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श्रावणी पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबन्धन का पावन पर्व पारिवारिक मंगल कामना का प्रतीक है, तो राष्ट्रीयता का प्रतीक भी। विजयी भव के शुभ आशीर्वचन के साथ हजारों देवियाँ अपने वीर भाइयों को विदाई देती हैं, तभी तो हर संकट की घड़ी में विजयी होते हम आगे बढ़ पाये हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हर देशवासी राखी के वास्तविक स्वरूप को समझकर समय रहते असहाय अबलाओं की रक्षा का व्रत ले। 
रक्षाबंधन का यह पर्व हमारी विजय कामना का पर्व है। रण में जाते हुए रणबाँकुरों की कलाई में क्षत्राणियों द्वारा राखियाँ बाँधी जाती रही हैं। युद्ध का मैदान हमारे लिए हमेशा से सत्यमेव जयते का घोष करता आया है। कारगिल युद्ध के दौरान पूरे राष्ट्र से अपने सैनिकों के प्रति लाखों लोगों ने पत्र भेजे, सद्भावनाएँ व्यक्त कीं, सहयोग दिया, अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी, किन्तु सबसे अधिक मार्मिक क्षण वह होता है, जब किसी रेलवे स्टेशन पर अपने सैनिक भाइयों का मनोबल बढ़ाने के लिए बहिनें राखी बाँध कर विदाई देती रहती हैं। 
ग्रंथों में यह आशीर्वचन दिया जाता है कि जिस रक्षा सूत्र से दानवों का महाशक्तिशाली राजा बलि बाँधा गया, उसी से तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षे! विचलित मत होना, बस यही भावना भारत की करोड़ों बहिनों के द्वारा व्यक्त होती रही है। आज रक्षा का सूत्र बाँधते हुए वे सैनिक भाइयों में यह शौर्य भरती है कि चाहे कितना भी क्रूर आघात क्यों न हो- 
तुम मत विचलित होना, 
विजयी पथ के राही। 
तुम आगे ही बढ़ते रहना, 
ओ विजयी पथ के राही॥ 
करगिल का युद्ध हो या नारी सम्मान का सुअवसर,यह हर भारतीय की जिम्मेदारी है कि वह अपना फर्ज अदा करे, इसे संकल्प पर्व के रूप में मनाये। 
हृदय को छूने वाली अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ हैं, जो रक्षाबंधन और भारतीय संस्कृति की महानता का परिचय कराती हैं। वर्तमान समय की विषम परिस्थितियों में जब नारी की अस्मिता पर क्रूर आघात हो रहे हैं, तो इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है। आज हमें इस पर्व पर यह भी सोचना है कि क्या हम सचमुच बलि राजा को बाँधे गये रक्षा सूत्र की तरह अपने बटोरे हुए वैभव की बलि राष्ट्रहित में दे सकते हैं? हम राखी बँधवाते हैं और हमारी बहिनें हमसे अपनी राखी की कीमत सँजोये बैठी रहती हैं। उनकी अपनी भाइयों से अपने दु:ख दर्द में सहयोग की अपेक्षा भी रहती है और एक हम हैं, जो राखी बँधवाने की औपचारिकता पूरी करते हुए उन्हें कोई भेंट देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। क्या कभी हम अपनी बहिन की राखी की कीमत उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप समय पर चुका पाते हैं? यह प्रश्र बहुत ही मार्मिक है और अनिवार्य भी। 
इसी दिन श्रावणी पर्व भी मनाया जाता है। प्राचीन काल के समाज सेवी जो ब्राह्मण कहे जाते थे, इसी दिन पुराने यज्ञोपवीत को बदलकर नवीन यज्ञोपवीत धारण करते थे। वे दस स्नान के माध्यम से अपने भीतर के अहं, लोभ और वासनाओं को मिटाने का हर संभव प्रयास करते थे। श्रावणी के दिन नये यज्ञोपवीत बदलने का भाव यही है कि पिछले वर्ष जिन आदर्शों के पालन में कमी रही, उन्हें पुन: याद किया जा सके। आज मानवता की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक समाजसेवी या ब्राह्मण अपने व्रत द्वारा ली गयी शिक्षा पर दृढ़ होकर धर्म के प्रति वफादार हो सके, राष्ट्र को जाग्रत् और समर्थ बना सके, इसी उद्देश्य से यह पर्व मनाया जाता है। 
श्रावणी पूर्णिमा को श्रावणी का त्यौहार ज्ञान- पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। राष्ट्र को जीवन्त जाग्रत् बनाये रखने का संकल्प प्रत्येक को लेना चाहिए। साथ ही बहिनों की राखियाँ सार्थक हों, इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक नारी के सम्मान की रक्षा हम उसे अपनी सगी बहिन की तरह मान कर करें। 


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