आत्मा, महात्मा और परमात्मा का विकास पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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     महात्मा वह है, जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करती है। काया की वेशभूषा और चित्र-विचित्र आवरणों का धारण महात्मा होने का न तो आधार है और न लक्षण। सामान्य वेष और सामान्य रहन-सहन के बीच महात्मा के स्तर तक पहुँचा जाना सम्भव है और पहुँचाया जाता भी रहा है। 

मर्यादाओं से आबद्ध रह कर नागरिक कर्तव्यों का पालन करते रहना उद्धत आचरणों से बचना, शील और सौजन्य को निबाहना यह मनुष्यता का आवश्यक उत्तरदायित्व है। जिन्होंने अपने भीतर आत्मा को समझा है और उसकी गौरव-गरिमा को ध्यान में रखा है। उसे संयम, सदाचार और कर्तव्यनिष्ठा से जुड़ा हुआ शालीन जीवन जीना ही पड़ेगा। 

महात्मा की गरिमा इससे अगली मंजिल है। महान का अर्थ है- विशाल व्यापक। जो आत्मा अपने शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक कर्तव्यों से आगे बढ़कर विश्व मानव के उत्तरदायित्वों को वहन करने के लिए अग्रसर होती है, मानवीय कर्तव्यों से आगे के देव कर्तव्यों को वहन करने के लिए तत्पर होती है वह महात्मा है। महात्मा अपने लिए नहीं सोचता, विराट् के लिए सोचता है, अपने लिए नहीं करता, विराट् के लिए करता है, अपने लिए जीवित नहीं रहता, विराट् के लिए जीता है। 

अपना शरीर हर छिद्र से मलीनता निष्कासित करता है, पर इसलिए कौन उसे घृणास्पद और त्याज्य ठहरता हैं कि इनमें गन्दगी विद्यमान है। घृणा की आवश्यकता नहीं समझी जाती और शरीर को स्वच्छ करने पर ही ध्यान रहता है। अपनी ही तरह दूसरों की विविध मलीनताओं के रहते जो हेय, घृणास्पद, पतित और त्याज्य नहीं ठहराता वरन् अपनी सहज ममता से प्रेरित होकर उसे निर्मल बनाने का श्रम करता है, वह महात्मा है। अपना छोटा बच्चा दिनभर गलती करता रहता है, उसका बहिष्कार नहीं करते और देख-भाल, डाँट-डपट, तोड़-फोड़ के अवसरों की रोकथाम करके जितना सम्भव होता है उस क्षति का बचाव करते हैं। इस पर भी जो हानि होती रहती है उसे सहन करते हैं। छोटे बालकों और अभिभावकों के बीच यह चिर अतीत से चला आ रहा है। दिग्भ्रान्त जन समाज के अनाचरणों के प्रति आक्रोश उत्पन्न किये बिना जो धैर्य और शान्तिपूर्वक विग्रह की रोकथाम पर ध्यान देता है उस उदारमना व्यक्ति को महात्मा कहना चाहिए। 

हम अपने और अपने प्रियजनों के दु:खों से दु:खी होते हैं। इस क्षेत्र में सुख संवर्धन का प्रयत्न करते हैं। हमें अपना सुख, यश, वैभव, उत्कर्ष प्रिय लगता है और जिन्हें अपना समझते हैं उन्हें भी इसी सुखद स्थिति में रखने के लिए प्रयत्न करते हैं, यह परिधि जब बड़ी हो जाती है और प्यार-दुलार का, ममता-आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ जाता है तो वैसी ही अनुभूति हर किसी के साथ जुड़ जाती है। दूसरों का कष्ट अपना कष्ट लगता है; अपने को सुखी बनाने के लिए जिस प्रकार अपना स्वभाव और चिन्तन सक्रिय रहता है वैसी ही सक्रियता यदि जन साधारण के लिए विकसित हो चले तो समझना चाहिए कि आत्मा ने महात्मा का रूप धारण कर लिया। परायों में जब अपनापन प्रतिभासित होने लगे तो समझना चाहिए कि दिव्य नेत्र खुल गए। जिसका अहन्ता ग्रीष्म की हिम बनकर पिघल जाय, जो पवन जैसा सक्रिय और आकाश जैसा शान्त दिखाई पड़े समझना चाहिए यह महात्मा का ही विग्रह है। 

जब तक स्व, पर ऊहा-पोह चलता रहता है तब तक आत्मा और महात्मा का प्रेम-प्रसंग, आदान-प्रदान, परिहास, मनुहार चल रहा समझा जाना चाहिए। जब द्वैत की समाप्ति हो जाय और केवल एक ही शेष रहे स्व, पर का अन्तर सोचने की गुंजाइश ही न रहे तब समझना चाहिए उसी काय कलेवर में परमात्मा का अवतार हो गया।

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