The News (All World Gayatri Pariwar)
Home Editor's Desk World News Regional News Shantikunj E-Paper Upcoming Activities Articles Contact US

योग दिवस मनायें और उसे सफल-सार्थक बनाने की समुचित तैयारी करें

भागीदारों को व्यावहारिक योग समझाने, साधना के संकल्प कराने और प्रशिक्षण देने की व्यवस्था बनायें | 

पाक्षिक के १६ अप्रैल अंक में अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (२१ जून) के संदर्भ में राष्ट्रीय योजना के अनुसार अपने संगठन द्वारा अपनायी जाने वाली रीतिनीति को स्पष्ट किया गया था। उसी में आम जनता की भागीदारी के लिए प्रचार पत्रक का प्रारूप भी दिया गया था। उसी निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आयोजन के संचालन, उस क्रम में दिये जाने वाले उद्बोधन तथा भागीदारों से कराये जाने वाले संकल्पों का प्रारूप भी दिया जा रहा है। प्राणवान परिजन इसी आधार पर अपनी तैयारी को प्रभावशाली बनायें, ऐसी अपेक्षा है। 

अवसर का लाभ उठायें 
 
  • युगऋषि, परम पूज्य गुरुदेव ने अपने कथन और लेखन में यह बात कई जगह स्पष्ट की है कि युग निर्माण के सूत्रों को लोगों की अभिरुचि और समय के प्रवाह के अनुरूप अनेक प्रकार से प्रस्तुत, प्रचारित और प्रयुक्त करने का कौशल अपनाना होगा। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के संदर्भ में जो हवा चल पड़ी है, उसका लाभ लेते हुए इसके माध्यम से जीवन जीने की कला का 'समग्र और व्यावहारिक योग जन- जन तक पहुँचाया जा सकता है।
  • युगऋषि ने अपनी पुस्तक 'जीवन देवता की साधना- आराधना में जीवन के समग्र व्यावहारिक योग को 'प्रज्ञायोग के नाम से प्रस्तुत किया है। उसे ध्यान में रखते हुए योग दिवस की ऐसी रूपरेखा बनायी गयी है कि देश और दुनिया के सभी वर्गों, सभी सम्प्रदायों और सभी स्थितियों के नर- नारी उसे सहज भाव से अपना सकें और उसका भरपूर लाभ उठा सकें। योग साधना के मार्ग से युग निर्माणी तैयार करने का एक अच्छा अवसर सामने है, इसका सदुपयोग किया जाय। 
  •  
    तैयारी पूरी करें पहले चरण में सक्रिय कार्यकर्ताओं, संगठन के समन्वयकों सेे परामर्श करके अपने संगठन द्वारा किए- कराये जाने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा बना ली जाय। रुचि और सामर्थ्य के अनुसार व्यक्तियों को छाँटकर उन्हें विभिन्न जिम्मेदारियाँ सौंप दी जायें।

    गत अंक में दिये गये पत्रक (अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस- एक निवेदन) को अपनी आवश्यकता के अनुरूप छपवा लिया जाय। उसके आधार पर प्रचार, संपर्क और सहयोग का क्रम प्रारंभ कर दिया जाय।

    कुछ समझदार परिजनों को अपने क्षेत्र के अन्य प्रभावशाली सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों से सम्पर्क करने की जिम्मेदारी दी जाय। उन्हें पत्रक देकर तद्नुसार भागीदारी के लिए सहमत किया जाय। वे चाहें तो युग निर्माण परिवार के समारोह में भाग लें, चाहें तो इसी प्रारूप अथवा उसमें कुछ संशोधन, रद्दोबदल करके अपने स्तर पर आयोजन सम्पन्न करें। जैसी स्थिति बने उसी के अनुसार अपना सहयोग- सहकार उन्हें प्रदान किया जाय।
    अपने आयोजन के विभिन्न क्रमों के लिए व्यक्तियों को तैयारी और संचालन के लिए नियुक्त और प्रशिक्षित किया जाय।  
  • सवेरे वाले कार्यक्रम (पौने सात से नौ बजे तक) के लिए सभी व्यवस्थाएँ करने तथा संचालन क्रम में संगीत, उद्बोधन आदि के लिए उपयुक्त व्यक्तियों को समय रहते तैयार कर लिया जाय।
  • मंच का बैनर और अन्य बैनरों की विषयवस्तु इसी पृष्ठ पर दी जा रही है।
  • अपने कार्यक्रमों की तैयारी तो करें ही, जो अन्य संगठन अपने आग्रह से तैयार हों, उन्हें भी तैयारी में सहयोग प्रदान करें।
  • रैली की योजनानुसार पूर्व तैयारी करके रखें।

समारोह मंच से 
 
समारोह के मंच से संचालन की तैयारी और रिहर्सल पहले से कर ली जाय। आने वाले नर- नारियों को उनके निर्धारित स्थान पर क्रमबद्ध ढंग से बैठाने के लिए स्वयंसेवक नियुक्त करें।
ठीक ६.४५ बजे से प्रारंभ करें। कोई मधुर कंठ वाले भाई- बहिन ''हे प्रभो अपनी कृपा की .... प्रार्थना गायें और सबसे दुहरवायें। 
 
उसके बाद सबसे अपने- अपने इष्टमंत्र/ इष्टनाम का जप करने को कहेंं। समय पूरा होने पर लम्बे स्वर में ॐ का गुंजार करें। 
 
राष्ट्रीय मानक के अनुसार योग क्रियाएँ तथा प्रज्ञा अभियान के योग व्यायाम की क्रियाएँ पूर्व निर्धारित प्रशिक्षितों से करायें। कुछ स्वयंसेवकों को करने वालों की मुद्राएँ ठीक कराने के लिए भी नियुक्त करें। 
 
उद्बोधन का विषय निर्धारित २० मिनट में ही पूरा करने के लिए वक्ता को पहले से तैयार करें। उद्बोधन के बिंदु इसी आलेख में दिये जा रहे हैं। 
 
संकल्प पत्र का प्रारूप भी इसी आलेख के साथ दिया गया है। उसे आवश्यक संख्या में छपवा लें तथा भागीदारों को प्रवेश के साथ ही देते जाने की व्यवस्था बना लें। उद्बोधन के बाद संकल्प मंच से बोलकर सबसे दुहरवाया जाय। निर्धारणों को भरकर पत्रक जमा करने को कहा जाय।
अंत में 'असतोमाऽ सद्गमय, तमसोमाऽ ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽ अमृतंगमय की प्रार्थना- शांतिपाठ करायें। 
 
बाद में संकल्पों का मुहल्लेवार वर्गीकरण, कर योग्य परिजनों को उनसे सम्पर्क करके आवश्यकतानुसार प्रशिक्षण सत्र चलाने की योजना तैयार की जाय। इसके सूत्र आगे के अंकों में दिये जायेंगे।   

उद्बोधन की विषयवस्तु के सूत्र

मानव जीवन परमात्मा का दिया हुआ एक महान उपहार है। कुयोग से यह दु:ख और दुर्गति का करण बन जाता है और सुयोग से, साधना से यही साधन- धाम और मुक्ति का द्वार बन जाता है। हम सुयोग से जुड़ें, योग साधक बनें और जीवन को सफल और आनन्ददायक बनायें।

योग को केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित न रखें। उसे समग्र और व्यावहारिक बनायें। व्यावहारिक योग साधन का लक्ष्य है- स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज। इन सभी को कुयोगों से बचाने और सुयोगों के लिए साधने से जीवन श्रेष्ठ- सार्थक बनता है।

स्वस्थ शरीर इसे जीवन का पहला सुख कहा गया है। धर्मशास्त्र भी कहता है कि शरीर ही धर्म साधन का मुख्य साधन है। लोकोक्ति भी है ''काया राखे धरम। युगऋषि ने इसके लिए साधना का सूत्र इस प्रकार दिया है-

''शरीर को भगवान का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे। (सत्संकल्प क्रमांक-

रोज १५ मिनट से ३० मिनट का समय योग- प्राणायाम की साधना के लिए लगायें। यह क्रम सिखा तो कोई भी देगा, लेकिन उसे संकल्पपूर्वक जीवन का अंग बनाने की साधना तो स्वयं ही करनी पड़ेगी।

अपने आहार को आरोग्य के नियमों के अनुरूप शुद्ध, सात्विक, सुपाच्य बनाने का अभ्यास करें।

स्वच्छ मन - आज जीवन में जितनी भी विसंगतियाँ हैं, वे सब अस्वच्छ मन के उपद्रवों के कारण ही पनपी हैं। शरीर के रोग प्राणघातक व्यसन, अनीतिपरक भ्रष्टाचार और क्रूर अपराध सभी अस्वच्छ मन के उत्पाद होते हैं। मन स्वच्छ हो तो उसी में परमात्मा का बिंब दिखने लगता है। स्वच्छ मन की साधना के लिए युगऋषि का सूत्र है-
''मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।(सत्संकल्प क्रमांक- )

जैसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उसकी सफाई रखने, उसे उचित आहार देने और व्यायाम करने की व्यवस्था करनी होती है, उसी तरह मन को स्वच्छ- स्वस्थ रखने के लिए, उसे अच्छी भावनाओं से जोडऩे के लिए जप और ध्यान का क्रम बनाना होता है। विचारों को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने के लिए सुनकर या पढ़कर सद्विचारों का संग्रह किया जाता है। जैसे प्रकाश की व्यवस्था न होने से अंधेरा हो जाता है, वैसे ही सद्विचारों की व्यवस्था न होने से कुविचार पनपने लगते हैं। इसके लिए नियम बनायें- 'भजन के बिना भोजन नहीं, स्वाध्याय के बिना शयन नहीं। संचित विचारों को चिन्तन- मनन द्वारा आत्मसात करें, यही मन को पुष्ट बनाने वाला व्यायाम है।

सभ्य समाज - मनुष्य एक सामाजिक प्रााणी है। समाज मनुष्य को बनाता है और मनुष्य समाज को गढ़ता है। जब मनुष्य स्वयं को समाज का अंग मानता है, सबके हित में अपना हित समझता है, तब सुयोग बनता है। जब वह संकीर्ण स्वार्थों में फँसकर समाज का शोषण करने की सोचता है तब कुयोग बनता है। सभ्य, स्वस्थ, सुसंस्कारी समाज बनाने के लिए युगऋषि का सूत्र है-

''संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे। (सत्संकल्प क्रमांक- १३)
इसका अभ्यास थोड़े से शुरू करें, फिर उसे क्रमश: बढ़ाते चलें। पहले एक घंटा समय तथा एक- आधी रोटी की कीमत रोज निकालें। उसका सदुपयोग दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन तथा सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए करें। अभ्यास होने पर उसमें रस भी आने लगता है, फिर अधिक समय और अधिक साधन निकालने में सुख और गौरव का बोध होने लगता है।

योग जीवन- जीवन को योगमय बनाने का सूत्र है 'सोवत- जागत शरण तुम्हारी। जागते ही जीवन को प्रभु का प्रसाद मानकर स्वीकार करें। उसी के अनुशासन में उक्त नियमों के अनुसार चलाने की योजना बनायें। दिनभर उसी क्रम को निभाने का प्रयास करें। रात्रि को सोते समय परमात्मा के सामने दिनभर का ब्यौरा रखें। भूलों के लिए क्षमा माँगें और अगला दिन बेहतर बनाने की क्षमता माँगते हुए समर्पण भाव से सोयें। इस प्रकार हर व्यक्ति अपने जीवन को योगयुक्त- दुर्गतिमुक्त बना सकता है।   

For More :1- अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस
                2 Pragya Abhiyan Pakshik






Click for hindi Typing


Related Stories
Recent News
Most Viewed
Total Viewed 1828

Comments

Post your comment


Warning: Unknown: write failed: No space left on device (28) in Unknown on line 0

Warning: Unknown: Failed to write session data (files). Please verify that the current setting of session.save_path is correct (/var/lib/php/sessions) in Unknown on line 0