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यजुर्वेद (१९.३०) में कहा गया है- 
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्। 
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ 
अर्थात् व्रत से दीक्षा मिलती है, दीक्षा के समय दक्षिणा दी जाती है। दक्षिणा से श्रद्धा बढ़ती है, श्रद्धा से सत्य रूप परमेश्वर की प्राप्ति होती है। 
व्रत वह शक्ति है, जिसके द्वारा मनुष्य की सोई हुई शक्तियाँ जाग्रत् होती हैं। असम्भव कार्यों को सम्भव होते देखकर उसकी निष्ठा बढ़ती है। ज्यों- ज्यों उसकी निष्ठा की वृद्धि होती जाती है, त्यों- त्यों वह त्याग की भूमिका में पदार्पण करता है। त्याग द्वारा शक्तियों का विकास होकर उसकी श्रद्धा में वृद्धि होती है। श्रद्धा की दृढ़ता से सत्य का मार्ग खुल जाता है। इसलिये हमारे धर्म में व्रतों, त्यौहारों और पर्वों को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। 
श्रावणी वेद का त्यौहार है। प्राचीन काल में ऋषि- मुनि इस दिन से वेद पारायण आरम्भ करते थे, जिसको ‘उपाकर्म’ कहा जाता था। वैसे तो वेद का पाठ करना द्विज मात्र का नित्य का कर्तव्य है, परन्तु वर्षा ऋतु में उसके लिये विशेष रूप से प्रबन्ध किया जाता था। इन धार्मिक आयोजनों को आरम्भ करने का समय श्रावण मास की पूर्णिमा था, जो अभी तक चला आ रहा है। उस समय लोग वेद पाठ के संकल्प किया करते थे, वेद मन्त्रों को कंठाग्र करने की प्रतिज्ञा लेते थे। इन प्रतिज्ञाओं, संकल्पों और पारायण  करने के आधार पर ही द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी नाम पड़ा है। आज दुर्भाग्यवश हम इस परम्परा को भूल से गये हैं, इसलिये वेद जैसे बृहद ज्ञान के भण्डार से हम वंचित हो  रहे हैं। वेद प्रचार का संकल्प इसी अवसर पर लिया जाता है। 
रक्षा बन्धन का त्यौहार भी इसी दिन मनाया जाता है। यह रक्षा सूत्र है। इनको ब्राह्मण वेद मन्त्रों से अभिमन्त्रित करते थे। तप और त्याग की शक्ति का मिलन वेद मन्त्रों  की शक्ति के साथ होने से सोने पर सुहागे का काम करता है। उस समय ब्राह्मण राष्ट्र के नेता होते थे, जनता को सन्मार्ग पर लगाना उनका कर्तव्य था। आसुरी विचारों से रक्षा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी। इस दिन वह भी अपने पुराने संकल्प को स्मरण करते हैं कि द्विजातियों को ऊँचा उठाने के लिये उन्हें क्या करना है? यदि एक वर्ष में उनके कार्य में कोई शिथिलता आ गई हो तो पुनः जागरूकता आ जाती थी; परन्तु खेद का विषय है कि आज कल हमने इस पवित्र त्यौहार को केवल अपने धनोपार्जन का साधन बना रखा है और अपने यजमान को सूत्र बाँधकर एक- दो उल्टे- सीधे मन्त्र पढ़कर पैसा ऐंठने का प्रयत्न करते हैं। जिस देश के पथ- प्रदर्शक अपने कर्तव्य को भूल जाते हैं, उनका पतन की ओर जाना अवश्यम्भावी है। 
चूँकि ब्राह्मणों का काम धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन और उनका उपदेश करना होता था और वह स्वतन्त्र रूप से जीवन निर्वाह के लिये कोई कारोबार नहीं करते थे, इसलिये शिष्यगण उनकी आवश्यकता की पूर्ति के लिये धन, वस्त्र आदि के रूप में दक्षिणा दिया करते थे, जो आज तक प्रचलित है। व्रत धारण करते समय शिष्य गुरु को  अपनी श्रद्धा के अनुसार भेंट करते थे। आज दोनों ओर से शिथिलता आ गई है। इस शिथिलता का दृढ़ता में परिवर्तन करने के लिये ही यह त्यौहार मनाया जाता है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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