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जीविकोपार्जन जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है, पर सब कुछ नहीं। आज सामान्य से लेकर उद्योग-व्यापार में उच्चतम दायित्वों को सँभालने वाले अधिकांश लोगों से यही भूल हो रही है कि वे धन-संपदा के उपार्जन और उपभोग को अपने जीवन का लक्ष्य बना चुके हैं। वे अपनी अनंत महत्वाकांक्षाओं के बीच तरह-तरह के रोग, शोक, तनाव झेल रहे हैं। उनके जीवन में सम्पदा तो बहुत है, पर सुख नहीं।सुश्री रीका भट्टाचार्य, मुंबई से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब मान्यताएँ बदल रही हैं। व्यापार क्षेत्र की अनबूझ चुनौतियों का सामना करने और जीवन का आनंद पाने के लिए व्यापार जगत अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रहा है। अनेक उच्च कोटि के प्रबंधन प्रशिक्षण संस्थानों ने अध्यात्म विज्ञान को अपने पाठ्यक्रमों में शामिल कर लिया है। आईआईएम कोझीकोड ने पोस्ट ग्रेजुएट, कालीकट, केरल ने पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन मैनेजमेण्ट के प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए तैयार किये गये कोर्स में गीता के अंश को शामिल कर इसे मैनेजमेण्ट के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। एस.पी. जैन इं. ऑफ मैनेजमेण्ट एण्ड रिसर्च ने एक्ज़ीक्यूटिव के एमबीए पाठ्यक्रम के लिए ‘अध्यात्म का विज्ञान’ नाम से अनिवार्य क्रेडिट कोर्स आरंभ किया है। इसके स्नातकोत्तर डिप्लोमा के लिए भी अध्यात्म पर आधारित पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है। इस पाठ्यक्रम के निर्माता इंस्टीट्यूट के डीन डॉ. मनीष श्रीकांत के अनुसार अध्यात्म के सूत्रों से मैनेजरों को लक्ष्य के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनाने में मदद मिलती है।आईआईएम बैंगलोर और आईआईएम कोलकाता को छोड़कर ज्यादातर प्रीमियम बिजनेस स्कूलों में अध्यात्म पाठ़येतर शिक्षा का हिस्सा था, अब वह नियमित पाठ्यक्रम में शामिल हो गया है। आदित्य बिड़ला रीटेल के चीफ पीपल ऑफिसर श्री रमेश मित्रगोत्री का कहना है-बिजनेस में अक्सर हम सख्त हो जाते हैं और शॉर्ट टर्म नजरिया अपनाते हैं। अध्यात्म हमें दूरदर्शिता और सिद्धांतों के आधार पर कदम उठाने की प्रेरणा देता है। सुश्री रीका भट्टाचार्य बताती हैं कि अध्यात्म की बेहतर समझ से लोगों में रचनात्मकता, अन्वेषी दृष्टिकोण, नेतृत्व कला का विकास होता है। आज व्यावसायिक प्रबंधन संस्थानों का झुकाव अध्यात्म की ओर भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन दृष्टिकोण व्यावसायिक ही बना हुआ है। आशा है अध्यात्म के प्रखर सूत्र बुद्धि से होकर जीवन में प्रवेश करने लगेंगे तो उनकी उपयोगिता के नये आयाम विकसित होंगे। तब अध्यात्म व्यापार नहीं, प्रेभभाव, पारिवारिकता, परदुःखकातरता जैसे भावों को विकसित करते हुए मानवता का गौरव बढ़ाता हुआ दिखाई देगा।


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