देव संस्कृति विश्वविद्यालय का ज्ञानदीक्षा समारोह

Published on 2017-12-27
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  • मंचासीन विशिष्टट महानुभावों की मार्मिक प्रेरणाएँ
  • अध्यात्म के अवलम्बन से आत्मजागृति की ओर बढ़ें, सेवाधर्म अपनाएँ, महामानव बनें
देव संस्कृति विश्वविद्यालय का २५वाँ ज्ञानदीक्षा समारोह १३ जुलाई २०१४ को विवि के मृत्युंजय सभागार में सम्पन्न हुआ। इस सत्र में प्रवेश ले रहे विद्यार्थियों को सामान्य से मानव की आत्मिक शक्ति और प्रतिभा को जगाकर उसे महामानव बनने के पथ पर अग्रसर कराने के देव संस्कृति विश्व विद्यालय के मूलभूत उद्देश्य को भलीभाँति समझने का सुयोग प्राप्त हुआ।  करोड़ों युवाओं के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं का प्रचार-विस्तार कर रहे रामकृष्ण मिशन दिल्ली के अध्यक्ष स्वामी शांत आत्मानंद और सुप्रसिद्ध समाजसेवी मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉ. प्रकाश आमटे ज्ञानदीक्षा संस्कार समारोह के मुख्य अतिथि थे। प्रखर अध्यात्मवेत्ता, वैज्ञानिक और विश्व को नयी दिशा-उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाने वाले युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव के महान शिष्य देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति  माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने समारोह की अध्यक्षता की। अध्यात्म और समाज सेवा के शिखर पुरुषों ने अपने अनुभव साझा करते हुए विद्यार्थियों को जीवन लक्ष्य निर्धारित करने की प्रेरणाएँ दीं। उनके  विचारों के त्रिवेणी संगम में स्नान करना सभी के लिए रोमांचकारी था। इस अवसर पर कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या एवं कुलसचिव श्री संदीपकुमार भी मंचासीन थे। 


समारोह की रूपरेखा
विशिष्ट महानुभावों द्वारा दीप प्रज्वलन से ज्ञानदीक्षा समारोह का शुभारंभ हुआ। शांतिकुंज के युग गायकों की सरस प्रस्तुतियों ने सभागार में विराजमान हजारों शिक्षक-विद्यार्थियों की मनोभूमि को ज्ञान-बीज के आरोपण के अनुकूल बनाया।

कुलपति श्री शरद पारधी ने स्वागत-परिचय परक उद्बोधन दिया। उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव द्वारा दिये चार मंत्र-समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का मूलमंत्र बनाने और सदा याद रखने की प्रेरणा विद्यार्थियों को दी। 

प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि यह विश्वविद्यालय एक विशाल देव परिवार है। यहाँ सभी एक-दूसरे के हितों का ध्यान रखते और सबके विकास के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। उन्होंने देव संस्कृति विश्वविद्यालय में रहकर ज्ञानार्जन करने के लिए मिले अवसर को आज के युग में ऋषियों के हिमालय वास जैसा सौभाग्य बताया। उन्होंने कहा कि बाहरी दुनिया के आकर्षण और मूढ़ परंपराओं को भूलकर वे केवल आत्मनिर्माण की चेष्टा करें, निर्धारित अनुशासन-अनुबंधों का पालन करते हुए गुरु-शिष्य की उदात्त परंपरा का पालन करें। 

श्री सूरज प्रसाद शुक्ला ने ज्ञानदीक्षा का वैदिक कर्मकाण्ड सम्पन्न कराया। कुलाधिपति जी ने विद्यार्थी जीवन से जुड़े वेदोक्त अनुशासन और निर्धारणों की व्याख्या की, उनके पालन के संकल्प दिलाये। तत्पश्चात सभी विद्यार्थियों को विवि. के प्रतीक धारण कराये गये। 

समारोह का संचालन श्री गोपालकृष्ण शर्मा और श्री अंकुर मेहता ने किया। समारोह में मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त डॉ.मंदाकिनी, शांति निकेतन के पूर्व कुलपति डॉ. दिलीप सिन्हा की उल्लेखनीय उपस्थिति थे। 

  •  स्नातकोत्तर, स्नातक, डिप्लोमा और प्रमाण पत्र के ३४ पाठ्यक्रमों के लिए ५९५ विद्यार्थियों का चयन हुआ। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के अलावा नोएडा, पटना, भोपाल, राजनांदगाँव, जयपुर, हैदराबाद, जोधपुर, वडोदरा, नागपुर एवं कोलकाता में भी प्रवेश परीक्षा केन्द्र बनाये गये थे, जिनमें से चयनित विद्यार्थियों के साक्षात्कार के आधार पर इन विद्यार्थियों का चयन किया गया। 
  •  देश के जम्मू से लेकर अंडमान निकोबार तक देश के अधिकांश राज्यों के विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। जापान और ऑस्ट्रेलिया के विद्यार्थी भी शामिल हुए।
  •  आदरणीय डॉ. साहब ने कहा, ‘‘हमारे विद्यार्थी स्वामी विवेकानंद के सपनों का भारत बनाने की ओर अग्रसर हैं।’’


माननीय डॉ. प्रणव पण्ड्या,  कुलाधिपति देव संस्कृति विश्वविद्यालय 
विद्या व्यक्ति को महानता प्रदान करती है। साधनों की अधिकता या वैभव-विलासिता से कोई महान नहीं होता। आत्मबल, साहस जैसे सद्गुण ही वह विभूतियाँ है, जिन्हें पाकर व्यक्ति महापुरुष बनता जाता है। वे ऊँचे आदर्शों के लिए जीते और अपने राष्ट्र को ऊँचा उठाते हैं। 

मनुष्य जीवन परमात्मा का सबसे बड़ा अनुदान है। इसकी सार्थकता पशुओं की तरह केवल अपने और अपने परिवार के लिए जीने में नहीं, लोकमंगल के रास्ते पर चलने में है। अपनी विभूतियों को, अपनी क्षमताओं को पहचानो, उनके विकास की साधना करो जो समाज और राष्ट्र की बड़ी सेवा कर सकती हैं।  हमें ऐसे ही सौभाग्यशाली महापुरुषों का अनुगमन करना चाहिए, जिन्होंने यह पथ अपनाया और लाखों करोड़ों के अपने हो गये। 


डॉ. प्रकाश आमटे, 
मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त समाजसेवी
मुझे सेवा के संस्कार अपने पिता बाबा साहेब से मिले हैं। हम निःस्वार्थ सेवा और प्रेम के बल पर बीहड़ जंगलों में भी आदिवासियों की सेवा कर अथाह आत्मसंतोष अनुभव कर रहे हैं। प्रेम से हिंसक पशुओं को भी अपना बनाया जा सकता है। निःस्वार्थ प्रेम समाज को एक सूत्र में बाँधने का सर्वोत्तम उपाय है। 


स्वामी शांत आत्मानंद, अध्यक्ष, रामकृष्ण मिशन, दिल्ली
शिक्षा ऐसी हो जो व्यक्ति को पूर्णता की ओर ले जाये। भौतिकवादी सोच अपार साधन जुटा सकती है। आत्मबल के धनी सद्गुण सम्पन्न लोग ही उसका सदुपयोग  करते और सुखी होते हैं। जो गुणवान नहीं है, उसके लिए संसाधन नित नयी समस्याएँ खड़ी करते दिखाई देते हैं। 

लोकमंगल के लिए समर्पित जीवन, अपनी संस्कृति की महानता पर प्रबल विश्वास और उसके उत्थान के लिए उदात्त चिंतन का नाम है स्वामी विवेकानंद। देव संस्कृति विश्वविद्यालय स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं का विस्तार कर रहा है। यहाँ के विचार, वातावरण और शिक्षा पद्धति से मैं बहुत प्रभावित हूँ। यहाँ नवयुग के विवेकानंद गढ़े जा रहे हैं। 


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