आईआईटी
, आईआईएम जैसे अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रतिभागी शामिल
विज्ञान के साथ ऋषि परंपरा को भी अपनायें युवा :: डॉ. प्रणव पण्ड्याजी
आंतरिक क्षमता का विकास प्रकृति से जुड़े रहने में ही संभव :: डॉ. चन्द्रभानु

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में दो दिवसीय इमरजिंग ट्रेंड्स इन कम्प्यूटेशनल रिचर्स एण्ड डेवलपमेंट (ईटीसीआरडी) पर आधारित राष्ट्रीय सेमीनार का शनिवार को शुभारंभ हुआ। सेमीनार में देश के आईआईटी, आईआईएम सहित सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में काम कर रहे विभिन्न विश्वविद्यालय, संस्थानों के वैज्ञानिक, प्रोफेसर्स, डॉक्टर्स भाग ले रहे हैं। सेमीनार में प्रथम दिन कम्प्यूटर के क्षेत्र में हो रही शोधों एवं उसका मानवीय विकास पर विस्तार पर विचार- विमर्श हुआ। सेमीनार के पहले दिन 42 शोध पत्र पढ़े गये।

उद्घाटन समारोह के अध्यक्ष देसंविवि के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कम्प्यूटर के आविष्कार से लेकर आज तक की विकास प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज हम घर बैठे- बैठे दो मिनट में दुनिया के कई सारी चीजों को देख- सुन सकते हैं। कम्प्यूटरीकृत हो रहा समाज विकास तो कर रहा है, पर वहीं भौतिकता की लिप्सा बढ़ने से युवावर्ग का बहुत कम आयु में बुजुर्गों जैसा हाल हो भी रहा है। इस स्थिति से बचने के लिए विज्ञान के साथ ऋषि परंपरा को भी जीवन में अपनाना चाहिए।

सेमीनार के मुख्य अतिथि सेंटर फार कल्चरल स्टीडिस युनिर्वसिटी हवाई (यूएसए) के निदेशक डॉ. चन्द्रभानु पटनायक ने सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपने अनुभवों को बाँटा। डॉ. पटनायक ने कहा कि युवाओं को विज्ञान के साथ- साथ प्रकृति को भी साथ लेकर चलना चाहिए। विज्ञान बाह्य अभिलेखों को स्थायित्व प्रदान करने में सहायक है, लेकिन उसे संजोये रखने के लिए मनुष्य की आंतरिक क्षमता जिम्मेदार है और आंतरिक क्षमता का विकास प्रकृति से जुड़े रहने से ही संभव है। इस अवसर पर कुलाधिपति डॉ. पण्ड्या, डॉ. पटनायक, कुलपति डॉ. सुखदेव शर्मा, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्डया, कुलसचिव संदीप कुमार ने ईटीसीआरडी की स्मारिका का विमोचन किया।

सेमीनार के समन्वयक डॉ. अभय सक्सेना ने कहा कि इस समय कम्प्यूटर की अहमियत से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास ने समाज को न केवल आगे बढ़ाया है, वरन् सोचने- समझने की क्षमता का विकास भी किया है। उन्होंने बताया कि सेमीनार के अंतर्गत देवसंस्कृति विवि के कमेटी हॉल, प्रार्थना सभागार व मृत्युंजय सभागार में अलग- अलग ग्रुपों में पेपर पढ़े गये। उद्घाटन समारोह का संचालन गोपालकृष्ण शर्मा ने किया।
इससे पूर्व सेमीनार में शामिल प्रोफेसर्स, डॉक्टर्स आदि अतिथियों का सभागार में पहुँचने पर देसंविवि के विद्यार्थियों ने मंगल तिलक कर स्वागत किया। मुम्बई, दिल्ली सहित अनेक बड़े शहरों से आये प्रतिभागी भारतीय संस्कृति की इस परंपरा को देख अभिभूत दिखाई दिये।

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