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  • राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा और गुजरात के २००० शिक्षक-परिजनों ने भाग लिया
  • विद्यालय स्तर पर ६५ लाख और महाविद्यालय स्तर पर 
  • ५ लाख विद्यार्थी वर्ष २०१४ में शामिल कराने का है लक्ष्य
लोकसभा चुनावों के बाद शांतिकुंज में शिक्षक गरिमा शिविरों के आयोजन का द्वितीय चरण आरंभ हुआ। २४ से २६ मई की तारीखों में राजस्थान तथा दिल्ली के शिक्षक-शिक्षिकाओं व कार्यकर्त्ताओं ने, २८ से ३० मई के शिविर में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के गुरुजनों ने तथा १ से ३ जून के शिविर में गुजरात से आये भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के कुशल संचालक-शिक्षकों ने भाग लिया। इनके विदाई सत्रों को संबोधित करते हुए आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने कहा- 

भारतीय संस्कृति जीवन में सद्गुणों की खेती करना सिखाती है। सद्गुणों के प्रति, संस्कृति के प्रति आस्था और विश्वास के आधार पर ही ईश्वर कृपा प्राप्त होती है। ईश्वर की कृपा से ही अपनी अनंत शक्तियों को पहचानना और उन्हें विकसित करना संभव होता है। यही विद्यार्जन का प्रमुख प्रयोजन है। 

भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की निरंतर बढ़ती लोकप्रियता के अनुरूप अतिथि शिक्षक-परिजनों में भरपूर उत्साह था। औसतन ६५० शिविरार्थी इन शिविरों में शामिल हुए। ८० प्रतिशत शिक्षक पहली बार शांतिकुंज आये थे। शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने उनका मार्गदर्शन करते हुए उन्हें अभिभूत कर दिया। 
आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी ने कहा, ‘‘माता-पिता बच्चे को जन्म देते हैं। उसमें मानवता का विकास करना गुरुजनों की नैतिक जिम्मेदारी है। जिस राष्ट्र में शिक्षक अपने धर्म का निष्ठापूर्वक पालन नहीं करते, वह राष्ट्र कभी ऊँचा नहीं उठ सकता।’’

डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने शिविरों का उद्घाटन करते हुए विद्यार्थियों में प्रखरता, पात्रता, पवित्रता, प्रामाणिकता, पारिवारिकता जैसे सद्गुण विकसित करने के व्यावहारिक सूत्रों की चर्चा की। शांतिकुंज के वरिष्ठ वक्ताओं ने विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन करते हुए मानव में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के संकल्प को साकार करने में सहयोगी बनने का आह्वान अतिथि गुरुजनों से किया। 

कुछ महत्त्वपूर्ण बातें

 आद. डॉ. प्रणव जी ने कहा-
  • भा. सं. ज्ञान परीक्षा को विदेशों में भी आरंभ किया जायेगा। 
  •  आईएएस. और आईपीएस.  की तैयारी कर रहे छात्र भी भासंज्ञाप. के प्रश्न बैंक का लाभ ले रहे हैं। 
  •  परीक्षा के मूलभूत उद्देश्यों को भलीभाँति समझाया गया। लक्ष्य प्राप्ति के लिए संस्कृति मंडलों के गठन, बाल संस्कार शालाओं के संचालन, आदर्श विद्यालय निर्माण जैसी योजनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई, संकल्प लिये गये। 
  •  परीक्षा की नियमावली, पाठ्यक्रम, मूल्यांकन पर चर्चा और शंका समाधान का क्रम रहा। परिजनों से सुझाव भी लिये गये। 
  •  शिविर संचालन भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा प्रभारी 
श्री पी.डी. गुप्ता और उनके सहयोगी श्री रमाकांत आमेटा, 
श्री मोहन सिंह भदौरिया, श्री चक्रधर थपलियाल, श्री अतुल द्विवेदी आदि ने किया। 


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