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काल के प्रवाह को बदलेगा युगऋषि के प्रचण्ड तप से उपजा युग साहित्य

परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (पुस्तक 'हमारी वसीयत और विरासत, पृष्ठ १.६८- १.७० से संकलित, संपादित) 

नवयुग आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रांति होगी तो वह लहू और लोहे से नहीं विचारों की विचारों से काट द्वारा होगी, समाज का नव- निर्माण होगा तो वह सद्विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही सम्भव होगा। अभी तक जितनी मलिनता समाज में प्रविष्ट हुई है, वह बुद्धिमानों के माध्यम से ही हुई है। द्वेष- कलह, नक्सलवाद, व्यापक नरसंहार जैसे कार्यों में बुद्धिमानों ने ही अग्रणी भूमिका निभाई है। यदि वे सन्मार्गगामी होते, उनके अंत:करण पवित्र होते, तप ऊर्जा का संबल उन्हें मिला होता, तो उन्होंने विधेयात्मक विचार प्रवाह को जन्म दिया होता, सत्साहित्य रचा होता। 

हिटलर ने जब नीत्से के सुपर मैन रूपी अधिनायक को अपने में साकार करने की इच्छा की तो सर्वप्रथम सारे राष्ट्र के विचार प्रवाह को उस दिशा में मोड़ा। अध्यापक- वैज्ञानिक वर्ग नाजीवाद का कट्टर समर्थक बना    तो उसकी उस निषेधात्मक विचार साधना द्वारा जो उसने ''मीन कैंफ के रूप में आरोपित की। बाद में सारे राष्ट्र के पाठ्यक्रम एवं अखबारों की धारा का रुख उसने उस दिशा में मोड़ दिया जैसा कि वह चाहता था। कार्लमाक्र्स ने सारे अभावों में जीवन जीते हुए अर्थशास्त्र रूपी ऐसे दर्शन को जन्म दिया जिसने समाज में क्रांति ला दी। पूँजीवादी किले ढहते चले गए एवं साम्राज्यवाद दो तिहाई धरती से समाप्त हो गया। इसी संदर्भ में हम कितनी ही बार लिंकन एवं लूथर किंग के साथ- साथ उस महिला हैरियट स्टो का उल्लेख करते रहे हैं, जिसकी कलम ने कालों को गुलामी के चंगुल से मुक्त कराया। 

परिस्थितियाँ आज भी विषम हैं। वैभव और विनाश के झूले में झूल रही मानव जाति को उबारने के लिए आस्थाओं के मर्मस्थल तक पहुँचना होगा और मानवी गरिमा को उभारने, दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाने वाला प्रचण्ड पुरुषार्थ करना होगा। साधन इस कार्य में कोई योगदान दे सकते हैं, यह सोचना भ्रांतिपूर्ण है। 
अध्यात्म की शक्ति विज्ञान से भी बड़ी हैं। अध्यात्म ही व्यक्ति के अंतराल में विकृतियों के माहौल से लड़ सकने- निरस्त कर पाने वाले सक्षम तत्त्वों की प्रतिष्ठापना कर पाता है। 

हमने व्यक्तित्वों में पवित्रता व प्रखरता का समावेश करने के लिए अपने भावी जीवनक्रम के लिए जो महत्त्वपूर्ण निर्धारण किए हैं, उनमें सर्वोपरि है लोक चिंतन को सही दिशा देने हेतु एक ऐसा विचार प्रवाह खड़ा करना, जो किसी भी स्थिति में अवांछनीयताओं को टिकने ही न दे। आज जन समुदाय के मन- मस्तिष्क में जो दुर्गति घुस पड़ी है, उसी की परिणति ऐसी परिस्थितियों के रूप में नजर आती है, जिन्हें जटिल, भयावह समझा जा रहा है। ऐसे वातावरण को बदलने के लिए व्यास की तरह, बुद्ध, गाँधी, कार्लमाक्र्स की तरह, मार्टिन लूथर किंग, अरविन्द, महर्षि रमण की तरह भूमिका निभाने वाले मुनि व ऋषि के युग्म की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयासों द्वारा विचार क्रांति का प्रयोजन पूरा कर सके। 

यह पुरुषार्थ अंतःक्षेत्र की प्रचण्ड तप साधना द्वारा ही सम्भव हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष रूप युग मनीषा का हो सकता है, जो अपनी शक्ति द्वारा उत्कृष्ट स्तर का साहित्य रच सके जिसे युगांतरकारी कहा जा सकता है।






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