सद्गुणों की खेती का नाम है संस्कृति: डॉ पण्ड्याजीभारतीय संस्कृति को समझने का सुनहरा मौका है यह सेमीनार: डॉ. योगेन्द्र‘भारत के सांस्कृतिक अग्रदूत’ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार देसंविवि में प्रारंभसिंगापुर, मलेशिया सहित कई देशों के विद्वानों की भागीदारी, चार सत्रों में पढ़े जाएँगे 192 शोध पत्र विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक नगरी हरिद्वार में स्थित देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के मृत्युंजय सभागार में ‘भारत के सांस्कृतिक अग्रदूत विषय’ पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार की शुरुआत हुई। सेमीनार के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे देसंविवि के कुलाधिपति डॉ प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान भारतीय संस्कृति में समाया है। पैगम्बर साहब, महात्मा बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, श्रीअरविन्द, पं० श्रीराम शर्मा आचार्य आदि का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हमारे कई महापुरुषों ने विश्व के कोने-कोने में जाकर प्राचीन भारतीय संस्कृति की अवधारणा से जन-जन को अवगत कराने में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।कुलाधिपति ने कहा कि जहां संस्कृति की सुगंध होती है, वहां लोग अपने आप खिंचे चले आते है, ऐसी ही संस्कृतियों में से एक है भारतीय संस्कृति। प्राचीन काल से ही इसकी बड़ी महिमा रही है। देश-विदेश से हजारों लोग भारतीय संस्कृति को जानने नालंदा-तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय आया करते थे। आधुनिक युग में ऐसे ही विश्वविद्यालय की कमी को पूरा करने के निरंतर प्रयास में लगा है देवसंस्कृति विश्वविद्यालय। इससे पूर्व अतिथियों द्वारा सामूहिक रूप से दीप प्रज्वलन के पश्चात ‘स्वर्णिम भारत बनाने...’ गीत से उद्घाटन सत्र का शुभारंभ हुआ।  सिंगापुर से आये डॉ योगेन्द्र दत्त ने भारतीय संस्कृति के अग्रदूतों-महापुरुषों को याद करते हुए उनके बताये मार्गों पर चलने की सलाह दी और कहा कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए यह सुनहरा मौका है, क्योंकि यहाँ विभिन्न सम्प्रदाय से जुड़े विद्वान अपने शोध पत्र प्रस्तुत करने जा रहे हैं।प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि  ‘सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा’ की संस्कृति ही भारतीय संस्कृति है। यह वही संस्कृति है, जो विश्व की एकमात्र संस्कृति थी। देसंविवि देश-विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालय से एमओयू कर भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में लगा हुआ है। मेरठ के डॉ केडी शर्मा ने कहा कि भारत के शांतिदूत ही विश्व को जगाने चले थे, इन्होंने ही वैदिक संस्कृति को समस्त विश्व में फैलाने का कार्य किया। भारतीय संस्कृति के संवाहकों ने संस्कृति को अफ्रीका जैसे देशों तक भी पहुंचाया जहाँ संस्कृति नाम की कोई चीज नहीं थी। उन्हें सुसंस्कृत बनाने में भारत का मुख्य योगदान हैं। वर्तमान ने इस तरह के अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार उसी काम को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। सेमीनार के समन्वयक व कुमाऊ विवि के प्रो सीएम अग्रवाल के अनुसार यह सेमिनार मुख्यतः साहित्य, धर्म, कला, सामाजिक संवाहक एवं मीडिया पर आधारित है। सेमीनार में चार सत्र होंगे, जिसमें 192 शोध पत्र पढ़े जायेंगे। सेमीनार में भारत सहित सिंगापुर, मलेशिया आदि कई देशों के हिन्दू व मुस्लिम सम्प्रदाय के विद्वज्जन भागीदारी कर रहे हैं। कुलाधिपति डॉ पण्ड्या ने अतिथियों को स्मृति चिह्न, उपवस्त्र एवं साहित्य भेंटकर सम्मानित किया। वहीं अतिथियों ने स्मारिका, संस्कृति संचार पत्रिका एवं प्रो सीएम अग्रवाल की पुस्तक का विमोचन किया। कुलसचिव संदीप कुमार ने उद्घाटन सत्र का आभार प्रकट किया। इस अवसर पर डॉ वाईएन खान, डॉ इरसाद, डॉ एवी कौर, डॉ आराधना गुप्ता, डॉ वीके शर्मा, जनसम्पर्क विभाग के समन्वयक महेन्द्र शर्मा, डॉ रमाकांत शर्मा सहित अनेक विद्वज्जन उपस्थित थे।


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