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महाशिवरात्रि का महापर्व महाकाल से उनके महारुद्र का शमन करने एवं सदाशिव के स्वरूप को प्रकट करने की भाव भरी आराधना का पर्व है। महाशिवरात्रि का यह पर्व प्रतिवर्ष फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है। भारतीय शास्त्रों में इस तिथि का विशेष महत्त्व है। फाल्गुनी हवा के झोंके इन दिनों रुद्र की विनाशलीला एवं शिव के सृजन कौशल का राग सुनाकर हर प्राण को स्पन्दित करते हैं। पतझड़ और नयी कोपलों का आगमन इसी समय होता है। इस दिन शिव मंदिरों में लाखों करोड़ों की ॐ नम: शिवाय च शिवतराय च युक्त भावपूर्ण प्रार्थनाएँ उन महेश्वर को अर्पित होती हैं, जो प्रकृति एवं उसकी शक्ति के नियंता हैं। काल के गतिमान चक्र के अधीश्वर महाकाल हैं। सर्वत्र व्यापक परिवर्तन के सूत्र संचालक वही हैं। 
      यह सर्वविदित मान्यता है कि इस शुभ पर्व पर उत्तम कार्य करने से उस पर शिवजी की कल्याणकारी दृष्टि पड़ती है। जो लोग शिवजी के कल्याणकारी प्रयोजन को लेकर आगे कदम बढ़ाते हैं और जन- जीवन को ऊँचा उठाने में निरत रहते हैं, उन पर उनकी कृपा- दृष्टि सदैव बनी रहती है। भगवान् महाकाल अपने भावुक भक्तों की पुकार अनसुनी नहीं करते। उनसे की जाने वाली प्रार्थना की सार्थकता नवनिर्माण के लिए साहस भरा कदम उठाने में है। मानव समुदाय के उज्ज्वल भविष्य के लिए आज के दिन हमारे स्वरों में भाव भरी गूँज उठे ॐ नमो: शम्भवाय च मयोभवाय च। 
      महाशिवरात्रि का व्रत मानव को शिव बनने की प्रेरणा देता है। सम्पूर्ण विश्व को शिवत्व का संदेश सुनाता है। शिव का अर्थ है, शुभ, मंगल। शंकर अर्थात् कल्याण करने वाला, आदर्शों के अनुरूप आचरण करने वाला शिवत्व को प्राप्त कर सकता है, इसमें संदेह नहीं। शास्त्रों में कहा गया है- शिवो भूत्वा शिवं यजेत्ज् अर्थात् शिव बनकर ही शिव की उपासना की जाती है। जिसमें कल्याणकारी भावना हो और दूसरों का कल्याण करने के लिए मन में ललक जगे, उसी का शिवरात्रि व्रत सार्थक है। जो भगवान् शिव के तत्त्वदर्शन को समझकर उसके आदर्शों को अपने जीवन में उतार लेता है, उसका जीवन मंगलमय कल्याणकारी हो जाता है। वह क्रमश: उत्तरोत्तर अपने जीवन में आत्मोन्नति करता हुआ चरम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। महाशिवरात्रि पावन पर्व की सार्थकता उपर्युक्त तथ्य पर निहित है। इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य भी यही है। 
भगवान् शंकर का दूसरा नाम देवाधिदेव महादेव है। समुद्र मंथन में प्राप्त अमृत जिनने पिया, वे देव; परन्तु लोक कल्याण के लिए विष पान करने वाले महादेव। यही महादेव ही विश्व के संरक्षक जगत् पिता हो सकते हैं। शिवजी के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू है। त्रिशूल संहार का प्रतीक है- सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का नाश करना इसका काम है। डमरू ज्ञान का उद्गाता है। भगवान् शिव ने दूज के चन्द्रमा को मस्तिष्क पर धारण किया है। दूज का चन्द्रमा कर्मयोग का प्रतीक है। भगवान् शिव त्रिलोचन है। तीसरी आँख से उन्होंने काम को जला दिया था। शिव के समान जो व्यक्ति अपने शरीर पर भस्म लगाकर यह याद कर सकता है कि यह पार्थिव शरीर आज नहीं तो कल भस्म की ढेरी में परिणत होना है, तो फिर किस बात का अहंकार करे, वही महापुरुष बनने का साहस कर सकता है। 
      गायत्री मंजरी में शिव- पार्वती संवाद में भगवती पूछती हैं कि हे देव! आप किस योग की उपासना करते हैं, जिससे आपको परम सिद्धि प्राप्त हुई है। उन्होंने उत्तर दिया- गायत्री ही वेदमाता है और पृथ्वी की सबसे पहली और सबसे बड़ी शक्ति है। वह संसार की माता है, भूलोक की कामधेनु है। इससे सब कुछ प्राप्त होता है। ज्ञानियों ने योग की सभी क्रियाओं के लिए गायत्री को ही आधार माना है।ज् 
      भगवान् शिव इस संसार में आदि योगी थे, योग के सभी भेदों के ज्ञाता थे। इस प्रकार भगवान् शंकर हमें गायत्री योग द्वारा आत्मोत्थान की ओर अग्रसर होने का निर्देश करते हैं। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर इस पर विचार मंथन करना चाहिए। यह क्षुद्रता से महानता की ओर ले जाने वाला एक ऐसा तत्त्वज्ञान है, जिसे अपनाकर हर कोई धन्य अनुभव करता है। वास्तविक शिवभक्त होने का यही लक्षण और पहचान है। शिवरात्रि का व्रत करते हुए जीवन में शिवत्व को धारण करने की प्रेरणा जगानी पड़ेगी। जीवन को सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् के रूप में ढालना होगा। जो सत्य नहीं, वह शिव कैसे हो सकता है और जो शिव नहीं, वह सुन्दर तो हो ही नहीं सकता। 
      शिवरात्रि बोधोत्सव है। आत्मचिंतन एवं आत्म- निरीक्षण का सुअवसर है। जीवन में श्रेष्ठ व मंगलकारी व्रतों, संकल्पों तथा विचारों को अपनाने की प्रेरणा देती है शिवरात्रि। आज की भौतिक एवं भोगवादी प्रतिस्पर्धा की दुनिया में हमारी आत्मचेतना मुरझाती जा रही है। उसमें चैतन्यता का संचार करने, उसमें निहित सत्य का बोध कराने ही हर वर्ष आती है शिवरात्रि। भारतीय जीवनधारा में आत्मबोध का स्वर सदा मुखर रहा है। उपनिषदों का उद्घोष है- आत्मानं विद्धि: अर्थात् संसार के साथ ही आत्मा को भी जानो, पहचानो, समझो। बिना आत्मज्ञान के मानव जीवन की सच्ची सार्थकता सिद्ध नहीं हो सकती। शिवरात्रि का उद्देश्य भी हमारी चेतना जाग्रत् करना है। देवाधिदेव महादेव की उपासना, व्रत एवं संकल्प के द्वारा आत्मबोध को पाना है। वस्तुतः: जीवन- बोध बोध के बिना जीवन का अँधेरा नहीं मिटता। 


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