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संस्कारों के माध्यम से चेतना जगत के महान वैज्ञानिक ऋषियों ने मानव तत्त्व का गहन विश£ेषण एवं अध्ययन करने के पश्चात्ड्ढ इस तथ्य की घोषणा की कि मृत्यु के बाद शरीर के साथ-साथ आत्मा समाप्त नहीं हो जाती। उसका अपना अस्तित्व बना रहता है। आत्मा अमर, अजर, सत्य और शाश्वत है। जिस प्रकार पुराने, जीर्ण वस्त्र त्याग करके मनुष्य नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा जीर्ण शरीर का त्याग करके नया शरीर धारण करती है।
जब जीवात्मा एक जन्म पूरा करके अपने दूसरे जीवन की ओर उन्मुख होती है, तब जीव की उस स्थिति को भी एक विशेष संस्कार के माध्यम से बाँधा जाता है, जिसे मरणोत्तर संस्कार या श्राद्ध कर्म कहा जाता है। यह संस्कार बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसके बाद जीवात्मा का और कोई संस्कार सम्पन्न नहीं किया जाता।
श्राद्ध भारतीय संस्कृति में ही नहीं, संसार के लगभग सभी धर्मों, सम्प्रदायों और पंथों के लोग अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार इसे सम्पन्न करते हैं। भारतीय देवसंस्कृति में वैसे तो नित्यप्रति प्रातरू संध्या उपासना के बाद तर्पण करने का विधान है, लेकिन प्रतिदिन न कर सकें, तो कम से कम वर्ष में एक बार तो अवश्य ही पितरों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति श्राद्ध-कर्म के माध्यम से की जानी चाहिए।
आज वैज्ञानिक सूक्ष्म तंरगों की सामथ्र्य को मानते हैं। श्राद्ध तर्पण में भी तरंगों की प्रमुख भूमिका है। मनुष्य शरीर में भिन्न-भिन्न मुद्राओं से विशेष जैव विद्युत् पैदा होती है। इसके साथ जब प्रगाढ़ श्रद्धा की भाव तरंगें जुड़ जाती हैं, तो वे वैसी ही शक्तिशाली बन जाती हैं, जैसी इलेक्ट्रोमैग्रेटिक वेव्ज पर साउण्ड कर सुपर कम्पोज रिकार्ड कर दिया जाता है और वे पलक झपकते ही सारे संसार की परिक्रमा कर लेते हैं।
यह शक्तिशाली सूक्ष्म भाव तरंगें उन पितरों के लिए तृप्तिकारक और आनन्ददायक होती हैं, जिनके लिए विशेष रूप से श्राद्ध तर्पण किया जाता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर  हमारे ऋषियों ने तर्पण के क्रम में अलग-अलग दिशाओं में मुख करके अलग-अलग मुद्राओं द्वारा जल की अंजलि श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ समर्पित करने की व्यवस्था बनाई है।
तर्पण के पश्चात्ड्ढ पंचयज्ञ सम्पन्न करने का विधान है। इससे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उसे पितरों के कल्याणार्थ लगाया जाता है। इस क्रम में ब्रह्मड्ढयज्ञ के अंतर्गत पितरों की शांति सद्गति के लिए मानसिक जप करने का विधान है। देवयज्ञ में परमार्थपरक गतिविधियों को निश्चित समय तक के लिए अपनाने का संकल्प लिया जाता है। तो पितृयज्ञ के तहत पिण्डदान के रूप में पितरों के प्रति हविष्यान्न के माध्यम से श्रद्धाभिव्यक्ति की जाती है। विभिन्न योनियों में संव्याप्त जीव चेतना की तुष्टिड्ढ हेतु पंचबलि यज्ञ सम्पन्न करने का भी प्रावधान है।
श्राद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं अंतिम चरण है मनुष्य यज्ञ या श्राद्ध का संकल्प। इसके अंतर्गत दान का विधान है। दान में कई प्रकार का दान दिया जाता है। दान से पुण्य मिलता है, ऐसी मान्यता है और उस पुण्य को पितरों के कल्याणार्थ लगाया जाता है।
युगऋषि  पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने तो विश्व मंगल के उच्च आदर्शों की पूर्ति के लिए सत्पात्रों के हाथों जो धन दिया जाता है, उसे दान कहा है। इसलिए स्वर्गीय आत्मा की स्मृति में श्राद्ध के अवसर पर कोई ऐसे शुभ कार्य आरंभ किये जाएँ, जिनसे समाज का स्थायी हित हो सके और उस हित का पुण्य चिरकाल तक पितरों को मिलता रह सके। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार


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