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‘‘एकोऽहं बहुस्याम्’’ की ब्रह्म-आकांक्षा जिस दिन पूरी हुई, कहते हैं उस दिन श्रावणी थी। एक से बहुत होना, सहयोग, सम्पर्क, स्नेह के आधार पर आत्मा में उल्लास विकसित होता है और एकाकीपन की नीरसता दूर होती है। यही ब्रह्म ने किया।
सृष्टि का सृजन हुआ, उसमें दो तत्त्व प्रयुक्त हुए (१) ज्ञान (२)कर्म। इन दोनों के सम्मिश्रण से सूक्ष्म चेतना-संकल्प शक्ति स्थूल वैभव में परिणत हो गई और संसार का विशाल कलेवर बनकर खड़ा हो गया।
इस तथ्य को स्मरण रखने के लिए भारतीय धर्म के दो प्रतीक हैं-(१) ज्ञान ध्वज शिखा, जो मस्तकरूपी किले के ऊपर फहराई जाती है। (२) यज्ञोपवीत-कर्त्तव्य मर्यादा जिसमें मनुष्य को आगे और पीछे से पूरी तरह कस दिया गया है। शिखा और यज्ञोपवीत उसी ज्ञान और कर्म को परिष्कृत बनाये रखने की चेतावनी है, जो जीवन को उसके उद्गम पर ही दे दी गई थी और जो अद्यावधि अपनी उपयोगिता यथावत् बनाये हुए है।
श्रावणी पर्व पर पुराना यज्ञोपवीत बदला जाता है और नया पहना जाता है। प्रायश्चित्त संकल्प करते हैं और पिछले दिनों की हुई अवांछनीयताओं का प्रायश्चित्त विधान सम्पन्न करते हैं। ऋषि पूजन भी इसी समय किया जाता है और वेद पूजन भी। वेद अर्थात् सद्ज्ञान। ऋषि अर्थात् वे व्यक्ति जो सद्ज्ञान को सत्कर्म में परिणत करने के लिए साहसिक तपश्चर्या करते हैं, कष्टसाध्य रीति-नीति अपनाते हैं। श्रावणी पर्व ब्राह्मण के, ऋषित्व के अभिवर्धन का पर्व है। सद्ज्ञान एवं सत्कर्म की मर्यादाओं का कहीं खण्डन हुआ हो, तो उसके प्रायश्चित्त के लिए तथा उच्च आदर्शवादी जीवन को अधिक तेजस्वी बनाने के लिए इस पर्व पर आत्मसंकल्प एवं परमात्म अनुदानों का योग करने का विधान बनाया गया है।
श्रावणी पर्व पर सामान्य देवपूजन के अतिरक्त विशेष पूजन के लिए ब्रह्मा, वेद एवं ऋषियों का आवाहन किया जाता है। ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैं। ब्राह्मी चेतना का वरण करने व अनुशासन पालन से ही अभीष्ट की प्राप्ति हो सकती है। उस विद्या को जानने-अभ्यास में लाने वालों को ब्रह्मचारी, ब्राह्मण, ब्रह्मज्ञ आदि सम्बोधन दिये जाते रहे हैं। ब्रह्मा का आवाहन-पूजन करके इन्हीं तथ्यों को प्रत्यक्ष करने का प्रयास किया जाता है। वेद, ज्ञान को कहते हैं। ज्ञान से ही विकास होता है। अज्ञान ही अवनति का मूल है। ज्ञान का प्रत्यक्षीकरण करने के लिए वेद का आवाहन-पूजन करते हैं। ऋषि जीवन ने ही उच्चतम जीवनचर्या का विकास और अभ्यास करने  में सफलता पायी थी। उनके अनुभवों-निर्देशों का लाभ उठाने के लिए ऋषि पूजन करते हैं। इस तरह से तीर्थ आवाहन, हेमाद्रि संकल्प, दशस्नान, यज्ञोपवीत नवीनीकरण, तर्पण, अर्घ्यदान, नमस्कार आदि सम्पन्न कराकर परम्परागत श्रावणी उपाकर्म का क्रम पूरा किया जाता है।
श्रावणी पर्व पर ही रक्षा बन्धन का बड़ा हृदयग्राही एवं सर्वप्रिय क्रम सम्पन्न किया जाता है, जिसके अन्तर्गत आचार्य-ब्राह्मण अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बाँधते हैं। उन्हें अनुशासन में बाँधकर कल्याणकारी प्रगति का अधिकारी बनाने के लिए अपने पवित्र कर्त्तव्य पालन का यह यह उपक्रम किया जाता है। यह आश्वासन भी है, जो देव-साक्षी में दिया जाता है। इसके  बिना मार्गदर्शक और अनुयायी एक दूसरे से लाभ नहीं उठा सकते।
इसके अलावा कन्याओं द्वारा रक्षा बन्धन कराने की भी परम्परा है। नारी को बहिन, पुत्री और माता की दृष्टि से देखने का अनुरोध तो प्रत्यक्ष ही रक्षा बन्धन में सन्निहित है। नारी के प्रति पवित्र भावना की शक्ति का प्रमाण पौराणिक एवं ऐतिहासिक कथानकों में मिलता है। इन्द्र को विजय तभी मिली, जब देवी शची ने पवित्र भाव से रक्षा सूत्र बाँधा। अर्जुन, शिवाजी, छत्रसाल आदि महापुरुषों की सफलता के पीछे उनका नारी के प्रति पवित्र दृष्टिकोण भी असाधारण महत्त्व रखता है।

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार)


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