों-उपासना, साधना आदि का अभ्यास प्रारम्भ करें। व्यक्तिगत क्रम रोज निभायें। सप्ताह में एक बार सामूहिक क्रम बनायें। सामूहिक उपासना १५-२० मिनिट। सामूहिक रूप से अपने उपयुक्त युग साहित्य का अध्ययन एवं उससे प्राप्त ज्ञान को जीवन में धारण करने सम्बन्धी चर्चा करें। संयम साधना में क्या प्रगति हो रही है? इसकी समीक्षा करें। सेवा, साधना, आराधना के लिए मिलजुलकर कुछ बेहतर करने की रूपरेखा बनायें। शान्तिपाठ करके एक-दूसरे को अभिवादन करके समापन करें।अपने संगठन में :- युगऋषि ने अपने संगठन गायत्री परिवार या प्रज्ञा परिवार के सदस्यों के लिए यह क्रम अनिवार्य बताया है। इसे प्रज्ञा मण्डल (पुरुष, महिला, युवा) आदि नाम दिये जाते हैं। लेकिन गुरुदेव की जय बोलने वाले भी उनके इस निर्देश का पालन कम ही कर रहे हैं। या तो मण्डल बने ही नहीं हैं अथवा उनकी गतिविधियाँ कुछ कर्मकाण्डों या स्थूल कार्यों तक ही सीमित रह गयी हैं। वे भी व्यक्तित्व परिष्कार, व्यक्ति निर्माण जैसे कोई लक्ष्य बनाकर नहीं चल रहे हैं। गुरुदेव ने चाहा है कि हर मोहल्ले, हर गाँव में ऐसे साधक मण्डल बनें और सक्रिय रहें। उनके विकास का क्रम एक से पाँच, पाँच से पच्चीस के क्रम से चले। ५० से अधिक संख्या होने पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार एक नया मण्डल बना लिया जाय।साधक मण्डल सक्रिय और विकसित होंगे तो उसके अनेक ठोस लाभ होंगे-१. साधकों की संगठन शक्ति  बढ़ेगी। २. व्यक्तित्व विकास का क्रम पुष्ट होगा तो सृजन सैनिकों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ेगी। ३. वे नियमित जनसम्पर्क करके युग निर्माण के सर्व हितकारी सूत्रों को जन-जन तक पहुँचा सकेंगे तथा जिनकी रुचि होगी, उन्हें ईश्वर के साथ भागीदारी के क्रम से जोड़ सकेंगे। ४. अन्य संगठनों में भी साधक मण्डल स्थापित कर सकेंगे, जिससे वे अपने ढंग से अपने प्रभाव क्षेत्र में युग निर्माण की गतिविधियाँ चला सकें तथा पहले से बेहतर कार्य करने में समर्थ हो सकें।अन्य संगठनों में :-अन्य संगठनों को उपासना के लिए मंत्र एवं कर्मकाण्ड चुनने की छूट देनी चाहिए। उन्हें उपासना का स्वरूप तथा सामूहिक उपासना का महत्व समझाना पर्याप्त है। स्वाध्याय और संयम साधना के लिए पुस्तकें सुझाई जा सकती हैं। सेवा कार्यों में परस्पर सहयोग से कुछ बेहतर करने की रूपरेखा भी बनायी जा सकती है। गुरुदेव, गायत्री माता के चित्र की स्थापना का आग्रह भी नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें रुचे तो युगदुर्गा के स्वरूप में लाल मशाल का व्याख्या वाला चित्र स्थापित कराया जा सकता है।युग निर्माण का आधार व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण के क्रम से समाज निर्माण है। साधक मण्डल बनने और सक्रिय होने से व्यक्तित्व परिष्कार का क्रम तेज होगा। मण्डल एक परिवार के रूप में चलेंगे तो परिवार निर्माण का कौशल भी निखरेगा। इस क्रम से समाज निर्माण के लिए सबल आधार खड़े होंगे। आत्मकल्याण तथा लोकमंगल, दोनों दृष्टियों से साधक मण्डल बहुत सफल सिद्ध हो सकते हैं। हर प्रतिभाशाली को इस दिशा में संकल्प लेकर सक्रिय होना चाहिए।


Write Your Comments Here:


img

विश्व स्तरीय चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान ( वसंत पर्व से फाल्गुन पूर्णिमा 2020 तक ) तदनुसार 30 जनवरी से 10 मार्च 2020 तक

चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान की यह साधना साधकों को अपने घर पर रह कर ही संपन्न करनी है । इस के लिए शांतिकुंज  नहीं आना होगा । पंजीयन करने का उद्देश्य सभी साधकों की सूचना एकत्र करना एवं शांतिकुंज स्तर.....

img

दीप यज्ञ , युवा मंडल चित बड़ा गांव बलिया

युवा प्रकोष्ठ अखिल विश्व गायत्री परिवार बलिया के तत्वावधान में युवा मंडल चित बड़ा गांव बलिया द्वारा दीप यज्ञ का आयोजन चित बड़ा गांव के मटिहि ग्राम सभा के शिव मंदिर पर किया गया जिसमे यज्ञ का सञ्चालन श्रीमती.....

img

The Pulsating SIDBI Seminar on Life Style Modification

Shraddeya Drji in concluding session of International Yoga program at Vigyan Bhavan had emphasized on Ahar and Vihaar (Lifestyle). This 14th minute discourse has inspired DIYA to take multiple seminars on Jaisa Aaan waisa maan and Life Style Modification (.....