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भगवान् भास्कर के उत्तरायण होते ही सृष्टि का गतिचक्र बदल जाता है। मकर संक्रान्ति की शीतपरक अनुभूतियाँ माघ पंचमी के निकट पहुँचकर वासंती उल्लास में परिवर्तित हो जाती हैं। समूची धरती अपने आनन्द एवं उल्लास को प्रकट कर अपने आँचल में फूलों को समेटी नजर आती है। फूली सरसों की बिखरी फैली पीली चादर, गुलाब, कचनार, पलाश और अनार के लाल केसरी फूलों की छटा, मानव हृदयों को आलोकित करती नजर आती है।
      वसंती शब्द में एक उल्लास है, एक उमंग है, एक उत्साह है, जो जीवन की दिशाधारा को बदलती नजर आती है। इसीलिए तो वासंती- बयार हर वर्ष उमगती हुई आती है तथा जीवन में एक नूतन उल्लास की चहक और ज्ञान की महक बिखरेती चली जाती है। यह एक ऐसा अपूर्व एहसास होता है, जो उसे महसूस करने वालों को ही होता है। वस्तुतः: प्रकृति जब इठलाती, बलखाती हुई धरा में पग- पग पर कण- कण के सम्पूर्ण यौवन के साथ मधुरता, सरसता का संचार करती आती है, तो वसंत के आने का एहसास स्वयमेव हो जाता है। सर्वत्र प्राकृतिक सुन्दरता नूतन परिवेश में नजर आती है। इसी उल्लासमय, उत्साहवर्धक पृष्ठभूमि में यह प्रेरणादायक वसंत पर्व पावनमय वातावरण में सर्वत्र मनाया जाता है। यह पर्व कला के विविध आयामों, शिक्षा, विद्या, साधना का भी पर्व है। यह अपने अपूर्ण जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने का प्रेरणादायक पर्व है। यह नूतन संकल्प ग्रहण करने का उत्साहवर्धक पर्व है। यह मानव जीवन के रूप में उपलब्ध स्वर्णिम अवसर को सार्थक बनाने के लिए विद्या सम्पन्न, कला- सम्पन्न बनाने के लिए प्रेरित करता है तथा जीवन में एक नूतन उत्साह एवं उल्लास का संचार करता है।
      वसंत पंचमी का पावन पर्व भगवती सरस्वती की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर जब स्वयं प्रकृति वसंत अवतरण के रूप में भगवती सरस्वती का अभिनन्दन करती है, तब नवीन पल्लव प्रत्येक वृक्ष पर परिलक्षित होते हैं, प्रकृति के कण- कण में हँसी मुस्कान के पुष्प खिल पड़ते हैं। इसी प्रकार जीवन में देवी सरस्वती का अनुग्रह अवतरित होने पर मनुष्य के स्वभाव, दृष्टिकोण, क्रियाकलापों में वसंत ही वसंत बिखरा हुआ दिखाई देता है। बड़े से बड़ा दुष्कर कार्य भी हँसते- हँसाते मन पर बिना बोझ डाले सफलतापूर्वक पूर्ण हो जाता है। पेड़- पौधों पर नवीन पल्लवित पुष्प, अपने व्यक्तित्व को निर्मल, निर्दोष, आकर्षक और सुगंधित बनाने की प्रेरणा देते हैं। कोयल की मस्ती भरी कूक, भौरों के गुंजन जीवन जीने की कला सिखाते हैं। हर जड़- चेतन में वसंत ऋतु में सृजनात्मक उमंग परिलक्षित होने लगती है, जो उसे ऋतु राज का गौरव प्रदान करते हैं। वसंत जैसा उल्लास, कलात्मक प्रवृत्तियों का विकास और ज्ञान संवर्धन का प्रयास ही सच्चे अर्थों में वसंत पर्व को सार्थकता प्रदान कर सकता है। अतएव इस पावन अवसर पर भगवती सरस्वती की अनुग्रह प्राप्ति के लिए उनकी पूजा- अर्चना, आराधना उचित ही है। कला, ज्ञान, संवेदना हमारे जीवन में आये, हमारे विचारों में आदर्शवादिता की उच्चस्तरीय सद्भावनाओं का समावेश हो। ज्ञान की सम्पदा से बढ़कर और कोई सम्पदा नही। ज्ञान बढ़ाने संग्रह सम्पादन करने की रीति- नीति अपना लें, तो हम हर क्षेत्र में निःसंदेह उत्कृष्ट बनते चले जाएँगे। हमारे जीवन का सर्वांगपूर्ण विकास होता चला जाएगा, इस महान् प्रेरक पर्व पर विद्या के वास्तविक स्वरूप को भी समझना अनिवार्य है। आज शिक्षा का उद्देश्य मात्र नौकरी प्राप्त करना हो गया है। इस सोच विचार में परिवर्तन आज अनिवार्य हो गया है। विद्या मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास एवं परिष्कार के लिए है। हम ज्ञान की गरिमा, महिमा को समझने लग जाएँ और हमारे अन्तःकरण में उसके लिए तीव्र उत्कंठा जाग पड़े, तभी समझना चाहिए कि पूजन अर्चना की प्रक्रिया से विद्या के प्रकाश से हमारा कण- कण प्रकाशित हो गया। हम अपने दैनिक जीवन में स्वाध्याय को समुचित स्थान दे तथा जो शिक्षित हैं, उन्हें विद्या- ऋण चुकाने के लिए अपने समीप के अशिक्षितों को शिक्षित करने हेतु संकल्पित होना चाहिए।
      भगवती सरस्वती का वाहन मयूर है। प्रकृति ने मयूर को कलात्मक सुसज्जित बनाया है। हमारी अभिरुचि भी प्रेम, सौन्दर्य, स्वच्छता सुसज्जनता के प्रति जागे। हमारा व्यवहार विनीत, शिष्टता आत्मीयता युक्त हो। वाद्य यंत्र वीणा मात्र एक स्थूल वस्तु नहीं, अपितु मनुष्य की उदात्त भावनाओं और हृदय तरंगों को व्यक्त करने का सहयोगी साधन है। हम भी अपनी हृदय तरंगों को उदात्त भावनाओं में नियोजित करें। कला प्रेमी बनें, कला के पुजारी बनें। कला को कुत्सित एवं अपवित्र होने से बचायें।
वसंत, प्रकृति एवं ऋतुओं में ही नहीं, मानव- जीवन में भी आता है। अंत: की स्फुरणा, जो जीवन को सृजनात्मक दिशा दे, वह वसंत ही तो है। ऐसे सुअवसरों को जीवन्त, जागरूक, मूर्धन्य ही समझ सकते हैं तथा उसका पूरा- पूरा सार्थक उपयोग कर सकते हैं।
     

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