देव संस्कृति विश्वविद्यालय में है जीवन का उत्थान, संसार का समाधान

Published on 2017-01-02

३०वें ज्ञानदीक्षा समारोह में मुख्य अतिथि स्वामी परमात्मानन्द सरस्वती जी ने विद्यार्थियों को दिया मार्मिक संदेश

आप कुछ विशेष हैं
आप यहाँ इसलिए उपस्थित हैं क्योंकि आप कुछ विशेष हैं। उन विशेषताओं को उभारने का, भावनात्मक उत्थान का यहाँ आपको भरपूर वातावरण मिलेगा। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यहाँ आपको सार्थक जीवन की अनुभूति होगी, परम पूज्य गुरुदेव का सूक्ष्म संरक्षण मिलेगा। अपने जिज्ञासु भाव को बनाये रखें तो यहाँ हर पल आपको कुछ न कुछ सीखने का अवसर मिलेगा।
कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने देव संस्कृति विश्वविद्यालय के ३०वें ज्ञानदीक्षा समारोह में अपने विद्यार्थियों में सार्थक जीवन जीने की हूक जगाते हुए इन विचारों के साथ नवप्रवेशी विद्यार्थियों को ज्ञान दीक्षित किया। उन्होंने अपने आशीर्वचनों में विद्यार्थियों को जीवन का उद्देश्य बताया। उन्हें हताशा, निराशा के दलदल में फँसाने वाली युवाओं की वर्तमान सोच के विपरीत जीवन विद्या का मर्म जानने और लीक से हटकर कुछ विशेष करने के लिए प्रेरित किया।

यह ज्ञानदीक्षा समारोह देव संस्कृति विश्वविद्यालय के मृत्युंजय सभागार में दिनांक २ जनवरी को सम्पन्न हुआ। इसमें योग, धर्म विज्ञान एवं समग्र स्वास्थ्य प्रबंधन पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों का ज्ञानदीक्षा संस्कार हुआ। समारोह के मुख्य अतिथि अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संत, हिन्दू धर्म आचार्य सभा के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी दयानंद सरस्वती के परम शिष्य स्वामी परमात्मानन्द सरस्वती थे।

कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन मुख्य अतिथि, माननीय कुलाधिपति जी, कुलपति श्री शरद पारधी एवं प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। युग गायकों की गीत प्रस्तुति ने सद्गुरु के प्रति, जीवन- आदर्शों के प्रति समर्पण भाव बढ़ाते हुए श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कुलपति जी ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में अतिथियों का स्वागत करते हुए ज्ञानदीक्षा की पृष्ठभूमि बतायी।

यह विश्वविद्यालय असाधारण है
डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी ने नवप्रवेशी विद्यार्थियों का स्वागत बड़े उत्साहभरे शब्दों से किया। उन्होंने कहा कि आप किसी साधारण विश्वविद्यालय का हिस्सा नहीं बन रहे। यह चरित्र को प्रामाणिक एवं व्यक्तित्व को उदात्त बनाने वाला, जीवन के उद्देश्य में ऊँचाइयाँ लाने वाला, साक्षरता के साथ जीवन की सार्थकता का बोध कराने वाला विश्वविद्यालय है। यह आप पर निर्भर है कि आप यहाँ से एक कागज का टुकड़ा (डिग्री) लेकर लौटते हो या एक कीमती चीज- जीवन को उदात्त बनाने वाले सूत्रों को धारण करते हैं।

प्रगति की सही दिशा- धारा
मुख्य अतिथि स्वामी परमात्मानन्द सरस्वती जी ने बड़े सरल भाव से अत्यंत गूढ़ ज्ञान दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन एक चाभी की तरह है जो ताला खोल भी सकती है और बंद भी कर सकती है। यह उसके अपने विवेक पर निर्भर है कि वह उसे किस दिशा में घुमाता है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय वह विश्वविद्यालय है जहाँ अपना ही नहीं, सारे संसार का ताला खोलना सिखाया जाता है।

परिवर्तन सारे संसार में हो रहे हैं। उसकी दिशा सही है या गलत, यह स्वयं सोचें और अपना सही मार्ग खोजें। दुनिया आज विकास की ओर बढ़ रही है तो घर- परिवार, देश- समाज और पूरे विश्व में हिंसा, अशान्ति- उद्वेग क्यों बढ़ रहे हैं?
इससे पूर्व कुलाधिपति आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी ने नवप्रवेशी विद्यार्थियों का ज्ञानदीक्षा संस्कार कराया। उन्होंने विद्यार्जन के समय अपनाये जाने आर्ष ग्रंथों में वर्णित अनुशासन सूत्र सभी गुरुजनों की ओर से विद्यार्थियों को समझाये, विद्यार्थियों ने उनके प्रति अपनी सहमति प्रदान की। श्री सूरज प्रसाद शुक्ल एवं श्री गोपाल शर्मा ने ज्ञानदीक्षा का कर्मकाण्ड सम्पन्न कराया। समारोह के अंत में मंचासीन अतिथियों ने ज्ञानदीक्षित विद्यार्थियों को देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतीक- बैज और उपवस्त्र धारण कराये।

माननीय कुलाधिपति जी ने समारोह के आरंभ में मुख्य अतिथि महोदय का पुष्पगुच्छ अर्पण करते हुए स्वागत किया और अंत में देव संस्कृति विवि. का प्रतीक चिह्न, सृजना में बनी गायत्री महामंत्र की शॉल तथा युगऋषि की अनमोल धरोहर उनका साहित्य भेंट करते हुए भावभरा सम्मान किया।

गीता हर विद्यालय, महाविद्यालय में पढ़ाई जाये-आदरणीय डॉ. प्रणव पण्ड्या जी, कुलाधिपति देसंविवि
गीता जीवन प्रबंधन का समग्र ग्रंथ है। यह जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन करती है, व्यक्ति को सही रूप में जीवन जीना सिखाती है। मैं चाहता हूँ कि गीता देश के हर विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाये। मैं इसके लिए निरंतर प्रयास करता रहूँगा। गीता देसंविवि के पाठ्यक्रम में समाहित है। गीता का स्वाध्याय हर व्यक्ति को करना चाहिए।
गायत्री सबकी उपास्य है

स्वामी परमात्मानन्द सरस्वती, मुख्य अतिथि अध्यक्ष हिंदू धर्म आचार्य सभा
मनुष्य में बुद्धि की महत्ता सर्वोपरि है, उसका स्थान शीर्ष पर है। बुद्धि ठीक है तो जीवन ठीक है। धर्म- संप्रदाय कोई भी हो, बुद्धि को श्रेष्ठता की ओर ले जाने की उपासना सब करते हैं, अर्थात् गायत्री सबकी उपास्य है। आचार्य जी (परम पूज्य गुरुदेव) की महती कृपा है कि उन्होंने बुद्धि की रक्षा के लिए गायत्री मंत्र को पुनर्जीवित कर दिया। आंतरिक मूल्यों में दिवालिया होते जा रहे समाज को यह देव संस्कृति विश्वविद्यालय बुद्धि की रक्षा करना सिखाता है।

परिस्थिति नहीं, मनःस्थिति बदलें
डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी, प्रतिकुलपति देव संस्कृति विश्वविद्यालय
हर व्यक्ति आज अपनी परिस्थितियों को बदलने की सोचता है, जो उसके वश मे हर व्यक्ति आज अपनी परिस्थितियों को बदलने की सोचता है, जो उसके वश में नहीं है, लेकिन मनःस्थिति को नहीं बदलता जिसे वह आसानी से बदल सकता है। वह चाहे तो अपने मन, बुद्धि, विचारों को बदलकर उस सुख और आनन्द की अनुभूति कर सकता है जो ऊँचे भोग- विलासों से भी संभव नहीं है। हम चाहते हैं कि जब आप यहाँ से लौटें तो अपने चिंतन, चरित्र, व्यवहार और गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट बनाकर लौटें।

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