गुरुपूर्णिमा पर्व पर विशेष सद्गुरु की कृपा के अवतरण का महापर्व

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हम चाहे जो हों, जैसे हों, गुरु हममें से हर एक के जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। अपने जीवन के अतीत के बारे में सोचें, वर्तमान को परखें और भविष्य पर नजर डालें तो समूचा अस्तित्व एक साकार प्रश्न लगेगा। इस गहरी आत्मसमीक्षा में इस सत्य की स्पष्ट अनुभूति होगी कि सार्थक जीवन के लिए हमें एक दिशा, एक उद्देश्य एवं एक लक्ष्य की आवश्यकता है। इसके बिना हमारा समूचा जीवन प्रायः एक भटकन में ही बीत जाता है। हालाँकि हम जीवनभर तरह- तरह के सुखों में जीवन की सार्थकता को खोजने की कोशिश करते हैं, किंतु अंत में हमें इन सुखों की भ्रामक प्रकृति की अनुभूति होती है और बुढ़ापे में ऐसा लगने लगता है कि हम तो ठगे गए। अब तक जो किया, जो पाया वह सब व्यर्थ और अर्थहीन था।

हालाँकि सारा जीवन हम यही कहते रहते हैं कि न तो एक पल को चैन है और न ही एक पल की फुरसत है। जाने- अनजाने कुछ खोजते रहते हैं। अनेकों दरवाजे खटखटाते हैं, पर असफल होकर लौटते हैं। धन- प्रतिष्ठा के पीछे भागते रह जाते हैं। यदि जिस किसी तरह हमें हमारे काल्पनिक सुखी एवं सफल जीवन के सभी साधन- सौंदर्य, सुख, संपत्ति और सफलताएँ उपलब्ध भी हो जाएँ तो भी एक असुरक्षा की भावना हमें रह- रहकर परेशान करती रहती है। इस सभी साधनों के खो जाने का भय, बुढ़ापे और मौत का डर एकांत के क्षणों में हमें व्याकुल करता रहता है और यह व्याकुलता हमारे मन- मस्तिष्क के टुकड़े- टुकड़े कर देती है।

जीवन की यह भटकन प्रायः सभी के साथ होती हैं केवल ज्ञानीजन ही जीवन के संदेश को समझ पाते हैं वे ही सहजता से यह स्वीकार कर पाते हैं कि भौतिक सुख- सुविधाओं की अपेक्षा अन्य महत्वपूर्ण चीजें भी हैं। यह ज्ञान उन्हें अंतर्मुखी बनाता है तथा वे जीवन के अधिक अर्थपूर्ण संबंधों की खोज करने लगते हैं। यही ज्ञान उन्हें अंतरात्मा की खोज की ओर उन्मुख भी करता है और तभी यह बात समझ में आती है कि समस्या जगत् में एवं गुणों में नहीं, बल्कि हमारे अपने में ही है। हम अपनी सामान्य जीवनशैली के माध्यम से साँसारिक वस्तुओं को अपरिवर्तनशील, स्थायी एवं चिरंतन सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। पर यह तो हमारे दृष्टिकोण की गलती है। विश्व के साथ स्थायित्व या स्थिरता जैसी कोई बात है ही नहीं। सतत् गतिशीलता ही विश्व का पर्याय है। सृजन, पोषण एवं विध्वंस तो प्रकृति के नियम है। इसे हममें से कोई नहीं रोक सकता।

इसके बावजूद हमें सदा ही एक ऐसा तत्व उपलब्ध है, जो पूर्ण अनंत एवं शाश्वत हैं यह तत्व हमारे स्वयं आपने अंदर ही स्थित है। इसे कहीं बाहर नहीं खोजना है। ज्ञानीजनों ने इसे ही आत्मा कहा है। इस तत्व का संबंध हमारे भौतिक अस्तित्व या अहंकार से नहीं है जिसके साथ हम प्रायः अपना तादात्म्य स्थापित करते रहते हैं। यह तत्व तो वह सत्य है, वह आत्मा है, जो हमें अपने शाश्वत सुख का आमंत्रण देता रहता है।

इसके सतत् आमंत्रण के बाद ही हम इससे वंचित रहते हैं, तो इसका एकमात्र कारण है सद्गुरु का अभाव। क्योंकि अंतरात्मा की यात्रा का यह मार्ग लंबा, संकटापन्न, तलवार की धार के समान तीक्ष्ण तथा गुप्त आपदाओं से भरा है। हम इस पथ को भला कैसे जान सकते हैं। सवाल सिर्फ लंबी एवं आपदाओं से भरी हुई यात्रा पर रवाना होने का नहीं है, सवाल उस जीवनलक्ष्य का भी है, जो हमें मालूम ही नहीं है, ऐसी स्थिति के लिए ही तो गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने कहा है, “गुरु बिनु होहिज्ञान” अर्थात् गुरु के बिना इसका ज्ञान नहीं होता।



जिन महनीय जनों ने गुरु- शिष्य संबंधों की खोज की, उन्हें सामाजिक, साँसारिक संबंधों की सीमाओं के बारे में पूरा ज्ञान था। वे जानते थे कि सामान्य संसारी व्यक्ति चाहे वह हमारा कितना ही सगा या घनिष्ठ क्यों न हो, हमारा मार्गदर्शक नहीं हो सकता। इसके लिए परम प्रज्ञावान् एवं अनुभवी व्यक्ति की आवश्यकता है, भले ही वह साँसारिक दृष्टि से धन, पद अथवा प्रतिष्ठा रहित हो।

अनेक लोग तर्क प्रस्तुत करते हैं कि गुरु आवश्यक नहीं है, वास्तविक गुरु तो हमारे अंदर है। यह बात सैद्धांतिक रूप से सच भी है, परंतु हम में से ऐसे कितने लोग हैं जो अंतःकरण में स्थित सद्गुरु की आवाज को सुनते- समझते हैं। उसके निर्देशों को समझते एवं आचरण में लाते हैं। यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि मनुष्य की मानसिक अवधारणाएँ सीमित एवं स्थूल है। मानव- मन विक्षुब्ध वासनाओं, इच्छाओं एवं महत्त्वाकाँक्षाओं का संगम है। इस हलचल के बीच अंतःस्थिति सद्गुरु की आवाज को सुनना भला कैसे संभव हो सकता है। उसकी आवाज तो नीरवता की, शाँति की आवाज है। यदि हम अपनी नीरवता की इस आवाज को सुनना- समझना चाहते हैं, तो हमें अपने मन के आँतरिक कोलाहल को बंद करना पड़ेगा। परंतु हम तो सामान्यक्रम में अपने मन की संरचना ही नहीं समझते। हमें यह भी नहीं मालूम कि हम आसक्ति, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा और वासना का अनुभव क्यों करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम कोलाहल को दबाने का जितना प्रयास करते हैं, उसी आवाज उतनी तीव्र होती चली जाती है।

इस आँतरिक अशाँति को रोकने के लिए ही हमें गुरु की आवश्यकता होती है। वे ही उन विधियों के विशेषज्ञ हैं, जिनके द्वारा शरीर, मन एवं अंतरात्मा का नियंत्रण व नियमन होता है। वे ही वह मार्ग दिखा सकते हैं जिस पर चलकर हम अपने मन की उन नकारात्मक प्रवृत्तियों को बदल सकते हैं, जो हमारे आत्मविकास में बाधा है।

गुरु ज्ञान की प्रज्वलित मशाल है। भौतिक शरीरधारी होने पर भी उनकी आत्मा उच्च एवं अज्ञात जगत् में विचरित रहती है। वह अपने लिए नहीं, बल्कि हमारे लिए इस धरती से जुड़े रहते हैं। उनका प्रयोजन स्वार्थ रहित है। उनकी न तो कोई इच्छा होती है और न ही आकाँक्षा। ये गुरु ही हमारे जीवन की पूर्णता होते हैं। वे पवित्रता, शाँति, प्रेम एवं ज्ञान की साक्षात् मूर्ति हैं। वे साकार भी हैं और निराकार भी। देहधारी होने पर भी देहातीत हैं। देहत्याग देने पर भी उनका अस्तित्व मिटता नहीं, बल्कि और अधिक प्रखर हो जाता है।

उन्हें पाने के लिए, उनसे मिलने के लिए आवश्यक है हमारी चाहत। इसके लिए अनिवार्य है हमारे अपने अंतर्मन में उभरती तीव्र पुकार। गुरुपूर्णिमा का महापर्व हममें से हर एक के लिए यही संदेश लेकर आया है कि हमारे गुरुदेव हम सबसे दूर नहीं है। वे देहधारी होने पर भी देहातीत थे और अब देह का त्याग कर देने पर तो सर्वव्यापी हो गए है। उनका सदा ही यह आश्वासन है कि उन्हें पुकारने वाला उनके अनुदानों से कभी भी वंचित नहीं रहेगा।

जीवन में हमारी कोई भी भूमिका हो। हम धनी हों या गरीब, सुखी हाँ या फिर दुखी, स्वस्थ हो अथवा नीरोग, हमारी चेतना विकसित हो या अविकसित, हममें से हर एक के लिए गुरुदेव के पास कुछ- न अवश्य है। उनके पास हम सभी लोगों के लिए एक- न संदेशा है। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में कभी भी किसी तरह की कठिनाइयों का अनुभव नहीं किया है, वह भी यह बात दावे के साथ नहीं कह सकता कि उसके जीवन में निराशा, असंतोष व रिक्तता के पल- क्षण नहीं आए। गुरुदेव हम सभी के जीवन की इस रिक्ताता की पूर्ति करने के लिए कृत- संकल्प है। गुरुपूर्णिमा उस तपोमूर्ति गुरुदेव के श्रद्धापूर्वक आह्वान एवं हम सबके जीवन में उनकी कृपा के अवतरण का पर्व है।

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