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देवदानवसंवादे मथ्यमाने महोदधौ। 
उत्पन्नोऽसि तदा कुंभ विधृतो विष्णुना स्वयम्॥ गर्ग संहिता॥ 

देव दानवों ने जब क्षीरसागर को मथा तब कुंभ भी उत्पन्न हुआ और स्वयं धन्वन्तरि रूपधारी भगवान् विष्णु ने अपने से धारण किया। श्री विष्णु भगवान् के संकेत पर देवगुरु बृहस्पति के नेतृत्व में इन्द्रपुत्र जयन्त ने उस अमृत कुंभ को उठा लिया। घट फूट न जाये इस हेतु सूर्य को रक्षार्थ नियुक्त किया और अमृत सूख न जाये इस हेतु चन्द्रमा को नियत किया गया। उक्त देवगण अमृतकुंभ को सुरक्षित रखने के लिए तीनों लोकों में घूमे, परन्तु दानवों ने उनका सर्वत्र पीछा किया। भूलोक में दिव्य बारह दिन तक भ्रमण करते हुए उस अमृत कुंभ को चार बार भूमि पर रखने का अवसर आया। कुंभ को रखते और उठाते हुए कुछ अमृतकण इन स्थानों पर बिखर गये। जहाँ- जहाँ वह कुंभ रखा गया था, वे स्थान हरिद्वार, प्रयाग, नासिक (पंचवटी) और उज्जैन थे। दिव्य बारह दिन बारह मानव- वर्षों के बराबर होते हैं, अतः सूर्य चन्द्र और बृहस्पति के योगायोग से बारह वर्ष में उक्त चारों स्थानों में चार कुंभ पर्वों का योग बनता है। 
     यह सम्पूर्ण संसार ‘जीवनवर्धक’ और ‘जीवन संहारक’ दो प्रकार के तत्वों से परिपूरित है। आज की वैज्ञानिक भाषा में आक्सीजन प्रधान पिण्डों को जीवन वर्धक और कार्बन डाई आक्साईड प्रधान तत्वों को जीवन संहारह कहा जा सकता है। उक्त दोनों तत्वों का अनवरत संघर्ष ही वैज्ञानिक देवासुर संग्राम है। हमारी पृथ्वी अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों की गति विगति के तारततम्य से कभी जीवन वर्धक वातावरण से उपप्लुतयुक्त होती है। किस काल में पृथ्वी के किस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है। यह विज्ञान ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारे क्रान्तदर्शी महर्षियों ने भली प्रकार जाना था। 
     बृहस्पति पिण्ड (ग्रह) जीवनवर्धक तत्वों का सर्वप्रधान केन्द्र है और शनिपिण्ड जीवन संहारक तत्वों का। इसीलिए वैदिक वाङ्मय में बृहस्पति का अपर नाम ही ‘जीव’ प्रसिद्ध है तथा शनि महाराज भी अपनी संहारक प्रकृति के अनुसार मारक ग्रह ‘मंद’ के नाम से प्रख्यात हैं। सूर्य के अन्यून द्वादशांश को छोड़कर शेष भाग जीवनवर्धक हैं, वैज्ञानिकों का सुपरिचित, सूर्य के काले धब्बे वाला भाग ही केवल जीवन संहारक तत्वों से युक्त है। चन्द्रमा अमावस्या के निकटकाल में जब क्षीण रहता है, तब वह संहारक प्रभाव डालता है, परन्तु अन्य दिनों में खासकर अपनी पूर्ण अवस्था में जीवनवर्धक रहता है। शुक्र ग्रह सौम्य होता हुआ भी परिपोषक स्वभाव का है, अतः जीवन संहारक तत्त्वों की प्रबलता के समय वह अग्रि को वायु की भाँति संहारकता के प्रवृद्ध करने में सहायक हो जाता है। अतएव इसे आसुरी शक्ति का पुरोधा कहा गया है। मंगल पिण्ड के प्रभाव को केवल रुधिर तक ही सीमित नहीं मानना चाहिए, अपितु बौद्धिक विश्लेषण में उसका प्रभाव नगण्य नहीं है। बुद्ध ग्रह अपना कोई एक स्थिर प्रभाव नहीं रखता, किन्तु उभयविध दो ग्रहों के तात्विक संघर्ष में जब जिसका पलड़ा भारी पाता है, वह उसी प्रकार का प्रभाव मानव जीवन पर छोड़ने लगता है, इसलिए इसे ज्योतिष में क्लीव माना गया है। छायाग्रह राहु, केतु सदैव जीवन संहारक तत्त्वों के परिपोषक हैं। 
     आकाश के बारह विभागों का पारिभाषिक नाम ‘राशि’ है। नक्षत्रों की आकृति के अनुसार उन द्वादश राशियों के ‘मेष’ ‘वृष’ आदि विभिन्न नाम हैं। अनन्त आकाश का कौन- सा राशि नामक प्रदेश किस ग्रहपिण्ड से सदैव प्रभावित रहता है, इस वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार उन- उन राशियों के वे- वे ग्रहपिण्ड स्वामी माने जाते हैं। तदनुसार सूर्य एकमात्र सिंह का स्वामी है और चन्द्रमा केवल कर्क का। परन्तु अन्यान्य भौम आदि पाँच ग्रहों को दो- दो राशियों का स्वामित्व प्राप्त है। इस प्रकार मकर और कुंभ का स्वामित्व शनि को मिला और मेष तथा वृश्चिक का मंगल को, वृष और तुला का स्वामित्व तुला को, मिथुन और कन्या का स्वामित्व बुध तथा धनु तथा मीन का पूर्ण स्वामित्व गुरु को प्राप्त हुआ, सो जब बृहस्पति मारकग्रह शनि की राशि में प्रविष्ट होकर जीवनसंहारक तत्त्वों का अवरोध कर देता है, तो उस समय जीवनवर्धक तत्त्व अत्यधिक प्रबल हो जाते हैं और पृथ्वी के जिस केन्द्रबिन्दु पर वैसा प्रभाव अधिक मात्रा में पड़ता है, उस क्षेत्र को उस समय जीवनवर्धक अमृत कणों से परिव्याप्त बताकर उस वातावरण के सम्पर्क में आने का संकेत ही कुंभ पर्व की वैज्ञानिक आधार शिला बन जाती है। 
     जीवनसंहार- प्रधान ग्रह शनि की खास राशि कुंभ में देवगुरु बृहस्पति प्रविष्ट हो जाते हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा, मंगल की राशि मेष में आ जाते हैं, तो ऐसे ग्रहयोग में हरिद्वार का महाकुंभ होता है तब पंचपुरी क्षेत्र में अमृतमय वातावरण की उपस्थिति हो जाती है। इस समय जो आस्तिक हरिद्वार में आकर कुंभ पर्व के अवसर पर नियमित जीवन बिताते हैं, वे प्रकृति की इस अलभ्य देन से अतीव लाभान्वित होते हैं। 
     दैत्यगुरु शुक्र की राशि वृष में बृहस्पति की उपस्थिति तथा शनि की राशि मकर में सूर्य और चन्द्रमा की अवस्थिति तीर्थराज प्रयाग का महाकुम्भ कराती है। सूर्य के मारक भाग का सीधा प्रभाव जब भूमण्डल पर पड़ता है, तब भादों की भयानक धूप में लौहपुरुष कृषक भी तिलमिला उठते हैं, हरिण काले पड़ जाते है, तब जब सूर्य की राशि सिंह में बृहस्पति का प्रवेश होता है और सूर्य स्वयं भी चन्द्र सहित उक्त राशि पर अवस्थित रहता है। उस अवसर पर गोदावरी के उद्गम स्थान नासिक (पंचवटी) में जीवनमय अमृत कणों की वृष्टि होती है, इसी प्रकार जब सिंहस्थ बृहस्पति हो, मंगल की राशि मेष में सूर्य हो और शुक्र- राशि तुला में चन्द्र हो, तब भगवान् महाकाल के पवित्र क्षेत्र (उज्जयिनी) में अमृत की निर्झरिणी शिप्रा के रूप में प्रवाहित होती है अर्थात् उज्जैन का महाकुंभ उसी समय होता है। 

पूर्णः कुम्भोऽधि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः। 
स इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यङ्कालं तमाहुः परमे व्योमन्॥ अथर्ववेद १९/५३/३ 

अर्थात् विश्व ब्रह्माण्ड भरा हुआ कुंभ, काल के ऊपर स्थापित है। संत- ज्ञानीजन उस काल को (दिवस- रात्रि आदि) विभिन्न रूपों में देखते हैं। वह काल इन दृश्यमान प्राणियों के सामने प्रकट होकर उन्हें अपने में समाहित कर लेता है। मनीषीगण उस काल को विकारों से रहित आकाश के समान (निर्लेप) बताते हैं। इसी प्रकार अथर्ववेद ४/३४/७ में प्रजापति ब्रह्मा जी ने अपनी अमृतमयी वाणी से संबोधित करते हुए कहते हैं- ‘चतुरः कुंभांश्चतुर्धा ददामि’ अर्थात् हे मनुष्यो! मैं तुम्हें लौकिक और पारलौकिक सुखों को प्रदान करने वाले चार कुंभ पर्वों का निर्माण कर चार स्थानों (हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक) पर पहुँच कर देवोपम अमृत को पाकर अमरत्व का पावन संदेश देता हूँ। साधारणतः कुंभ का अर्थ घड़े से ही माना जाता है, किन्तु गहनतापूर्वक अवलोकन- अवगाहन करने पर यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे की ओर भी संकेत करता है। मनुष्य के भीतर भी तो परमात्मा ने विराट् ब्रह्माण्ड की रचना कर रखी है, जिसे कौशल्या, काकभुसुण्डि, यशोदा और अर्जुन देखकर आश्चर्यचकित हो उठे थे। द्रोपदी के घट- घटवासी को पुकारने और अपनी लाज बचाने के पीछे एक ही रहस्य उजागर होता है कि परमात्मा अन्यत्र कहीं नहीं, अपितु अपने भीतर समाविष्ट आत्मतत्व में ही विराजमान है, जिसका अनुभव होने पर मनुष्य मृत्यु से अमरत्व की ओर अग्रसर होता है। अमृत तत्व भी इसी को कहते हैं। रावण की नाभि में अमृत का होना एक ही संकेत करता है कि बिना उसे निकाले मौत नहीं आ सकती थी। साधना मार्ग में यह स्थान मणिपुर चक्र का है। वैज्ञानिकों की दृष्टि से इसी को ‘सोलर प्लक्सस’ के नाम से जाना जाता है। अर्थात् सविता का दिव्य प्रकाश इसी में आलोकित होता है। 
     दूसरे शब्दों में अमृत घट की स्थापना का तात्पर्य अमरता को प्राप्त करना भी कहा जा सकता है। मृत्यु ही तो जीव के लिए सबसे बड़ा भय है। आत्मबोध होना भी एक प्रकार से अमृत तत्व की प्राप्ति ही कहा जा सकता है। देवगण पयस्विनी का पयपान करके ही तो अमर हो गये। हमारा सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ गीता भी तो यही कहती है कि शरीर मरता है, आत्मा नहीं। फिर भी शरीर के साथ मोह- ममता बनाये रखना व्यक्ति की अज्ञानता ही कही जायेगी। चीटीं से लेकर हाथी तक कोई भी छोटा- बड़ा प्राणी क्यों न हो, पर मृत्यु से नहीं बच सकता। शास्त्रकारों ने देवताओं को अमर बताया है। ‘अमरा निर्जरा देवाः’ का उल्लेख भी है, किन्तु देवगण भी पूर्णतया अमर नहीं हैं। हम मृत्युलोकवासियों की अपेक्षा अधिक दीर्घायुष्य को प्राप्त अवश्य होते हैं। उनका एक अहोरात्र मनुष्य के एक वर्ष के समान होता है। छः मास का दिन और छः मास की रात्रि होती है। कहने का तात्पर्य है कि सूर्य भगवान् जितने समय तक उत्तरायण रहते हैं, उतने ही काल तक देवताओं का दिन रहता है और दक्षिणायन की अवधि में रात्रि। इस काल गणना के अनुसार उनकी आयु भी सौ वर्ष तक मानी गयी है। मनुष्य की तुलना में छत्तीस हजार वर्षों से कुछ अधिक ही मानी जाती है। हमारी दृष्टि में वे अजर- अमर ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि इतनी लम्बी अवधि मे मानव की सहस्रो पीढ़ियाँ मिट चुकी होती हैं। उदाहरण के लिए मच्छर और पतंगों की दृष्टि में मनुष्य भी एक तरह से अमर ही दिखायी पड़ता है, क्योंकि मनुष्य के जीवनकाल में उनकी भी हजारों की संख्या में पीढ़ियाँ समाप्त हो चुकी होती हैं। इसलिए देवताओं को भी पूर्णतया अमर कहना कोई तर्कसंगत नहीं है और न शास्त्र सम्मत है। 
     श्रीमद्भगवद् गीता ९/२१ में लिखा है कि स्वर्गलोक के भोगों को और भोगने और पुण्य क्षीण होने के पश्चात् जीव पुनः मृत्युलोक में आता है। इस तरह की मान्यता अमृत के बारे में भी सही- सटीक बैठती है। समुन्द्र मंथन के समय अमृत कलश को लेकर असुर भागे, तो भगवान् ने अपने मोहिनी रूप से मोहित करके किसी भी तरह पृथ्वी के भार को कम किया। भगवती श्रुति में भी ऐसा संकेत है- ‘अपाम सोमममृता अभूम’ अर्थात् हमने सोमपान करके अमरता प्राप्त कर ली। गीता के ९वे अध्याय के २०वें श्लोक में सोमपान से इन्द्रलोक की प्राप्ति का उल्लेख है। वस्तुतः इस तरह के प्रसंग कहीं भी देखने को मिले उन्हें सापेक्षिक अमरत्व की ही संज्ञा दी जा सकती है, जबकि जीवन- मरण के चक्र से मुक्त होने का अर्थ कुछ और ही निकलता है। 
जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु तो निश्चित है। यह परमात्मा को शाश्वत नियम है, जिसे टाला नहीं जा सकता। वैज्ञानिक खोजें भी इस दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठा पायी है। वस्तुतः अमृत तत्व की प्राप्ति का अभिप्राय मनुष्य योनि के पावन प्रयोजन को ही प्राप्त करना है। मृत्यु के विष को समझ लेने के उपरान्त ही जीवन के अमृत को पाया जा सकता है। शास्त्रों में इसी को निःश्रेयस् के नाम से संबोधित किया गया है, जो मानवी काया में ही संभव है। इसी कारण तो इसे सुरदुर्लभ कहा जाता है। यदि देवता अमर रहे होते, तो मानव शरीर में आने के लिए क्यों आतुर बने रहते? 
      देवगणों की अपेक्षा मनुष्य योनि के श्रेष्ठतम मानने के पीछे एक ही रहस्य छुपा है अमृत तत्व की प्राप्ति का जिसे पा लेने के पश्चात् सदा- सर्वदा के लिए यम की यातनाएँ मिटती और जीवन की सच्चाई सामने आ खड़ी होती है। स्कन्द पुराण के ५५/१४०में लिखा है- ‘कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन’ यानी कुल उसी का पवित्र माना जाता है, उसी की माता कृतार्थ है और पृथ्वी भी उसी के कारण पुण्यवती कहकर पुकारी जाती है, जो अपने परम ध्येय रूपी अमृत तत्व को प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं, शास्त्रकारों ने इस अमृत स्वरूप घट को पाने के कई उपाय भी सुझाये हैं। आयुर्वेद शास्त्र में आर्युवर्धक होने के कारण घृत को आयुरूप (जीवन रूप) ही बताया है और ‘आयुर्वै घृतम्’ कहा गया है। उसी तरह मानवी पुण्य- प्रयोजनों की प्राप्ति हेतु कोई भी किसी तरह का पावन प्रयास अमृतोपम ही कहा जायेगा। कैवल्योपनिषद् क्/फ् में कहा है- ‘न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः’ अर्थात् न सकाम कर्मों से, न संतति से और न सम्पत्ति से अमृत की प्राप्ति होती है। मात्र त्याग ही काम आता है। कहने का तात्पर्य मानवी सद्गुण ही अमृत की श्रेणी में गिने जाते हैं।  
     कठोपनिषद् २/३/१४ में निष्काम भाव से किये गये सभी कार्य अमृत की ही तुलना में आते हैं। परमात्म- विषयक ज्ञान की तुलना भी अमृत से की गयी है, क्योंकि परमात्म तत्व को जान लेने के पश्चात् व्यक्ति अमर हो जाता है। ईश्वर का नाम भी अमृत सदृश है। पद्मपुराण के उत्तराखण्ड में ‘ये वदन्ति नरा नित्यं हरिरित्यक्षरद्वयम्। तस्योच्चारणमात्रेण विमुक्तास्ते न सशंयः’ अर्थात् भगवान् हरि के नाम का निरन्तर उच्चारण करते हुए जीवन्मुक्त हो जाता है। जीभ को भी निरन्तर नारायण के नाम का पयपान करने का भी संकेत शास्त्रों में मिलता है। भगवान् विष्णु को चरणोदक पीने से करोड़ों जन्मों के पापों का क्षय होता है, सो वह भी एक तरह से अमृत ही है। गंगाजल का सेवन भी ऐसा ही है। 
     संस्कृत में प्रसाद शब्द के कई अर्थ निकलते हैं। ईश्वर और महापुरुषों की अनुकम्पा, अनुग्रह और आशीर्वाद भी एक तरह का प्रसाद है। अन्तःकरण की पवित्रता और प्रसन्न्ता को भी प्रसाद के अन्तर्गत गिना जाता है। गीता ख्/म् में कहा भी है- ‘प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते’ अर्थात् परमात्मा का अनुग्रह रूपी प्रसाद पाकर जीवन के सभी दुःख दूर होते हैं। नारद भक्ति सूत्र फ्त्त् में कहा गया है कि भगवान् का अवशिष्ट भाग भी अमृत के समान होता है। 
     मनुष्य का यज्ञीय जीवन भी अमृत तुल्य ही माना जाता है। मानव मात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने तथा उज्ज्वल भविष्य की संरचना हेतु कुंभ पर्वों का आयोजन समय- समय पर होता आया है। पौराणिक आख्याओं में कुंभ पर्व की संख्या बारह बतायी गयी है, जिनमें से चार मृत्युलोक और भारत की पुण्य प्रक्षालित भूमि में ये आयोजन समय- समय पर सम्पन्न होते ही रहते हैं। कालगणना के दृष्टि से ऐसे ग्रहयोग बारह वर्ष बाद ही आते हैं। गंगातट हरिद्वार, त्रिवेणी घाट प्रयाग, शिप्रा किनारे उज्जैन और गोदावरी की पावन गोद में नासिक का यह पावन पर्व बारह वर्ष बाद मनाने का विधि- विधान शास्त्र सम्मत भी है और विज्ञान सम्मत भी। 
     स्मरण रहे कोई भी धर्मानुष्ठान नियत अवधि और स्थान विशेष पर करना ही अधिक पुण्यप्रद भी होता है और फलप्रद भी। कालचक्र में सूर्य, चन्द्र और देवगुरु बृहस्पति की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। तीनों का योग ही कुंभ पर्व का मूल आधार है, क्योंकि इस स्थिति में सभी ग्रह मित्रतापूर्ण और श्रेष्ठ माने जाते हैं। उसी तरह जब मानव जीवन में सज्जनों की संगति का योग बैठता है, तभी सद्चिन्तन का प्राकट्य होने लगता है। अखिल विश्व गायत्री परिवार के जनक, युग निर्माण योजना के सूत्र संचालक संस्थापक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ युगद्रष्टा पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने तो प्रज्ञोपनिषद में संसार की मूलभूत समस्याओं का मुख्य कारण अचिन्त्य- चिन्तन ही बताया है। उनके द्वारा संचालित विचार क्रान्ति अभियान का एक ही एक लक्ष्य है कि जनजीवन में सद्चिन्तन और सत्कर्म का विकास- विस्तार हो। इसी को गायत्री- यज्ञ के स्वरूप में देखा जाता है। देव संस्कृति के यही दो आधार हैं। युग परिवर्तन की इस पावन वेला में जन- जन को इस युग्म का अमृतपान कराना ही महाकाल के अभियान का शुभारंभ होगा, जो भगवान् महाकाल की दिव्य नगरी उज्जयिनी से ही प्रारम्भ होता प्रतीत हो रहा है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार)




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