img

श्रावणी पर्व की अतीत कथाएँ जो भाव दरसाती हैं, उनसे यही स्पष्ट होता है कि पुरातनकाल में ब्रह्मबल संपन्न ब्राह्मण राष्ट्र के नेता होते थे। जन- जीवन को सन्मार्ग पर चलाना उनका कर्त्तव्य था। आसुरी विचारों एवं प्रवृत्तियों से रक्षा करने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी। ‘वयम् राष्ट्रे जागृयाम् पुराहिताः’ का व्रत धारण किए हुए ये पुरोहित- आचार्यगण अपने यजमानों को श्रावणी पर्व के पावन अवसर पर रक्षासूत्र बाँधते हुए अपने संकल्प को स्मरण करते थे कि मनुष्यता को उँचा उठाने के लिए उन्हें क्या करना है, यदि एक वर्ष में उनके कार्यों में कोई शिथिलता आ गई हो, तो उसे दूर करके पुनः जाग्रत् होना है। इन ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणों का कार्य तप के उच्चतम मानदंडों को अपने जीवन में धारण करते हुए सदा- सर्वदा जनकल्याण में निरत रहना था। 
यज्ञोपवीत परिवर्तन एवं प्रायश्चित्त के रूप में हेमाद्रि संकल्प आदि कृत्य इस पर्व से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। इस रूप में यह आत्मशोधन या ऋषित्व- ब्राह्मणत्व के निखार का पुण्य पर्व है। श्रावणी पर्व के दिन पुराना यज्ञोपवीत बदला जाता है। शिखा- सिंचन एवं यज्ञोपवीत- नवीनीकरण को एक तरह से इनका वार्षिक संस्कार भी कहा जा सकता है। जिस प्रकार जन्मदिन एवं विवाह दिन मनाए जाते हैं, उसी प्रकार श्रावणी पर्व को आत्मिक कायाकल्प का संकल्प दिन भी कहा जा सकता है। 
शिखा- सिंचन और उपवीत- नवीनीकरण के बाद जो कृत्य किए जाते हैं, उनमें आचार्य हेमाद्रि प्रायश्चित्त संकल्प प्रमुख है। सावधानी के साथ रहने वाले व्यक्तियों में भी  प्रमादवश या अज्ञानतावश कुछ- न भूलें हो जाती हैं। यदि इनकी नियमित शुद्धि एवं सुधार न किया जाए, तो इनका बोझ बढ़ता जाता है और जीवन अँधेरे से घिरता चला जाता है। बढ़ी- चढ़ी यह पापराशि ही नानाप्रकार की आधि- व्याधियों, संकट एवं शोक- संताप के रूप में जीवन को नरक स्वरूप बना देती है। इस विकार- राशि के शोधन- परिमार्जन के निमित्त श्रावणी पर्व का प्रायश्चित्त विधान एक अचूक उपचार के रूप में आता है। इस प्रायश्चित्त का सार, प्रमाद एवं अज्ञानवश हुई भूलों का सच्चे हृदय से पश्चात्ताप और उन्हें दुबारा न दुहराने का दृढ़ संकल्प है। इसी के साथ वर्षभर में हुई क्षतिपूर्ति के निमित्त अभीष्ट सत्यवृत्ति को धारण करने का व्रत लेना है। 
वस्तुतः यह व्रतनिष्ठा ही हम सबको जीवन- लक्ष्य की ओर आगे बढ़ाती है। शास्त्रवचन है- 

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्। 
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ 
अर्थात् व्रत से दीक्षा मिलती है, दीक्षा के समय दक्षिणा दी जाती है, दक्षिणा से श्रद्धा बढ़ती है और श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है। इस वक्तव्य से यह सत्य सुनिश्चित हो जाता है कि व्रत ही वह शक्ति है, जो व्यक्ति की सोई हुई शक्ति को जाग्रत् करती है। असंभव कार्यों को संभव बनाने की निष्ठा बढ़ाती है। निष्ठा में वृद्धि के साथ वह त्याग की भूमिका में पदार्पण करता है। त्याग द्वारा शक्तियों का विकास होने से श्रद्धा बढ़ने लगती है और श्रद्धा की दृढ़ता के साथ सत्य का मार्ग खुल जाता है। इस तरह श्रावणी पर्व में जीवन को लक्ष्य की ओर ले जाने वाली व्रतनिष्ठा से जोड़ा जाता है, जो व्यक्ति के आत्मिक कायाकल्प के रूप में पर्व का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है। 
श्रावणी पर्व का दिन भाई- बहिनों के पवित्र स्नेह- सूत्र के प्रतीक रक्षाबंधन से भी जुड़ा हुआ है। इसके प्रचलन में आने के विषय में एक किंवदंती बहुश्रुत है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लगी थी तब द्रोपदी ने अपने वस्त्र को फाड़कर उनके हाथ में बाँधा था और ऐसे समय में श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को विपत्ति के समय रक्षा का वचन दिया था। कौरव -सभा में चीरहरण के समय द्रोपदी की लाज बचाकर श्रीकृष्ण ने अपना यही वचन निभाया था। 
मनुष्य जीवन की खुशहाली एवं स्थायी प्रगति के लिए प्रकृति- संतुलन एवं इसके लिए हरीतिमा- संवर्द्धन के विषय में हमारे ऋषि, पूर्वज भलीभाँति परिचित थे। अतः वृक्षारोपण पर वे बहुत जोर देते थे। वृक्षों की महत्ता का उल्लेख करते हुए अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है, वृक्ष- वनस्पतियाँ भी मनुष्य की ही तरह पृथ्वी के पुत्र हैं। वस्तुतः स्वास्थवर्द्धक एवं वायुमंडलशोधक गुणों के कारण हरीतिमा की भूमिका अद्वितीय है। मनुष्य के मानसिक विकास एवं शांति के साथ भी इसका घनिष्ठ संबंध है। शायद यही कारण है कि वैदिक संस्कृति अरण्यों में विकसित हुई थी और इसका नाम आरण्यक संस्कृति पड़ा था। श्रावणी पर्व वृक्षारोपण के इसी शुभ प्रयोजन की याद दिलाकर इसको क्रियान्वित करने की प्रेरणा देता है। 
इस तरह श्रावणी के पुण्य पर्व का पावन दिवस प्रायश्चित्त पर्व के रूप में आत्मिक विकास- ऋषित्व के अभिवर्द्धन, रक्षाबंधन के रूप में नारी- अस्मिता एवं संस्कृति- पूजा और हरितिमा- संवर्द्धन के रूप में पर्यावरण- रक्षा का संदेश देते हुए जीवन के आंतरिक एवं बाह्य दोनों मोरचों पर सक्रिय होने का संदेश देता है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार)


Write Your Comments Here:


img

मधुरता का प्रतीक रक्षाबंधन (पं० श्रीराम शर्मा आचार्य)

भारतीय देवसंस्कृति की परंपरा में धार्मिक त्यौहारों की भी एक समृद्ध शृंखला है, जिसमें रक्षाबंधन पर्व भी अनादि काल से वसुधैव कुटुम्बकम् की स्नेहमयी भावना का मंत्र फूँक रहा है। भाई- बहिन के पवित्र प्रेम का यह भावना प्रधान पर्व.....

img

एकता, समता, शुचिता का प्रतीक : गणेश उत्सव - डॉ. प्रणव पण्ड्याजी

२९ अगस्त २०१४ गणेश चतुर्थी विशेष बडे- बड़े मण्डपों और आकर्षक सजावट के बीच पूरे वर्ष इन्तजार के बाद आता है गणेश उत्सव। पौराणिक मान्यता है कि भाद्रपक्ष मास की शुक्ल चतुर्थी से दस दिन तक भगवान शिव और पार्वती के.....

img

इस गणेश उत्सव को पर्यावरण पर्व बनाएँ - डॉ. प्रणव पण्ड्याजी

२९ अगस्त २०१४ गणेश चतुर्थी विशेषसन् १८९३, महाराष्ट्र में ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच तनाव अपने चरम पर था। तभी समाज सुधारक लोकमान्य तिलक ने दोनों के बीच विग्रहों को समाप्त करने के उद्देश्य से गणेश उत्सव को सार्वजनिक आयोजन का स्वरूप दिया।.....