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सर्वोत्तम विभूति- विद्या

मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता क्या है? आदमी का असली गौरव किसे कहा जाय? मानवता की दैवी विभूति वास्तव में क्या है? 
शास्त्रकारों ने इन प्रश्नों का उत्तर इन शब्दों में दिया है - 

गतेऽपि वयसि ग्राह्य विद्या सर्वात्मना बुधै:। 
यद्यपि स्यान्न फलदा, सुलभा सान्जयन्मनि॥ 

''हे मनुष्यों! उम्र बीत जाने पर भी यदि विद्या प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो, तो तुम निश्चय ही बुद्धिमान हो। (क्योंकि विद्या ही मानव की सर्वोत्तम विभूति है।) विद्या इस जीवन में फलवती न हुई, तो भी दूसरे जन्मों में वह आपके लिए सुलभ बन जायेगी। 

सच्चा मनुष्य वही है जिसके पास विद्यारूपी धन है। बिना ज्ञान के व्यक्ति अन्य जानवरों के समान निरा पशु ही है। विद्या से ही मनुष्य जीवन सार्थक होता है, क्योंकि वही मनुष्य के आत्मविकास का साधन है। संसार में विद्या से बढ़कर कोई मित्र और अविद्या से बढ़कर कोई शत्रु नहीं है। विद्या के कारण ही मनुष्य समाज, परिवार और जीवन के आनन्द, उल्लास, सम्मान आदि का सुख लूटता है और अन्त में मोक्ष प्राप्त करता है। 

अविद्या या अज्ञान ही सब असफलताओं की जड़ है। जन्म से सब मनुष्य थोड़े- बहुत अन्तर के साथ बराबर से होते हैं, पर किसी विशेष क्षेत्र का ज्ञान, शिक्षण और विशेष अध्ययन ही उन्हें दूसरों से आगे बढ़ाता है। 
एक विचारक के शब्दों में ''विद्या नवयुवक का सहारा, धनवान का यश और प्रौढ़ व्यक्ति का सुख- साधन होती है। विद्या मिलने से मनुष्य विचारशील, एकाग्रचित्त और परिश्रमी बनता है। विद्या हमारी समृद्धि में आभूषण, विपत्ति में शरण स्थान और समस्त कालों में मनोरंजन का साधन होती है। विद्या का अंतिम ध्येय परमात्मा को जानना है। 

मनुष्य को परखने की कसौटी उनके पूर्वजों द्वारा कमाया गया धन, सम्पत्ति या जमीन- जायदाद नहीं है, न रूप सौंदर्य ही है। विद्या, बुद्धि, सद्ज्ञान, सद्बुद्धि और विवेक के मापदण्ड से ही मनुष्य के व्यक्तित्व की श्रेष्ठता की परख होती है। सच पूछा जाय तो आदमी की योग्यता, विद्वता और प्रतिभा ही उसके बड़प्पन की कसौटी है। 

विद्यादान एक गुरुतर दायित्व 

अध्यापन कार्य इसीलिए सबसे कठिन कार्य है। प्राचीनकाल में कोई हर प्रकार से उन्नत चरित्र वाला विद्वान ही शिक्षक बनने का साहस कर सकता था। ऐसे व्यक्ति को शिक्षण का कार्य सौंपा जाता था, जो अक्षर ज्ञान के साथ मनुष्य की प्रतिभा विकसित करने में सामर्थ्यवान हो। यह तत्त्व विद्या ही है जो मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है और ऊँचे स्तर पर पहुँचाती है। 

महाराज धृतराष्ट्र को कौरवों तथा पाण्डवों के शस्त्र- प्रशिक्षण देने के लिए सुयोग्य आचार्य की आवश्यकता थी, किंतु कोई विद्वान राजगुरु उन्हें दिखाई न दिया। अकेले शस्त्र प्रशिक्षण की बात रही होती तो वह कार्य कोई भी कर सकता था, लेकिन नैतिक स्तर ऊँचा उठाने के लिए चरित्र, सद्ज्ञान, विद्वत्ता और प्रतिभा सभी एक साथ एक ही व्यक्ति में मिलना जरूरी था। एक दिन द्रोणाचार्य भी उनकी सभा में आये। धनुर्विद्या में इतने प्रवीण आचार्य का पाण्डित्य देखकर महाराज मुग्ध हो गये और उन्होंने समझ लिया कि इनके पास रहकर बालकों के चरित्र का विकास हो सकेगा। 

यह विद्या नहीं, अविद्या है 

आधुनिक विद्या का स्वरूप कुछ बदल गया है। उसमें नैतिक शिक्षण और चरित्र निर्माण के लिए कोई स्थान नहीं है, कोरी बौद्धिक उन्नति की ओर ही प्रयत्न है। विद्यार्थियों का चरित्रबल, कर्मशक्ति, आशा, विश्वास, उत्साह, पौरुष, संयम और सात्विकता जाग्रत करने की शक्ति उसमें नहीं है। 
जिस विद्या में कर्तव्यशक्ति की प्रेरणा न मिलती हो, स्वतंत्र रूप से विचार करने की बुद्धि न आती हो, परिस्थितियों से टकराने की सामथ्र्य जो न दे सके, वह विद्या निस्तेज है, बिल्कुल निष्प्राण है। 

आज का युग ऐसी दिखावटी विद्या ही दे रहा है। हमारे असंख्य विद्यार्थी कला, विज्ञान और वाणिज्य की डिग्रियाँ प्राप्त करके निकलते हैं, तो उनमें छल- कपट, धूर्तता, दुश्चरित्रता, फैशनपरस्ती, विलासिता, द्वेष और अहंकार के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई देता। आज के कलियुगी विद्यार्थियों की करतूतें किससे छिपी हैं? तनिक- तनिक बातों पर हड़तालें, मार- पीट, लूट- खसोट, झगड़ेबाजी, परीक्षा में नकल, लड़कियों से गन्दा मजाक, अशिष्ट शब्दों का प्रयोग, भारी खर्च करने की आदत, सिनेमा, सिगरेट और पान इत्यादि व्यसन हर कोई देख सकता है। स्वतंत्र चिंतन का उनमें बिलकुल अभाव होता है। विचारों की पराधीनता का नाम अविद्या है। जिस पाठ्यक्रम में ऊपर बताई गई त्रुटियाँ हों, वह अविद्या ही कही जायेगी। 

जो ज्ञान मनुष्य के अच्छे संस्कारों को जाग्रत करे, मनुष्य के चरित्र के सर्वोत्तम तत्त्वों को विकसित करे और उसकी उत्तम वृत्तियों को बढ़ाकर उठा दे, वही विद्या माननी चाहिए। ज्ञान मनुष्य को स्वाधीन बनाये, साहसी बनाये, विद्या कहलाने का गौरव उसे ही मिल सकता है। 

अध्यात्म का दिव्य प्रकाश 
जो ज्ञान मनुष्य को सही दिशा, उन्नति का सही मार्ग और जीवन का सच्चा प्रकाश दिखाता है, उसे अध्यात्म कहते हैं। इस अध्यात्म को जाग्रत करने का काम आपको शुरू से ही करना होगा। विवेक जगाने वाली विद्या न रही तो पतित होना स्वाभाविक ही है। मनुष्य के भीतर जो पशुत्व है, जो गन्दगी है, उसे दूर करने का एकमात्र उपाय विद्या की प्रवीणता ही है। जब तक जीवन की दिशा सात्विक नहीं हो तो गुण, कर्म और स्वभाव में सत् तत्त्वों का समावेश नहीं होता, मनुष्य की जड़ता और पशुता तब तक दूर नहीं हो सकती। अध्यात्म विद्या सुखी जीवन की प्रमुख आवश्यकता है। 
आप मनुष्य की सर्वोत्तम विभूति उस विद्या, उस विद्वता और सद्ज्ञान को अधिकाधिक प्राप्त कीजिए। जिस विद्वता से मनुष्य स्वयं ही अपना योग्य साथी बनता है, जिससे वह अपनी आजीविका कमाता है, जिन्दगी सुख और सम्पन्न बनाता है, उसके लिए सच्ची लगन और गम्भीर अध्ययन की आवश्यकता है। विद्या आत्मा की प्यास है। जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए विद्या की प्रमुख आवश्यकता है। कठोर प्रयत्नों  से भी इसे प्राप्त किया जाना चाहिए। 

वाङ्मय खण्ड 'आत्मोत्कर्ष का आधार- ज्ञान, पृष्ठ १.६४- ६६ से संकलित, संपादित 







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