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गायत्री जयंती पर्व से गायत्री साधना को अधिक प्राणवान बनाने का क्रम चलायें।

जयंती कैसे मनायें ?

गायत्री जयंती आने वाली है। माता गायत्री की जयंती, उनका जन्मोत्सव मनाने का उत्साह भी हममें उभर रहा है। हम सोचते हैं कि इस बार बेहतर कुछ विशेष करेंगे। प्रश्र उठता है क्या करें और क्यों करें? इस उत्साह को सार्थक दिशा देनी है तो युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव के निर्देशों- संकेतों को भली प्रकार समझते हुए, उसके अनुसार अपने प्रयासों, चिन्तन- चरित्र एवं व्यवहार को गति देने के लिए साधनात्मक पुरुषार्थ करना होगा। उन्होंने कहा है-

''हम चाहते हैं कि आप अपनी मान्यताएँ बदलें। आप यह न सोचें कि अपने भगवान को प्रसाद खिलाया है, अगरबत्ती जलाई है तो अपनी मनोकामना पूर्ण हो जायेगी। यह गलत है। उसमें आपको संशोधन करना होगा। हम कर्मफल के सिद्धांत को स्वीकार करे। ईश्वर के अंकुश को हम स्वीकार करें, यही ईश्वर की वास्तविक पूजा- उपासना है, जिसे आपको भली- भाँति समझने- समझाने का प्रयास करना चाहिए।

आप अनुभव करें कि इस दुनियाँ में एक सुप्रीम पावर है, जो अच्छी है, नेक है। उसका ही अंकुश सारी दुनिया में है, यह आपकी मान्यता होनी चाहिए। इस आस्तिकता के प्रचार के लिए हम गायत्री माता के मंदिर बनाते हैं। इसी का विस्तार हम चाहते हैं।
(वांगमय ६८ पृष्ठ ५.६१ से)

युगऋषि की आकांक्षा के अनुसार हमें गायत्री जयंती के लिए अपने लक्ष्य बनाने चाहिए। सज्जा, समारोह आदि का उद्देश्य जन सामान्य के ध्यान को आकर्षित करना, उनके उत्साह को जगाना भर होता है। उसे भी किया जाय, किन्तु इससे गायत्री माता प्रसन्न हो जायेंगी या हमारा दायित्व पूरा हो जायेगा, यह न माना जाय। इसके लिए कुछ लक्ष्य रखे जायें-

>कितने नये घरों- व्यक्तियों को गायत्री साधना से जोड़ा जाय ?
>हम अपनी गायत्री साधना को पहले से अधिक प्राणवान कैसे बनायें ?
>जो लोग पहले से साधनारत हैं, उनकी साधना को अधिक प्राणवान- प्रभावशाली बनाने के लिए अपने व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयास कैसे हों ? 

पूज्य गुरुदेव की इच्छाओं में अपनी इच्छा मिलाते हुए यदि हम गायत्री जयंती पर्व को इस प्रकार मनायें कि गायत्री साधना के क्षेत्र का भी विस्तार हो तथा वह पहले से अधिक प्राणवान प्रभावी बने। ऐसा करने से हम कह सकेंगे कि हमने गायत्री जयंती पर्व को पहले से बेहतर ढंग से मनाया।

प्राण अधिक परिष्कृत प्रखर बने

भावना की दृष्टि से हम यह कह सकते हैं कि हम भी वही करना चाहते हैं जो गुरुदेव कराना चाहते हैं; लेकिन वैसा हो नहीं पाता। यह कथन सही है तो एक बात यह भी सही है कि हमारी साधना उतनी प्राणवान नहीं बन सकी, जो इच्छित प्रयासों को सफल बना सके। हमारा व्यक्तित्व उतना समर्थ नहीं बन पा रहा है, जो युग के अभियान को वांछित गति दे सके।

गायत्री माता वेदमाता है, देवमाता है, विश्वमाता है। यदि हमारी उपासना- साधना प्राणवान बने, तो उनके उक्त स्वरूपों के वरदान हम पर उतरने लगें। वेदमाता की कृपा से हमारे चिन्तन का परिष्कार हो जाये। देव माता के अनुग्रह से हमारे अंदर चरित्र में देवत्व जाग जाये। इन दो अनुदानों के सहारे हम गायत्री विद्या को, सच्ची आस्तिकता के अभियान को गति देने, उन्हें विश्वमाता के रूप में स्थापित करने में समर्थ हो सकते हैं। फिर हमारे प्रयास पुरुषार्थ के साथ दिव्य अनुदान प्रचुर मात्रा में जुडऩे लगेंगे। युगऋषि ने स्पष्ट कहा है-

''आदमी के भीतर एक जखीरा है, जो महत्त्वपूर्ण है किन्तु सोया हुआ है। इसको हम जगाना चाहते हैं, हम आप लोगों को महत्त्वपूर्ण व्यक्ति बनाना चाहते हैं। इसके लिए तप करना होता है। तप के बहिरंग का सम्बन्ध मनुष्य के खान- पान आदि से है। उसका ब्रह्मवर्चस वाला भाग अंतरंग है। उसे जान लेने से मनुष्य में देवत्व आ जायेगा। तब मनुष्य का व्यक्तित्व उभरता हुआ विकसित होता हुआ चला जायेगा। उसके पास भगवान की, गुरु की दी हुई ऋद्धि- सिद्धियाँ आती चली जायेंगी।

इसके लिए मनुष्य को अंतरंग- बहिरंग जीवन में आस्तिकता और तपस्या का विकास करना होगा। आस्तिकता का अर्थ है नेक -जीवन जीना तथा तपस्या का अर्थ- लोक मंगल का जीवन जीना; समाज, देश, संस्कृति के विकास- प्रगति के लिए श्रम करना, उसमें अपनी अकल, धन तथा समय लगाना।
(वा.क्र. ६८, पृष्ठ ५.६२)

यह सब हम चाहते तो हैं किन्तु कर नहीं पाते। यह प्राणों की मलीनता, दुर्बलता का ही प्रमाण है। हमें गायत्री साधना से अपने- प्राणों को अधिक परिष्कृत और प्रखर बनाना ही होगा, तभी युगधर्म का पालन ठीक ढंग से कर सकेंगे।

हंसवाहिनी- त्रिपदा

साधना को प्राणवान बनाने के सूत्र गायत्री माता के उक्त संबोधनों में सन्निहित है। वह हंसवाहिनी है। उनके विशेष अनुग्रह हंस प्रवृति के व्यक्तियों पर ही उतर सकते हैं। हंस के गुण हैं- शुभ्रता, विवेकशीलता और सत्साहस।

शुभ्रता पवित्र जीवन तथा नीरक्षीर विवेक में अपने सत्कर्तव्यों के निर्धारण की क्षमता है। आस्तिकता की गहराई से यह गुण विकसित होते हैं। साहसिकता- मोती चुगना अन्यथा लंघन कर जाना, यह साहसिकता तप साधना से उभरने वाली विशेषताएँ है।

प्रत्येक गायत्री साधक में जीवन की पवित्रता उभरनी ही चाहिए। कैसी भी परिस्थितियाँ हो उनमें अपने सत्कर्तव्य निर्धारित कर लेने का विवेक होना ही चाहिए। जो हमारे लिए उपयुक्त है उस पर दृढ़ता से डट जाने की साहसिकता भीतर से उभरनी ही चाहिए।

नीरक्षीर विवेक जागे, तो विचार क्रान्ति की धारा प्रखर हो उठे। ऐसा होना ही वेदमाता के अनुग्रह का प्रमाण माना जा सकता है। मुक्ता चुगना, केवल आदर्शों का वरण करने का साहस नैतिक क्रान्ति का पर्याय है। जब यह क्षमता जागे तभी देवमाता के अनुग्रह मिलने की बात सिद्ध होती है। हंस वाहिनी का अनुग्रह पाने के लिए अपने अंदर उक्त हंस वृत्तियों को जगाने के दृढ़ संकल्प के साथ साधना का क्रम चलाया जाना चाहिए।
त्रिपदा- गायत्री माता त्रिपदा है। तीन धाराओं वाली है। हमारी जीवन साधना में भी तीन प्रमुख धाराएँ होती हैं- 

१. भावना - यही श्रद्धा रूप में विकसित होती है और उपासना को प्रखर बनाती है। आत्मवत् सर्वभूतेषु के स्तर तक पहुँचाती है।
२. विचारणा - यही प्रज्ञा रूप में विकसित होती है और जीवन साधना में प्रखरता लाती और सत्कर्मों को आराधना बनाती है।
३. कर्मठता - यही निष्ठा रूप में विकसित होती है। अपनी कर्म साधना के नियम अडिग भाव से चलने की क्षमता अंदर से उभर कर आती है। 
 
इन तीनों धाराओं का संतुलित समन्वय जीवन साधना में हो, तो साधना प्राणवान बन ही जाती है। साधना का कर्मकाण्ड जो भी किया जाय उसके साथ श्रेष्ठ विचारणा और उत्कृष्ट भावना का सुसंयोग किया जाय, तो परिणाम अवश्य सामने आते हैं।

गायत्री जयंती पर्व पर उभरने वाले दिव्य 'प्रेरणा प्रवाह का सदुपयोग करते हुए हमें अपने अंदर हंस वृत्तियों तथा त्रिपदा की तीनों धाराओं के समावेश के सुनिश्चित प्रयास करने चाहिए। इसमें मन की उच्छृंखलता- अनगढ़ता सबसे बड़ी बाधा बनती है। इसके लिए साधक को मनोनिग्रह की साधना अवश्य करनी पड़ती है।

मनोनिग्रह की साधना

साधना में मनोनिग्रह का बहुत महत्त्व माना गया है। मन को ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण माना जाता है। निग्रहीत- नियंत्रित मन को मित्र तथा अनगढ़- उच्छृंखल मन को शत्रु कहा गया है। यहाँ मन की व्याख्या सीमित नहीं, व्यापक रूप में की जाती है।
युगऋषि ने व्यापक मन का स्वरूप समझाते लिखा है-

''जिस प्रकार ज्ञान का कोई स्वरूप नहीं है वह मन की ही एक शक्ति है, उसी प्रकार मन का भी कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इच्छा और विचार करने की शक्ति का ही नाम मन है। इसलिए मनोनिग्रह के लिए, मन को वश में रखने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि उसे निरंतर सद्विचारों में निमग्र रखा जाय।
(वांगमय ०४, पृष्ठ ३.३७)

भगवद्गीता में यह तथ्य स्पष्ट किया गया है कि मन को काबू में करना आसान नहीं है। साधक यही कहते पाये जाते हैं कि हम जानते तो बहुत कुछ है लेकिन प्रयासों के साथ मनोयोग नहीं सध पाता, इसलिए वांछित लाभ भी नहीं मिल पाते।लेकिन उसे अभ्यास और वैराग्य द्वारा काबू किया जा सकता है। 
 
'अभ्यासेन च कौन्तेय: वैराग्येनग्रह्यते।
यही बात महर्षि पतंजलि ने योगशास्त्र में कही है- 'अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोध:।

अर्थात् अभ्यास और वैराग्य से मन का निरोध किया जाता है।
मन में स्थिरता नहीं होती, यह बात नहीं। मन जहाँ रस लेने लगता है वहाँ से हटाये नहीं हटता। मन सामान्य रूप से लौकिक प्रसंगों में रस लेने का आदी हो जाता है। वह अपने उसी रस में घर की तरह रहना चाहता है। उसे उस अनगढ़ रस से निकाल कर श्रेष्ठ रसो में लगाने की साधना को मनोनिग्रह कहते हैं। युगऋषि ने इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है-

''मन में अधिकांश वही इच्छाएँ उठती हैं, जो तात्कालिक या अल्पकालिक सुख दे सकती है। इन्द्रियों के सुख उसमें प्रधान हैं। मन जब तक इन्हीं नन्हीं- नन्हीं इच्छाओं में फँसा रहता है तब तक न उसकी शक्तियाँ प्रकट होती है और न मनुष्य की उपयोगिता सधती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम आध्यात्मिक जीवन का भी चिंतन किया करें। वैराग्य ऐसे ही चिंतन का नाम है जिसमें लोकोत्तर जीवन की कल्पना करने और सत्य जानने के प्रयास किए जाते हैं।.....अभ्यास से उद्धतमन वश में होता है और वैराग्य से उसे निर्मल, कोमल और शान्त बनाया जा सकता है।

सारे कर्मकाण्ड इन्द्रियाँ और मन को कल्याणकारी अभ्यास कराने के लिए किए जाते हैं। हमने क्या- क्या कर्मकाण्ड किए इसका महत्व नहीं है, महत्व इस बात का है कि हमनें अपने मन और इन्द्रियों को भी कितना साधा, कितना अनुशासित बनाया।

जब अपना राग- लगाव हीन प्रवृत्तियों से होता है तो मन में विकार, निष्ठुरता, उद्विग्रता आदि दोष पनपने लगते हैं। राग- लगाव जब सनातन सत्यों के साथ जुड़ता है, तो मन निर्विकार, सरल और शान्त रहने लगता है। अपने राग- अनुराग को सत्य- सनातन से जोडऩे को वैराग्य कहते हैं। सारे स्वाध्याय, सत्संग, ध्यान आदि इसी वैराग्य भाव को परमात्म सत्ता के प्रति उत्कृष्ट प्रेम- भक्तिभाव या अनन्य भाव की सिद्धि के लिए किए जाते हैं।

आहार शुद्धि करें

जैसा आहार मिलता है, वैसा शरीर विकसित होता है। इसलिए आहार को पौष्टिक और सात्विक बनाने की साधना भी करनी पड़ती है। आहार के स्वाद के चक्कर में लोग उसकी पौष्टिकता और सात्विकता की उपेक्षा कराने लगते हैं। साधना में उपवास का उद्देश्य आहार को सुपाच्य और सात्विक बनाना होता है। युगऋषि कहते रहे हैं कि क्या खाया, क्या नहीं खाया इसका महत्व नहीं है, महत्व इन्द्रियों और मन को साधने का है।

आहार से शरीर को पोषण तो होता ही है, मनुष्य की प्रवृत्तियाँ भी उससे प्रभावित होती है। जिस आहार से चित्त प्रकुपित हो जाता है, उससे क्रोध, अहंकार आदि की प्रवृत्तियां भी पनपती है। कफ प्रकुपित करने वाले आहार से लोभ, मोहादि की वृद्धि भी होने लगती है। वात प्रकुपित होने पर मनुष्य अवसादग्रस्त होते देखे जाते हैं। इसलिए आहार इन्हें संतुलित रखने वाले ही होने चाहिए। इसके अलावा अन्न के संस्कार भाग से मन की प्रवृत्तियाँ प्रभावित होती है। इसलिए साधक को मेहनत और ईमानदारी की कमाई ही खानी चाहिए। पेट भर लेने के लिए जो आहार लिया जाता है, उसके अतिरिक्त विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों से ग्रहण किये जाने वाले तत्त्व भी आहार की श्रेणी में आते हैं। युगऋषि ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है-

''हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ बाहरी जगत से जो कुछ भी उद्दीपन ग्रहण करती है वह सब चेतना के लिए एक प्रकार का भोजन है। अन्न जिस प्रकार हमारे मन को प्रभावित करता है वैसे ही बाह्य उद्दीपन भी उसे प्रभावित करते रहते हैं। इसलिए स्वभाव को संशोधित करने के संदर्भ में इस समग्र आहार को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इससे कम में बात बनेगी नहीं।

आँखों से दृश्य दिखते ही रहते हैं, किन्तु किसी व्यक्ति या वस्तु को हम जिस भाव से देखते हैं, वह भाव हमारी अंत:चेतना के आहार बन जाते हैं। इसी प्रकार सुने हुए शब्द, किए हुए स्पर्श, जीभ से लिए हुए स्वाद तथा सूंघी हुई गंध के भाव भी हमारे आहार बन जाते हैं। साधकों को चाहिए कि वे प्राणों के परिष्कार के लिए सभी ज्ञानेन्द्रियाँ से श्रेष्ठ आहार ही ग्रहण करें।

गायत्री जयंती पर गायत्री साधना को अधिक व्यापक और अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रयास करें तो गुरुदेव की प्रसन्नता तथा युगशक्ति के श्रेष्ठ अनुग्रह का लाभ हम सबको प्राप्त हो सकता है। 






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Ramesh Chandara Mishra
2015-09-09 15:20:53
Vedmurti, taponisth, yug drishtha parampujya gurudev ki jai , Bandneeya Mata ji ki Jai, Ved Mata Gayatri Mata ki jay
Ganesh pandya
2015-07-26 17:25:57
Daily japam
Balram shukla
2015-06-18 09:51:39
How to improve my body and soul I thought.
DHARMVIR KUMAR ANAND
2015-06-11 14:39:49
Jay Gurudev
Gheewala Yash Chandravadanbhai.
2015-06-10 12:55:47
Jay gurudev.
Archana mehta
2015-05-28 08:44:30
Thanks for this inspiring thought..jai gurudev.
Ramakant Gupta
2015-05-28 07:49:14
Good
Jaydev acharys
2015-05-25 22:55:51
Gurudev ka vachan karana
Pramod Sahu
2015-05-19 13:49:31
Inspiring.. Planning to be in Shantikunj with family on this Great day.. Jai Gurudev..
BRAJNESH SINGH PARIHAR
2015-05-18 19:03:20
SADHANA ANUSTHAN KI SOCH RAHE THE!