गायत्री तीर्थ शांतिकुंज के रामकृष्ण हॉल में उप्र के प्रधानाचार्यों की ३७वाँ वार्षिक अधिवेशन एवं शैक्षणिक संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। परिषद के संरक्षक श्रीनिवास शुक्ल, महेन्द्र त्यागी, प्रदेश अध्यक्ष राजेन्द्र वाजपेयी एवं महामंत्री त्रिलोकीनाथ त्रिपाठी एवं देवसंस्कृति विवि के शिक्षा विभाग के निदेशक डॉ कर्मयोगी ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन कर शुभारंभ किया। अधिवेशन में परिषद से जुड़े उप्र के विभिन्न जनपदों से आये प्रधानाचार्य भागीदारी कर रहे हैं।

          उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए डॉ. आर.पी. कर्मयोगी ने कहा कि अनुशासित विद्यार्थी ही आगे बढ़ते हैं और यह अनुशासन विद्यार्थी जीवन प्रारंभ करने के साथ ही उन्हें सीखना होता है। शिक्षक ही विद्यार्थियों को जीवन में ऊँचा उठने के लिए अवसर प्रदान करते हैं तथा कठिनाइयों से जूझने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करने का काम भी शिक्षक ही करते हैं। उन्होंने कहा कि  विद्यार्थियों का जीवन ऊर्जा से भरा होता है, उसे नियंत्रण में रखते हुए उनकी ऊर्जा को सही दिशा में रूपांतरण करने की कला शिक्षकों को आनी चाहिए। शिक्षाविद डॉ कर्मयोगी ने कहा कि  छात्र-छात्राओं को पढ़ाने से ज्यादा महत्त्व उनके अंदर रचनात्मक गुणों का विकास करना देना चाहिए। डॉ कर्मयोगी ने विद्यार्थियों में प्रकृति, प्रवृत्ति और पराक्रम के गुणों को विकास करने पर बल दिया।

          प्रधानाचार्य परिषद के प्रदेश अध्यक्ष राजेन्द्र वाजपेयी ने कहा कि शांतिकुंज ने शिक्षा के साथ विद्या सिखाने की जो परंपरा कायम की है, उससे प्रधानाचार्य परिषद से जुड़े प्रतिनिधिगण लाभान्वित हो सकें, इसी उद्देश्य से यह अधिवेशन यहाँ लगाया गया है। परिषद के संरक्षक श्रीनिवास शुक्ल के कहा कि यहाँ ज्ञान और साधना का सम्यक् गुण प्राप्त करने का बहुत ही अच्छा माहौल है। मानव जाति के कल्याण के कार्य करने की यहाँ सुंदर प्रेरणा मिलती है। महामंत्री त्रिलोकीनाथ पाण्डेय ने कहा कि दो दिन तक चलने वाले इस अधिवेशन में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के पहलुओं पर चर्चा की जायेगी तथा इसके क्रियान्वयन में आने वाली संभावित परेशानियों के हल भी ढूंढ़े जायेंगे। 


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