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भारतीय देवसंस्कृति की परंपरा में धार्मिक त्यौहारों की भी एक समृद्ध शृंखला है, जिसमें रक्षाबंधन पर्व भी अनादि काल से वसुधैव कुटुम्बकम् की स्नेहमयी भावना का मंत्र फूँक रहा है। भाई- बहिन के पवित्र प्रेम का यह भावना प्रधान पर्व संस्कृति की विजय का भी उद्घोष करता प्रतीत होता है, यही कारण है कि मानवीय संबंधों की मधुरता या सरसता के प्रतीक इस त्यौहार को सम्पूर्ण देश आत्मीयता के साथ मनाता चला आ रहा है। 
      भारतीय संस्कृति में कच्चे धागों की भावनात्मक एकता को प्राचीन काल से देखा जा सकता है। इस भावनात्मक एकता का सूत्र बंधन का संबंध मनुष्य के अतिरिक्त प्रकृति से भी है, जो पवित्रता का सूचक है। यही कारण है कि हमारे देश में धरती, वृक्ष, पर्वत, पत्थर सभी की पूजा होती आ रही है। वट, पीपल, तुलसी, आँवला, केला के पवित्र वृक्षों में रक्षा सूत्र बाँधना प्राचीन काल से चला आ रहा है। राखी बाँधते समय बहिन के भाव होते हैं कि उसकी भ्राता के द्वारा रक्षा सदैव होती रहे, जिसे प्रत्येक भारतीय स्वीकार- करता है। रक्षा सूत्र वैसे तो केवल कच्चा धागा ही होता है, लेकिन इसमें जब श्रद्धा भावना की शक्ति समाहित हो जाती है, तो यह साधारण धागा मात्र नहीं रह जाता है, उसे तोडऩा असंभव होता है। 
      प्राचीनकाल से ही हम कच्चे धागे का उपयोग प्रकृति और मानवीय व्यवहार में करते आ रहे हैं। धार्मिक संस्कारों में तो कच्चे धागे का प्रचलन बहुत ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है और यह कच्चा सूत्र जब मंत्र से अभिमंत्रित हो जाता है, तो वह सूत्र सुदृढ़ बंधन बन जाता है जो पूर्णतया रक्षा कवच का कार्य करता है। 
      रक्षाबंधन का त्यौहार केवल मात्र रक्त संबंध का ही सूचक नहीं है, अपितु उसका प्रभाव अपरिमित क्षेत्र तक विस्तृत है, जहाँ संबंधों में प्रेम, सौहार्द, त्याग और पवित्रता की भावना हो। रक्षा सूत्र से एक अनजान और विजातीय को भी भाई- बहिन बनाने के आदर्श संबंधों के इतिहास के पन्ने सुशोभित है, चूँकि रक्षाबंधन का शाब्दिक अर्थ ही है- रक्षा का बंधन, जो इस बंधन से बँध जाता है, वह अपने प्राण का उत्सर्ग करके भी रक्षा करता है। 
      साहित्य और इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, जिनमें राखी के कच्चे धागे ने कायरों में भी प्रेरणा और साहस भरकर देश और धर्म के नाम पर न्यौछावर होकर अपना नाम रोशन किया है। राखी की लाज की मर्यादा के निर्वाह के लिए शत्रुओं पर उठे हाथ भी काट दिए गए हैं। राखी ने अगणित शत्रुओं को मित्र बनाया है। इतिहास साक्षी है कि मुगल- बादशाह हुमायूँ और राणा साँगा में घोर शत्रुता थी, परन्तु जब गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने अपने पूर्वजों की पराजय का बदला लेने के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया, तब महारानी कर्मावती ने अपने पुत्र युवराज उदयसिंह की सुरक्षा के लिए हुमायूँ को राखी भेजी थी। जैसे ही हुमायूँ को राखी मिली, तो वह पुरानी शत्रुता को भूलकर बंगाल की विजय अधूरी छोडक़र तुरन्त चित्तौड़ की ओर सेना लेकर रवाना हुआ। हुमायूँ जब बंगाल से लम्बी यात्रा करके चित्तौड़ पहुँचा, तब तक चित्तौड़ का पतन हो चुका था। महारानी कर्मावती अपनी सहेलियों के साथ जौहर व्रत करके भस्मीभूत हो चुकी थीं। फिर भी हुमायूँ ने बहादुर शाह पर आक्रमण करके पराजित किया और महारानी के पुत्र उदयसिंह को गद्दी पर बिठाकर राखी बंद भाई के नाम को उज्ज्वल करके इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित कराया। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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