योग, संस्कृति और अध्यात्म से ही समाज और राष्ट्रोत्थान सम्भव ; डॉ. पण्ड्याजी

Published on 2017-12-27

देसंविवि में इण्टर नेशनल योगा फैस्टिवल का आगाज़
एक ही धर्म की ओर प्रेरित करते योग, संस्कृति अध्यात्म; पद्मश्री डॉ. कार्तिकेयन !
इण्डियन कल्चर ही होगा फ्यूचर का वर्ल्ड कल्चर; पैट्रिक मैक्यूलम
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 तीर्थ नगरी हरिद्वार स्थित देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में पाँच दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय योग, संस्कृति एवं अध्यात्म महोत्सव का शुभारम्भ हुआ। २ से ६ अक्टूबर तक चलने वाले इस महोत्सव का देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने दीप जलाकर शुभारम्भ किया। इस अवसर पर युनाईटेड स्टेट ऑफ अमेरिका के स्प्रिचुअल लीडर एवं गाँधी पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध समाज सुधारक मि० पैट्रिक मैक्यूलम, पद्मश्री डॉ. डी.आर. कार्तिकेयन एवं मुद्रा विज्ञान विशेषज्ञ स्वामिनी काली सहित अनेक गणमान्य एवं विदेशों से आए २०० योग विशेषज्ञों, प्रशिक्षु व विवि के समस्त आचार्य, विद्यार्थी मौजुद थे।

महोत्सव में सर्वप्रथम देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने प्रतिभागी महानुभावों का स्वागत सम्मान किया। उन्होंने कहा कि आज जहाँ जन सामान्य की रुचि भोदवाद की ओर उन्मुख होती देखाई देती है, वहीं योग, संस्कृति और अध्यात्म की ओर आप लोगों का उत्साह एवं इनको आगे बढ़ाने की प्रयत्नशीलता निश्चय ही सराहनीय एवं खुशी का विषय है। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय प्रारम्भ से ही इस दिशा में जागरूक, सक्रिय एवं कार्यरत है। विवि में विभिन्न पाठ्यक्रमों के साथ साथ योग, संस्कृति व अध्यात्म विषय के प्रशिक्षणों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्होंने कहा कि मानव जीवन को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने एवं महानता की ओर अग्रसर करने में इन तीनों की ही भूमिका महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य है, इसलिए इनका प्रशिक्षण के साथ साथ इन्हें व्यवहार में उतारने व जीवन के अभिन्न अंग बनाने हेतु विद्यार्थियों को प्रेरित किया जाता है।

कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा, योग, संस्कृति और अध्यात्म जहाँ व्यक्तिगत जीवन को ऊँचा उठाने और महानता की ओर अग्रसर करने में महान योगदान देते हैं, वहीं राष्ट्र की प्रगति और समुन्नति में भी इन माध्यमों की प्रशंसनीय भूमिका रहती है। चूँकि देशोन्नति व राष्ट्रोत्थान के मूल में व्यक्ति के चरित्र चिन्तन की उत्कृष्टता आधार रूप से कार्य करने वाली होती है, अतः इस दृष्टि से भी योग, संस्कृति और अध्यात्म का महत्त्व बढ़ जाता है। क्योंकि चरित्र चिन्तन को परिष्कृत और उत्कृष्ट बनाने में यौगिक साधनाएँ, सांस्कृतिक प्रेरणाएँ और आध्यात्मिक प्रचोदनाएँ ही अवलम्बन का कार्य करती हैं। डॉ. पण्ड्या ने कहा व्यक्ति, परिवार और समाज उत्थान की धुरी योग, संस्कृति और अध्यात्म है। पर खेद है कि इनकी महत्ता को आज भूला दिया गया है। भोगवादी विचारधाराओं में जन मानस डूबता जा रहा है। चरित्र चिन्तन की अस्तव्यस्तता से जहाँ व्यक्ति का शोचनीय नैतिक पतन हुआ है, वहीं स्वास्थ्य का भी चिन्ताजनक ह्रास हुआ है। ऐसे में योग, संस्कृति और अध्यात्म ही इन सबसे बचाने के आधार अवलम्बन हैं।

पद्मश्री डॉ. कार्तिकेयन ने मानव धर्म व विभिन्न धर्मों के समन्वय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज विश्व में धर्मों की संख्याएँ बढ़ती जा रही है जबकि शाश्वत सनातन धर्म एक है। सम्प्रदाय और मत पन्थ अनेक हो सकते हैं, मगर ईश्वर एक है और उन्हीं की अवधारणा धर्म है। धर्म मानव को परस्पर जोड़ता है। परस्पर जुड़ने को योग भी कहते हैं। ईश्वरत्व अवधारणात्मक संज्ञान वेद हैं और समग्र वैदिक सिद्धान्त और देशनाएँ एक ही धर्म- धारणा की ओर प्रेरित करते हैं। संक्षेप में डॉ. कार्तिकेयन ने योग, संस्कृति और अध्यात्म की तमाम शिक्षाओं और प्रेरणाओं को एक ही धर्म और ईश्वर को समर्पित बताया।

मिस्टर पैट्रिक ने भारतीय योग, संस्कृति और अध्यात्म की खासीयतों पर खुशी जाहीर करते हुए कहा कि यह तीनों व्यैयक्तिक धर्म ही नहीं, समूह धर्म व वैश्विक धर्म की स्थापना करने वाले आधार रूप हैं। विश्व के तमाम राष्ट्रों में सिर्फ सभ्यताएँ हैं जबकि यहाँ मनुष्य जाति को ऊँचा उठाने वाले नेचुराली कल्चर और स्प्रिच्युआलिटी है। निश्चय ही कभी यदि वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक उत्थान होगा तो उसकी प्रेरणाओं के मूल में यही कल्चर ही होगा। मिस्टर पैट्रिक ने देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रशिक्षण प्रणालियों और उसकी सृजन गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा, भविष्य में विश्व के विवियों को धर्मनिष्ठ और राष्ट्रनिष्ठ विद्यार्थी निर्मित करने के लिए इसी प्रणालियों का अवलम्बन लेना पड़ेगा।

महोत्सव में मुद्रा विज्ञान विशेषज्ञ स्वामिनी काली ने कहा, आज यद्यपि शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है, वैज्ञानिक आविष्कार तमाम सुख सुविधाओं के संसाधन खड़े किए हैं, फिर भी कहना होगा कि मनुष्य नैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से काफी पिछड़ गया और दिग्भ्रमित हो गया है। उसे सही दिशा और मार्गदर्शन की जरूरत है। इस महोत्सव के मुख्य विषय योग, संस्कृति और अध्यात्म उसे सही दिशा और मार्गदर्शन देने वाले हैं। अतः योग, संस्कृति, अध्यात्म अवश्यमेव विश्वमानवता की सर्वांगीण उन्नति के आधार हैं।

इससे पूर्व देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलपति शरद पारधी ने विवि के विभिन्न क्रियाकलापों पर जानकारियाँ प्रस्तुत कीं। इस अवसर पर देसंविवि के कुलसचिव संदीप कुमार सहित अनेक गणमान्य मंचासीन थे।



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