शिक्षा के साथ विद्या भी जरूरी : डॉ.प्रणव पण्ड्याजी

Published on 2015-05-13
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देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि जिस दिन शिक्षा के साथ विद्या अर्थात् संस्कृति जीवन में उतर जाये, उस दिन हम महान बन जायेंगे। हमारा जीवन बदल जायेगा। विद्या को जीवन में महत्त्व देने एवं संस्कृतिनिष्ठ होने से ही सेवाभावी बना जा सकता है।

डॉ. पण्ड्याजी शांतिकुंज के भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय शिक्षक गरिमा शिविर को संबोधित कर रहे थे। इस शिविर में गुजरात प्रांत से आए शिक्षक- शिक्षिकाएँ, भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा से जुड़े प्रांतीय व जिला समन्वयक भी सम्मिलित थे। उन्होंने सभ्यता व संस्कृति, शिक्षा व विद्या के अनेक उदाहरणों के माध्यम से मनुष्य के आंतरिक विकास के पहलुओं पर चर्चा करते हुए प्रतिभागियों को संस्कृतिनिष्ठ जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। गीता के मर्मज्ञ डॉ पण्ड्याजी ने गीता आदि ग्रंथों का उद्धरण देते हुए विद्या (अर्थात् अध्यात्म) की सार्थकता पर विस्तार से जानकारी दी।

देवसंस्कृति विवि के कुलाधिपति डॉ. पण्ड्याजी ने कहा कि संस्कृति जिस देश के मूल में हो, उसे कोई हिला नहीं सकता। उस देश के गौरव को कोई मिटा नहीं सकता। वेदों के द्रष्टा- ऋषियों के सत्य को देखा है और कहा कि ऋषि प्रणीत भारतीय संस्कृति विश्व बंधुत्व की भावना का विस्तार करते हुए हमेशा अक्षुण्य बनी रहेगी।

भासंज्ञाप के श्री एच.पी. सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षक गरिमा शिविर के माध्यम से देश के २२ राज्यों के पांच हजार से अधिक शिक्षाविदों एवं प्रांतीय एवं जिला समन्वयकों को प्रशिक्षित किया जायेगा। ये सभी अपने- अपने क्षेत्रों में संस्कृति मंडल का गठन कर विद्यार्थियों में अलख जगाने का भागीरथ पुरुषार्थ करेंगे। उन्होंने बताया कि भा.सं.ज्ञा.प १९९४ में मप्र से प्रारंभ हुआ और यह अब देश के २२ राज्यों में चल रहा है। 



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