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श्रीराम झोला पुस्तकालय

प्रत्येक व्यक्ति इतना बुद्धिमान और प्रतिभाशाली नहीं होता कि वह तथ्यों को सही-सही समझा सके और किस परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिए, इसका मार्गदर्शन कर सके। इसके लिए सुलझी विचारधारा का साहित्य लेकर निकलना चाहिए तथा लोगों को उसे पढऩे तथा विचार करने की प्रेरणा देनी चाहिए, उसके साथ अशिक्षित व्यक्तियों के लिए पढक़र सुनाने या परामर्श द्वारा प्रेरणा देने की प्रक्रिया चलाई जानी चाहिए। आरंभ में सभी लोगों की रुचि इस ओर नहीं हो सकती। अत: जो लोग ज्ञानयज्ञ की आवश्यकता समझते हैं, उन्हें चाहिए कि वे ऐसा विचार-साहित्य लोगों तक स्वयं लेकर पहुँचें। यह ठीक है कि कुआँ प्यासे के पास नहीं जाता, प्यासे को ही कुआँ के पास जाकर पानी पीना पड़ता है। गर्मियों में जब व्यापक जल संकट उत्पन्न हो जाता है, तो बादलों को ही जगह-जगह जाकर बरसना पड़ता है। लोक-सेवियों को भी सद्विचारों और सद्प्रेरणाओं की शीतल सुखद जलवृष्टि के लिए जन-जन तक पहुँचना चाहिए। उसके लिए उन व्यक्तियों में पहल सद्विचारों के प्रति भूख जगाना आवश्यक है। भूख उत्पन्न करने का यह कार्य सम्पर्क द्वारा ही संभव होता है। उसके बाद सद्विचारों और सत्प्रेरणाओं को उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। यह आवश्यकता साहित्य और निम्र सेवा कार्यों द्वारा पूरी की जा सकती है।
श्रीराम झोला पुस्तकालय
    हमारी प्राथमिक आवश्यकता विचार क्रांति की है। ज्ञान यज्ञ इस युग का सबसे बड़ा पुण्य है। ज्ञान दान से बढक़र आज की परिस्थितियों में कोई दान नहीं। ज्ञान साधना ही युग की सबसे बड़ी साधना है।
    आज की स्थिति में एक ही उपाय है, जिससे इस युगांतरकारी प्रबल प्रेरणा को घर-घर तक, जन-जन तक पहुँचाया जा सकता है। वह उपाय है-श्रीराम झोला पुस्तकालय। विचारशील व्यक्ति, जिनके मन में देश, धर्म, समाज, संस्कृति के प्रति दर्द हो, जो मानवीय आदर्शों को फलता-फूलता देखने को इच्छुक हों, जिन्हें सुन्दर और सुव्यवस्थित नवयुग के प्रति आकर्षण हो, वे अपना थोड़ा श्रम खर्च करने लगें, जीवन साहित्य को अपने थैले में रखें, स्वयं पढ़े और अपने हर शिक्षित सदस्य को पढ़ाएँ एवं अशिक्षितों को सुनाएँ।
    झोला पुस्तकालय अमृत बाँटने का, प्रकाश बाँटने का, कल्याण बाँटने का अभियान है। यह असीम दान और अनुपम पुण्य परमार्थ है। आत्मा की भूख अन्त:करण की प्यास बुझाकर हम उतना पुण्य संचय कर सकते हैं, जितना करोड़ मन अन्नदान और लाख मीटर वस्त्रदान करने पर भी संभव नहीं। क्यों करें? कैसे करें?
    (१) अब तक प्रज्ञा लघु पुस्तकमाला की दो सौ तीस पॉकेट बुक्स प्रकाशित हो चुकी हैं। परिजनों से अनुरोध है कि आप श्रीराम झोला पुस्तकालय के १२ सदस्य बनाने के लिए डाक खर्च सहित कुल १३०) रुपया मनीआर्डर या बैंक ड्राफ्ट द्वारा युग निर्माण योजना, मथुरा-३ के नाम भेज कर सौ पॉकटे बुक्स अलग-अलग मँगा लें।
    (२) इनमें से अलग-अलग विषयों की आठ-आठ पुस्तकों के १२ सैट बना लें।
    (३) एक सदस्य से १२) रुपया लेकर उन्हें आठ पुस्तकों का एक सैट दे दें। इसी प्रकार १२ सदस्य बनाने हैं। प्रयत्न यही करें कि सभी सदस्य पास-पास रहने वाले हों। एक ही कार्यालय क कर्मचारियों को अथवा एक बाजार के दुकानदारों को अथवा एक ही मोहल्ले के परिजनों को सदस्य बनाया जाए।
    (४) सदस्य बनाते समय उन्हें १२) रुपया लेकर आठ पुस्तकें दे दें और उन्हें माह में अवश्य पढ़ लेने का अनुरोध करें। एक माह बाद यह सैट दूसरे सैट से बदलकर देने का आश्वासन भी उन्हें दे दें। इस प्रकार १२) रुपए खर्च करके वे १४४) रुपए की पुस्तकें एक वर्ष में पढ़ सकेंगे। इस योजना में प्रारंभ में आपको कुछ धन लगाना पड़ेगा, लेकिन वह धन सदस्य बनाते ही वापस मिल जाएगा।
    (५) सदस्यों को प्रतिमास सैट कैसे बदलकर दिए जाएँ इसके लिए यह विधि अपना सकते हैं। झोला पुस्तकालय चलाने वाले परिजन स्वयं प्रतिमाह सदस्य संख्या एक का सैट सदस्य संख्या दो को, सदस्य संख्या दो का सैट सदस्य संख्या तीन को, सदस्य संख्या तीन का सैट सदस्य संख्या चार को इसी प्रकार आगे बढ़ते हुए सदस्य संख्या १२ का सैट सदस्य संख्या एक को देकर बदल दें।
    (६)  कुछ परिजन पढ़ी हुई पुस्तकों को खरीदने की माँग करेंगे। इसके लिए आपकी अतिरक्ति पुस्तकें अपने पास मँगाकर रखनी चाहिए। कुछ पुस्तकें खो जाती हैं, उनका मूल्य लेकर उनके स्थान पर दूसरी पुस्तक लगानी पड़ेंगी, इसके लिए भी अतिरिक्त पुस्तकों की आवश्यकता होगी। उक्त विधि से कार्य करने से एक भाई या बहन हजारों सदस्य श्रीराम झोला पुस्तकालय के बना सकते हैं।






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