सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय- एक योग साधना

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जीवन को सफल, उच्च एवं पवित्र बनाने के लिए स्वाध्याय की बड़ी  आवश्यकता है। किसी भी ऐसे व्यक्ति का जीवन क्यों न देख लिया जाये, जिसने उच्चता के सोपानों पर चरण रखा है। उसके जीवन में स्वाध्याय को विशेष स्थान मिला होगा। स्वाध्याय के अभाव में कोई भी व्यक्ति महान अथवा ज्ञानवान नहीं बन सकता। प्रतिदिन नियमपूर्वक सद्ïग्रन्थों का अध्ययन करते रहने से बुद्धि तीव्र होती है, विवेक बढ़ता है और अन्त:करण की शुद्धि होती है। इसका स्वस्थ एवं व्यावहारिक कारण है- वह यह है कि सद्ïग्रन्थों के अध्ययन करते समय मन उसमें रमा रहता है और ग्रन्थ के सद्ïवाक्य उस पर संस्कार डालते रहते हैं।
    स्वाध्याय द्वारा अन्त:करण के निर्मल हो जाने पर मनुष्य के बाह्यï अन्तर पट खुल जाते हैं, जिससे वह आत्मा द्वारा परमात्मा को पहचानने के लिए जिज्ञासु हो उठता है। मनुष्य की यह जिज्ञासा भी स्वाध्याय के निरन्तर बढ़ती एवं बलवती होती रहती है और कर भी लेता है। परमात्मा के इस पावनर साक्षात्कार का उपाय तथा मार्ग का भी स्वाध्याय से ही पता चल सकता है। इस प्रकार नित्य प्रति का स्वाध्याय मनुष्य को उसके चरम लक्ष्य तक पहुँचा देने में बड़ी सहायता करता है।
    स्वाध्यायशील व्यकित का जीवन अपेक्षाकृत अधिक पवित्र हो जाता है। ग्रन्थों में सन्निहित  सद्ïवाणी तो अपना प्रभाव एवं संस्कार डालती ही है, साथ ही अध्ययन में रुचीमान्ï होने से व्यक्ति अपना शेष समय पढऩे में ही लगाता है। वह या तो अपने कमरे में बैठा हुआ एकांत अध्ययन किया करता है अथवा किसी पुस्तकालय अथवा वाचनालय सक पुस्तकों के साथ संलग्न रहता है। उसके पास ऐसा कोई भी फालतू समय नहीं रहता जिसमें जाकर इधर-उधर बैठे अथवा घूमें और फिर वायु मण्डल अथवा संगति से अवांछित संस्कार ग्रहण करें। जब मनुष्य निरर्थकों की संगति में न जाकर जीवनोपयोगी सद्ïसाहित्य के अध्ययन में ही संलग्न रहेगा तो उसका आचार आप ही शुद्ध हो जायेगा।
    अध्ययनशील व्यक्ति स्वयं तो बेकार रहकर कहीं नहीं जाता, उसके पास बेकार के निठल्ले व्यक्ति भी नहीं आते और वे यदि कभी आ भी जाते हैं तो अध्ययनशील व्यक्ति के आस-पास का व्यस्त वायुमण्डल उनके अनुकूल नहीं होता और वे शीघ्र उसका अधिक समय खराब किये बिना खिसक जाते हैं। इस प्रकार फिजुल के व्यक्तियों के संग से उत्पन्न होने वाली विकृतियों से अध्ययनशील व्यक्ति सहज ही बच जाता है जिससे उसके आचार-विचार पर कुसंस्कार नहीं पडऩे पाते।
    निरन्तर अध्ययन करते रहने से मनुष्य का ज्ञान जाग्रत रहता है जिसका उद्रेक उसकी वाणी द्वारा हुए बिना नहीं रहता। अस्तु अध्ययनशील व्यक्ति की वाणी सफल, सार्थक तथा प्रभावोत्पादक बन जाती है। वह जिस सभा-समाज में जाता है, उसकी ज्ञान-मुखर वाणी उसे विशेष स्थान दिलाती है। अध्ययन शील व्यक्ति का ही कथन प्रामणिक तथा तथ्य पूर्ण माना जा सकता है। निरध्ययन वक्ताओं की वाणी बकवास से अधिक कोई महत्त्व नहीं रखती। स्वाध्याय नि:संदेह सामाजिक प्रतिष्ठïा का संवाहक होता है।
    संसार के इतिहास में ऐसे  असंख्य व्यक्ति भरे पड़े हैं जिनको जीवन में विद्यालय के दर्शन न हो सके किन्तु स्वाध्याय के बल पर वे विश्व के विशेष विद्वान व्यक्ति बने हैं। साथ ही ऐसे व्यक्तियों की भी कमी नहीं है जिनकी जिन्दगी का अच्छा खासा भाग विद्यालयों एवं विश्व-विद्यालयों में बीता किन्तु उसके बाद स्वाध्याय में प्रमाद करने के कारण उनकी एकत्रित योग्यता भी उन्हें छोडक़र चली गयी और वे अपनी तपस्या का न तो कोई लाभ उठा पाये ओर वे अपनी तपस्या का न तो कोई लाभ उठा पाये और न सुख योग्यता को बनाये रखने और बढ़ाने के लिए स्वाध्याय नितान्त आवश्यक है।
     कथा कक्ष में अथवा सार्वजनिक मंच से धाराप्रवाह बोलने वाले प्रोफेसरों तथा वक्ताओं का दैनिक जीवन देखने से पता चलता है कि अपना नित्य कर्तव्य निबटाने उनका शेष सारा समय स्वाध्याय में ही व्यतीत होता है उनके मुृख द्वारा धाराप्रवाह वाणी का निर्गमन और कुछ नहीं उस तेजोपूर्ण योग्यता का ही प्रवहन होता है जो वे अपने बहुमूल्य समय को क्षण-क्षण लगा कर स्वाध्याय द्वारा संचय किया करते हैं।
    संसार ज्ञान की जन्मभूमि है। यहाँ पर नित्य प्रति नई-नई जानकारियों, विचारणाओं, तर्कों तथा विद्याओं का जन्म होता है। हजो व्यक्ति अध्ययनशील होता है वह नित्य नये ज्ञानों से अवगत रहा करता है। उसे पता रहता है कि संसार में कहाँ क्या हो रहा है? कौन-सी पुरानी मान्यतायें बदल गई हैं और उनके स्थान पर कौन-सी नई प्रतिस्थापनायें हो रही हैं। उसे यह भी ज्ञान रहता है कि इन बदलती हुई परिस्थियों में उनका क्या स्थान  और क्या कत्र्तव्य है? इस प्रकार अध्ययनशील व्यक्ति एक जागरुक नागरिक की तरह ही जीवन जीने का सुख पाता है न कि मूढ़मति आदमी की तरह जिसे  अपने चारों ओर के, आस-पास के परिवर्तन का भी ज्ञान नहीं रहता।
    स्वाध्याय को मानसिक योग भी कहा गया है। जिस प्रकार प्रभु का नाम जपता हुआ योगी उस परमात्मा के प्रकाश रूप में तल्लीन हो जाता है उसी प्रकार एकाग्र होकर सद्ïविचारों के अध्ययन में तल्लीन हो जाने वाला अध्येता अक्षर ब्रह्मï की सिद्धि से ज्ञान रूप प्रकाश का अधिकारी बनता है। केवल योग ही नहीं अध्ययन भी प्रभु का साक्षात्कार करने के उपायों में एक प्रमुख उपाय है। स्वाध्याय जैसे सरल एवं सरस योग में प्रतिष्ठिïत होने वाला व्यक्ति किसी न किसी रूप में अपने परम लक्ष्य मोक्ष का पाकर शाश्वत सुख का अधिकारी बनता है


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