Published on 2018-10-15 HARDWAR
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नई पीढ़ी को संस्कृतिनिष्ठ-व्यसनमुक्त बनाने हेतु ठोस प्रयास हों

सोद्देश्य प्रारंभ और प्रगतिभारतीय संस्कृति को दुनियाँ भर के श्रेष्ठ विचारकों ने अति पुरातन और महान माना है। ऋषियों की दृष्टि हमेशा से विश्व बंधुत्व की रही है। इसी लिए इस संस्कृति में वे सारे तत्त्व शामिल किए गए हैं, जो मनुष्य मात्र को सह अस्तित्व के साथ प्रगतिशीलता की प्रेरणा दें और क्रमश: आदर्श जीवन लक्ष्य तक पहुँचा सकें। वर्तमान समय में जब विज्ञान और तकनीकी प्रगति ने वैश्विक सम्पर्क और सहयोग के अनेक रास्ते खोल दिए हैं, तब सांस्कृतिक सौमनस्य की स्थापना भी बहुत आवश्यक हो गई है। वाञ्छित सांस्कृतिक सौमनस्य की स्थापना में भारतीय संस्कृति अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

राष्ट्रीय गौरव की अनुभूति और राष्ट्रीय वर्चस्व की स्थापना के लिए भी यह आवश्यक हो गया है कि नई पीढ़ी अपने सांस्कृतिक वैभव का महत्त्व समझे और जीवन को संस्कृतिनिष्ठ बनाये। इस तथ्य पर छात्रों और शिक्षातंत्र से जुड़े व्यक्तियों का ध्यान आकर्षित करने और उस दिशा में प्रेरक पहल करने के उद्देश्य से भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का शुभारंभ किया गया था। यह प्रसन्नता और संतोष का विषय है कि लोगों ने इसका महत्त्व समझा और भरपूर सहयोग देकर इसे बुलन्दियों तक पहुँचाया। इसी वजह से इस परीक्षा ने तमाम नए कीर्तिमान भी स्थापित किए। इस नाते इसमें सहयोग देने, समय, साधन, प्रतिभा एवं श्रम आदि लगाने वाले सभी भावनाशील और विचारशील भाई-बहिन साधुवाद के पात्र हैं।
 

अब अगले चरण बढ़ेंइस अभियान ने सफलतापूर्वक २५ वर्ष पूरे कर लिए हैं। बड़ी संख्या में विद्यालयों के व्यवस्था मण्डल व शिक्षकों, छात्रों और उनके अभिभावकों के साथ अच्छे सम्बन्ध बन गए हैं। अस्तु अब नई पीढ़ी को संस्कृतिनिष्ठ, संतुलित, प्रगतिशील जीवन शैली अपनाने की दिशा में प्रेरित करने के अगले चरण बढ़ा ही दिए जाने चाहिए। जिन विद्यालयों में यह परीक्षा आयोजित होने लगी है, उनमें छात्र-छात्राओं एवं अध्यापक-अध्यापिकाओं के सुसंयोग से संस्कृति मण्डलों की स्थापना के प्रयास तीव्रतर किए जायें। मण्डल सदस्यों को स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज निर्माण के सूत्रों को समझाने और अपनाने-अभ्यास में लाने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित किया ही जाय। अन्य विद्यालयों में इसके लिए व्याख्यानमालाएँ-कार्यशालाएँ भी चलायी जायें।

एक सुसंयोग यह भी बन पड़ा है कि केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों ने सभी शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा की कक्षाएँ चलाने का नियम बना दिया है। इसके लिए शिक्षा विभाग को लोकसेवी, स्वैच्छिक संगठनों का सहयोग लेने की छूट भी दी है। इसका लाभ उठाते हुए प्राणवान परिजन प्रबुद्ध वक्ताओं और अनुभवी लोकसेवियों के सहयोग से इस दिशा में प्रभावशाली एवं ठोस प्रयास कर सकते हैं। नयी पीढ़ी को श्रेष्ठ राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देने की प्रेरणा दे सकते हैं। उन्हें जीवन साधना, सत्साहित्य का स्वाध्याय, संयमशीलता (इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम) का अभ्यास करने तथा इस प्रकार विकसित हुई ऊर्जा और कुशलता को राष्ट्रसेवा में, लोक आराधना में लगाने के लिए प्रशिक्षित-प्रोत्साहित कर सकते हैं।

उक्त योजना के अन्तर्गत विद्यालयों में कक्षाएँ कोई भी ऐसे परिजन ले सकते हैं, जो थोड़ा-बहुत भी भाषण दे लेते हैं। मिशन से प्रकाशित नैतिक शिक्षा भाग-एक और दो के आधार पर भाषण के विषय तैयार किए जा सकते हैं। उनमें हर विषय के साथ उनके साथ जोड़े जा सकने वाले दृष्टांत और पूछे जा सकने वाले प्रश्न भी दिए गए हैं। उनके माध्यम से प्रसंगों को अधिक रोचक और प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

केन्द्र की पहल

इस दिशा में शांतिकुंज ने युवा क्रान्ति वर्ष की तरह चार रथों को शिक्षण संस्थानों एवं प्रभावशाली संगठनों के माध्यम से नई पीढ़ी से सम्पर्क साधने, उन्हें संस्कृतिनिष्ठ-व्यसनमुक्त बनने की प्रेरणा-कार्ययोजना देने के लिए शृंखलाबद्ध कार्यक्रम देकर भेजा है। इन रथों को २८ सितम्बर को सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा के समीप समारोहपूर्वक विदा किया गया। (समाचार इसी अंक में पृष्ठ ३ पर हैं।) रथों की इस यात्रा को च्व्यसनमुक्त भारत यात्राज् नाम दिया गया है।

यह रथ छएऊ स्क्रीन एवं प्रोजेक्टर, जैनरेटर सहित विविध प्रचार सामग्री से लैस हैं। इनमें भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा, नशामुक्ति एवं शान्तिकुंज के परिचय सम्बन्धी फिल्म प्रदर्शन भी किए जा सकेंगे। इनके साथ आवश्यक साहित्य एवं संकल्प पत्रादि भी हैं। वे स्थानीय परिजनों के सहयोग से हर जगह उपयुक्त स्थलों को केन्द्र बनाकर कार्य करेंगे। जैसे :- • भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा से जुड़े विद्यालय-महाविद्यालय
• गायत्री शक्तिपीठ-प्रज्ञापीठ • शहरों और कस्बों के प्रमुख स्थल • स्थानीय प्रभावपूर्ण संगठन आदि।

सम्बद्ध प्रान्त : यह चार रथ २ अक्टृूबर-गाँधी जयंती से लेकर ३१ जनवरी तक क्षेत्रों में सक्रिय रहेंगे। प्रत्येक रथ इस अवधि में ७०-७५ जिलों में सम्पर्क यात्रा क्नरेगा वे क्रमश:
(१) उत्तर प्रदेश, (२) हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तथा दिल्ली (३) महाराष्ट्र, ओडिशा तथा (४) बिहार एवं झारखंड के जिलों में कार्य करेंगे। इस प्रकार यह रथ ३०० से अधिक जिलों में निर्धारित लगभग ६०० कार्यक्रम करेंगे।

तीन प्रान्तों-मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान में इसी बीच प्रान्तीय चुनाव होने हैं, इसलिए उन्हें अगले चरण के लिए छोड़ दिया गया है। गुजरात प्रान्त के परिजन इन्हीं दिनों वहाँ हुए अश्वमेधों के रजत जयंती कार्यक्रमों में व्यस्त रहेंगे, इसलिए उसे भी अगले चरण में शामिल किया जायेगा। पूर्व एवं पूर्वोत्तर के तथा दक्षिण के प्रान्तों में भाषा की समस्या होने से वहाँ भिन्न ढंग से इस अभियान को गति देने की योजना बन रही है। विश्वास है कि इस रथयात्रा से भी युवा क्रान्ति वर्ष की रथयात्रा की तरह ही शानदार परिणाम निकलेंगे।

अन्य प्रयास

कई प्रान्तों में उसी क्षेत्र के प्राणवान परिजनों ने अच्छे वक्ताओं की एक टीम बनायी है। वे प्रवचनों, पावर पॉइण्ट प्रेज़ेण्टेशनों, कार्यशालाओं आदि के माध्यम से विभिन्न शिक्षण संस्थानों और विभिन्न संगठनों के माध्यम से भी नई पीढ़ी को श्रेष्ठ राष्ट्र के श्रेष्ठ नागरिक बनने के लिए प्रेरित करने का क्रम चलाते रहेंगे। प्रभावित युवाओं-युवतियों को छोटे-छोटे प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से अग्रदूतों की भूमिका निभाने के लिए तैयार किया जायेगा। कन्या कौशल शिविरों और युवा जागरण शिविरों के माध्यम से तो इस दिशा में सार्थक प्रयास हो ही रहे हैं। अगले दिनों इन्हें और अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने के प्रयास चल पड़े हैं।


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