देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि युवाओं को आज की शिक्षा प्रणाली से डिग्रियाँ तो मिल जाती हैं, पर उस डिग्रीधारी युवा के अंदर सेवा, सहयोग जैसे गुणों की कमी दिखाई देती है। उनमें वे सद्गुण विकसित करने की दिशा में प्रयत्न होने चाहिए। उन्होंने कहा कि विज्ञान ने तो कई उपलब्धियाँ हासिल कर ली है, पर विद्यार्थी आदर्शों से विमुख हो गए हैं। उन्हें सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

            डॉ चिन्मय पण्ड्या ने उप्र के प्रधानाचार्यों का ३७वाँ वार्षिक अधिवेशन के समापन सत्र को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि  मनुष्य के अंदर श्रेष्ठता की अनंत संभावना सुप्तावस्था में है, यदि उसे जीवन में फलीभूत करना हो, तो तदनुसार तप करने, खाद-पानी  देने के लिए दूरदर्शितापूर्वक कार्य करना चाहिए। प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि गायत्री परिवार के जनक वेदमूर्ति पं०श्रीराम शर्मा आचार्य ने एक दिव्य स्वप्न देखा था कि ऐसा एक विवि हो, जो सच्चे मनुष्य, सेवा भावी युवा, सर्वांगपूर्ण मनुष्य बनाने की आवश्यकता को पूर्ण कर सके। उनकी परिकल्पना के अनुसार देसंविवि के युवा अपने तन, मन से अध्ययन व तप करते हैं। अपने जीवन के अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने विद्यार्थियों के जीवन को सुदृढ़ बनाने के लिए विविध उपायों बताए।

            इससे पूर्व प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए श्री कालीचरण शर्मा ने कहा कि विद्यार्थियों में शिक्षा के साथ-साथ विद्या (जीवन जीने की कला) का समावेश से ही उनका समुचित विकास हो सकता है। सुश्री दीना त्रिवेदी ने कहा कि राजनीति, चिकित्सा, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में भारत विश्व का मुकुटमणि की तरह चमकता था। इसका मूल कारण यहाँ की शिक्षण पद्धति थी। तब गुरु-आचार्य अपने आचरण से अपने विद्यार्थियों को शिक्षण दिया करते थे। आज उस शिक्षण प्रणाली की फिर से आवश्कयता है। उन्होंने कहा कि बच्चों का समुचित विकास करना हो, तो सर्वप्रथम घर-परिवार का माहौल खुशनुमा बनाये, तत्पश्चात शिक्षण संस्थानों के प्रति आदर का भाव बच्चों में पैदा करें।

            इससे पूर्व विभिन्न जिलों से आये प्रतिभागियों ने विद्यार्थी जीवन में आने वाली समस्याओं एवं उसका निराकरण के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। सभी ने एकमत से स्वीकार किया कि बाल्यावस्था से ही बच्चों में सुसंस्कार, अच्छे विचार व बड़ों के प्रति आदर के भाव पैदा करने चाहिए। स्कूलों में शिक्षा के साथ-साथ नैतिक जीवन के उत्थान के लिए श्रेष्ठ कहानियों एवं महापुरुषों के जीवनियों पर समूह चर्चा करने चाहिए। उन्होंने व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र के नव निर्माण के लिए, शिक्षा के साथ-साथ सांस्कृतिक मूल्यों के विकास के लिए सामूहिक प्रयास करने पर बल दिया। परिषद् के पदाधिकारियों ने संगोष्ठी में मिले ज्ञान को अपने जीवन में उतारने एवं बच्चों को आगे बढ़ाने की बात कही। परिषद के अध्यक्ष राजेन्द्र वाजपेयी ने कहा कि शांतिकुंज जैसे गायत्री तीर्थ में आना तभी सार्थक होगा, जब अपने अंदर की एक बुराई को छोड़ें और एक अच्छाई को ग्रहण करें। 




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