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२९ अगस्त २०१४ गणेश चतुर्थी विशेष


सन् १८९३, महाराष्ट्र में ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच तनाव अपने चरम पर था। तभी समाज सुधारक लोकमान्य तिलक ने दोनों के बीच विग्रहों को समाप्त करने के उद्देश्य से गणेश उत्सव को सार्वजनिक आयोजन का स्वरूप दिया। देखते- देखते महाराष्ट्र से शुरू हुई यह क्रान्ति पूरे देश में फैल गयी और एकता की मिसाल के रूप में स्थापित हो गई। आज १२१ सालों से निरन्तर गणेश उत्सव मनाया जा रहा है। प्रारम्भ में मिट्टी से निर्मित की गयी गणेश जी की मूर्ति आज प्लास्टर ऑफ पेरिस में परिवर्तित हो गयी जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है। संगठित और सार्वजनिक की प्रेरणा आज बड़े बड़े मण्डपों और मित्र मण्डलियों में परिवर्तित होती जा रही है। लगता है जैसे पर्व उत्सव बनके रह गया है।

गणेश शब्द का अर्थ होता है- जो समस्त जीव जाति के ‘ईश’ अर्थात् स्वामी हो- गणानां जीवजातनां यः ईशः सः गणेशः। श्री गणेश जी सर्वस्वरूप, परात्पर, पूर्ण ब्रह्म, साक्षात् परमात्मा हैं।

गणेश जी को विनायक भी कहते हैं। विनायक शब्द का अर्थ है- विशिष्ट नायक। जिसका नायक नियन्ता विगत है अथवा विशेष रूप से ले जाने वाला। वैदिक मत में सभी कार्य के आरम्भ जिस देवता के पूजन से होता है, वही विनायक है। विनायक चतुर्थी या गणेश चतुर्थी का व्रत सिंहस्थ सूर्य, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी और हस्त नक्षत्र के योग में होता है।

गणेश जी के पूजन सामग्री में दुर्वा, शमी और मोदक को मुख्य माना गया है, क्योंकि ये वस्तु गणेश जी को प्रिय हैं। दुर्वा अर्थात् जीव। जीव सुख- दुःख को भोगने के लिए जन्म लेता है। इस सुख- दुःख रूप द्वन्द्व को, दो दुर्वाओं के युग्म को पूजन में समर्पित किया जाता है। शमी वृक्ष को वहि वृक्ष कहते हैं। वहि का पत्र गणेश जी को प्रिय है। वहि पत्र से गणेश जी को पूजने से जीव ब्रह्म भाव को प्राप्त करता है। गणेश विवेक के देवता कहलाते हैं। गणेश जी को दो प्रमुख प्रिय वस्तुदुर्वा और शमी के पीछे की प्रेरणा पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी है। आज जहाँ जंगल कटते जा रहे हैं और शहरों में सीमेंट की दुर्वाएँ बिछाई जा रही हैं, मिट्टी की जगह प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियाँ निर्मित की जा रही हैं, ऐसे में हमें इस पर्व पर पुनः विचार करना ही होगा।

गणेश को तीसरी प्रिय वस्तु मोदक है। मोदक आनन्द का प्रतीक है। सदैव आनन्द में निमग्न रहना और ब्रह्मानन्द में लीन हो जाना मोदक का गुण व अभिप्राय है। मोदक देखने में गोल आकार का होता है और गोल महाशून्य का प्रतीक है। यह समस्त वस्तु जगत जो दृष्टि की सीमा में है अथवा उससे परे है, शून्य से उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है। शून्य की यह विशालता पूर्णत्व है और प्रत्येक स्थिति में पूर्ण है। पूर्णता प्रणव का गुण है, अतः गणेश प्रणव के प्रतीक हैं। 
१२० साल की इस लम्बी यात्रा के बाद पुनः गणेश चतुर्थी को प्रेरणा और संकल्प के रूप में युवाओं में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। जहाँ प्लास्टर ऑफ पेरिस के कारण पर्यावरण का दोहन बढ़ रहा है, वहीं परम्परा के नाम पर फुहड़ता और अविवेकी आचरण गणेश उत्सव की मूल प्रेरणा से दूर होता जा रहा है।

हमारे सामूहिक प्रयास से सन् १९४७ में मिली राजनयिक आजादी को अब सामाजिक आजादी के रूप में परिवर्तित करने का श्रीगणेश भी होना चाहिए। आओ, इस वर्ष २९ अगस्त को पड़ने वाले इस महापर्व पर हम संकल्प लें और दूसरों को प्रेरणा दें कि मिट्टी से निर्मित मूर्ति की स्थापना, एक वृक्ष रोपण एवं सामूहिकता के सद्भावना को अपनाकर गणेश पर्व को मनाएँ। इससे पर्यावरण संरक्षित भी होगा और सामाजिक सद्भावना भी बढ़ेगी।

(लेखक देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, शान्तिकुञ्ज- हरिद्वार के कुलाधिपति हैं) 


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