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गुरुचरणों की भक्ति में तप-साधना की पूर्णता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी काव्य व्यंजना में इसे तात्त्विक अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने रामचरित का गान करने से पहले सद्गुरु चरणों का चरित बखान किया है। इसका गुरुभक्ति में लीन साधकों के लिए विशेष महत्त्व है।
गुरुचरण चरित के मंत्रद्रष्टा महाकवि तुलसी इसका प्रारंभ करते हुए कहते हैं- 
बंदऊ गुरु पद कंज, 
       कृपा सिन्धु नर रूप हरि।
महामोह तम पुंज, 
      जासु वचन रविकर  निकर॥
मैं सद्गुरु के चरण कमल की वन्दना करता हूँ। मेरे गुरुदेव कृपा के सागर और नर रूप में स्वयं नारायण हैं। उनके वचन महामोह के घने अँधेरे का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं।
गोस्वामी जी की इन काव्य पंक्तियों में बड़ी स्पष्टोक्ति है कि सद्गुरु मनुष्य देहधारी होते हुए भी सामान्य मनुष्य नहीं हैं। वह नर रूप में नारायण हैं। जो उनके प्रति इसी गहरी श्रद्धा के साथ स्वयं को अर्पित करता है, उसे ही उनके वचनों से तत्त्वबोध होता है। उसके जीवन में सद्गुरु के वचन सूर्य की किरणों की तरह अवतरित होते हैं और महामोह के घने अँधेरे को पल भर में  नष्ट कर डालते हैं। महाकवि आगे कहते हैं कि गुरुदेव भगवान् के चरण की ही नहीं, उनके चरणों की धूलि की भी भारी महत्ता है। वह उसकी भी वंदना करते हैं-
बंदऊ गुरुपद पदुम परागा,
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिय मूरिमय चूरन चारू।
समन सकल भवरुज परिवारू॥
सद्गुरु के चरण कमलों की धूलि की मैं वंदना करता हूँ। गोस्वामी जी का कहना है कि यह चरणरज साधारण नहीं है। इसको श्रद्धाभाव से धारण किया जाए, तो इससे जीवन में कई तत्त्व प्रकट होते हैं। इनमें से पहला तत्त्व सुरुचि है। वर्तमान में हममें से प्रायः सभी कुरुचि से घिरे हैं। हमारी रुचियाँ मोह और इंद्रिय विषयों की ओर हैं। सुरुचि के जाग्रत् होते ही उच्चस्तरीय जीवन के प्रति जाग्रति होती है। दूसरा तत्त्व है- सुवास। गुरु चरणों की धूलि का महत्त्व समझ में आते ही जीवन सुगंधित हो जाता है। वासनाओं व कामनाओं की मलिन, दूषित दुर्गंध हटने-मिटने लगती है। इसके साथ ही तीसरा तत्त्व प्रकट होता है- सरसता का, संवेदना का। निष्ठुरता विलीन होती है, संवेदना जाग्रत् होती है। इन सारे तत्त्वों के साथ विकसित होता है, अनुराग, अपने गुरुदेव के प्रति। जीवन में गुरुभक्ति तरंगित होती है।
गुरु चरणों की यह धूलि अमरमूल या संजीवनी बूटी का चूर्ण है। इससे समस्त भवरोग अपने पूरे परिवार के साथ नष्ट हो जाते हैं। यह चरणरज महापुण्यरूपी शिव के शरीर पर शोभित होने वाली पवित्र विभूति है। इससे जीवन में सुन्दर कल्याण और आनन्द प्रकट होते हैं। यह गुरुचरणों की रज गुरु भक्तों के मन रूपी दर्पण के मैल को दूर करने वाली है। इसे धारण करने से सभी सद्गुण अपने आप ही वश में हो जाते हैं।  
महाकवि आगे कहते हैं-
श्री गुरु पद नख मनि गन जोति।
सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती॥
दलन मोहतम सो सप्रकासू।
बड़े भाग उर आवइ जासू॥
सद्गुरु के चरण नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान हैं। इनके स्मरण से हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। गुरुदेव चरणों के स्मरण-ध्यान से साधना जगत् के महासत्य का बड़े ही सहज ढंग से साक्षात्कार हो जाता है। इससे हृदय में जो दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है, उससे साधक के जीवन में एक अपूर्व रूपांतरण होता है। जीवन का सारा अंधकार प्रकाश में परिवर्तित-रूपांतरित हो जाता है। बड़े भाग्यशाली होते हैं वे, जो इस रूपान्तरण की अनुभूति प्राप्त करते हैं। सद्गुरु के चरणों का ध्यान जब हृदय में प्रगाढ़ होता है, तो हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं। संसार की महारात्रि- कालरात्रि, विलीन-विसर्जित हो जाती है। उसके दुःख दोष भी मिट जाते हैं। हृदय के निर्मल नेत्रों के खुलने से ईश्वर तत्त्व का, रामचरित या परमात्म तत्त्व का बोध हो जाता है। इसमें  जहाँ-जिस जगह मणि-माणिक के रत्न भंडार गुप्त पड़े हैं, सबके सब नजर आने लगते हैं। सद्गुरु चरणों की कृपा से उलझी जीवन की पहेली सुलझ जाती है। मानव जीवन का रहस्य उद्घाटित-उजागर हो जाता है। गुरुचरणों के ध्यान से उपजी दिव्यदृष्टि का प्रभाव बताते हुए गोस्वामी जी महाराज की काव्य पंक्तियाँ हैं-
जथा सुअंजन अंजि दृग 
साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन,
भूतल भूमि निधान॥
गुरुपद रज मृदु मंजुल अंजन।
नयन अमिय दृग दोष विभंजन॥
गुरुचरणों की रज को यानि कि  गुरुचरणों से निकल रही तप-तेज की किरणों का अपनी आँखों में अंजन लगाने से सारे दृष्टि दोष नष्ट हो जाते हैं। सामान्य क्रम में साधारण आँखों से सभी को सामान्य रूप से दिखता ही है। फिर भी प्रायः सभी की विवेक दृष्टि दूषित होती है। सत् और असत् का भेद समझ में नहीं आता। जीवन की सही राहें समझ नहीं आतीं। यह दृष्टिदोष सद्गुरु के चरणों की धूलि से अर्थात् उनके तप-कणों के प्रसाद से ही ठीक होता है और तब साधक को बड़ी ही अद्भुत दृष्टि का वरदान मिलता है।
गोस्वामी जी कहते हैं कि कुछ ऐसा होता है, जैसे साधक ने अपनी आँखों में सिद्धांजन लगा लिया हो। यह सिद्धांजन नाथ योगियों की तांत्रिक परंपरा में तैयार किया जाता है। यह एक तरह का आँखों में लगाया जाने वाला काजल है। इसे लगाने से पर्वत, वन और पृथ्वी में गड़े  गुप्त खजाने साफ-साफ नजर आते लगते हैंं। गुरु चरणों के तत्त्वद्रष्टा महाकवि तुलसी कहते हैं कि ठीक ऐसा ही होता है, गुरुचरणों के झरने वाले तप-तेज को अपनी आँखों में लगा लेने पर। इससे दिव्य दृष्टि का वरदान मिलता है कि संसार की ओट में छिपा हुआ ईश्वर तत्त्व बड़ा ही साफ नजर आने लगता है। गुरुचरणों की कृपा से तत्त्वज्ञान, ब्रह्मतादात्म्य, ईश्वर कृपा सभी कुछ सुलभ हो जाती है। हममें से हर एक के लिए यह गुरुपूर्णिमा, गुरुचरणों की इसी कृपा की अनुभूति का पर्व है।

लेखक- देवसंस्कृति वि.वि. हरिद्वार के कुलाधिपति हैं। 


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