The News (All World Gayatri Pariwar)
Home Editor's Desk World News Regional News Shantikunj E-Paper Upcoming Activities Articles Contact US

हल्का- फुल्का मस्ती भरा रहे जीवन

जीवन को एक खेल जैसा माना जाना चाहिए और उसे हार- जीत की बहुत परवाह किये बिना विनोद- मनोरंजन के लिए, बहुत हुआ तो उसमें प्रवीणता पाने के लिए, मण्डली में फुर्तीला अनुभव किए जाने की दृष्टि से खेला जाना चाहिए। हल्की- फुल्की जिन्दगी जीने वाले ही शान्ति से रहते और चैन- संतोष के दिन काटते हैं।

नाटक के अभिनेता जैसा दृष्टिकोण भी सही है। कभी राजा, कभी रंक बनने में पात्र को न कोई संकोच लगता है और न असमंजस होता है। वह अपनी निजी हैसियत और प्रदर्शन की खोखली वास्तविकता को समझता है। इसलिए सिंहासन हार जाने और मुकुट उतर जाने पर भी चेहरे पर मलीनता नहीं आने देता। रात को चादर तानकर गहरी नींद सोता है।

वैसी ही मनःस्थिति अपनी भी होनी चाहिए। दिन में क्या किया? कितना सोचा था, कितना पूरा हो सका, कल के लिए क्या जीवन- क्रम निर्धारित किया है, इतना पर्यवेक्षण तो सोने के पूर्व अवश्य कर लिया जाय, परन्तु विगत की घटनाओं, दिन में किसी के अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार के चिन्तन- बदला आदि लेने की भावना के विचार सोते समय मन पर कतई न आने दिए जायें। मन हल्का रहे। कुछ घटा भी है, इसकी छाया मात्र भी मस्तिष्क पटल पर आने न दी जाय, यही सच्ची जीवन शैली है।

तनाव रहित मन तुरंत निद्रा देवी का आह्वान करता है। ऐसी हल्की- फुल्की जिन्दगी ही निरोग काया की जन्मदात्री बनती है। एकान्त सेवन, गुहा- प्रवेश, गर्भकाल की स्थिति जैसी मानसिकता यदि बनायी जा सके तो कोई कारण नहीं कि आये दिन के संकटों से जूझने योग्य सामर्थ्य मनुष्य में विकसित न हो सके। मन को साधकर अनुकूल दिशा में मोड़ लेना ही सच्चे अर्थों में जिंदगी जीना है।
बड़ी से बड़ी आशा रखें किन्तु बुरी से बुरी संभावना के लिए तैयार रहें। मनुष्य के हाथ मेंं कर्त्तव्य करना भर है। यदि उसे ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ निभाया गया हो तो गर्व गौरव अनुभव किया जा सकता है। यह नहीं समझना चाहिए कि परिस्थितियों का कुछ प्रभाव होता ही नहीं। कई बार जागरूक और सुयोग्य तक चपेट में आ जाते हैं जबकि अंधे के हाथ बटेर लगती भी देखी गयी है।
अपने से बड़ों को देखकर उन जैसे वैभव की अभिलाषा जगाना भी अनुपयुक्त है। इस संसार मेंं एक से एक बड़े पड़े हैं। किस- किस से तुलना की जाय? तुलना ही करनी है तो अपनों से छोटों के साथ करनी चाहिए। अपंगों, दरिद्रों, अशिक्षितों, रोगियों, असहायों की तुलना में जब अपनी स्थिति कहीं अधिक अच्छी है तो उस पर संतोष व्यक्त करने में क्या हर्ज है?

जो घटिया सोचते रहे वे घटिया बनकर रहे। जिन्होंने ऊँचा सोचा, ऊँचा निर्णय किया, ऊँचे प्रयासों में हाथ डाला, वे ही ऊँचे उठे, आगे बढ़ते ही गये और महामानवों के लिए निर्धारित महानता के उच्च शिखर पर जा विराजे। यह मनुष्य का अपना रुझान और चुनाव है कि वह श्रेष्ठता और निकृष्टता के दो रास्तों में से किसे चुने और किस पर कितनी तत्परता के साथ कदम बढ़ाये।
(वाङमय 2/6.11 से संकलित, सम्पादित)






Click for hindi Typing


Related Stories
Recent News
Most Viewed
Total Viewed 850

Comments

Post your comment

RAJEEV CHOUDHARY
2015-03-04 21:12:50
apne jiwan ke swarup ko kaise banakar jene se manusya jiwan sarthak hoga iske liye ek bar prayog karke dekhne se pura gyan milta hai jo mujhe mila hai,aise guru ko sat -2 naman.


Warning: Unknown: write failed: No space left on device (28) in Unknown on line 0

Warning: Unknown: Failed to write session data (files). Please verify that the current setting of session.save_path is correct (/var/lib/php/sessions) in Unknown on line 0