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गायत्री योग अपनायें, जीवन के कुयोगों से बचें, सुयोगों का लाभ उठायें

योग का लक्ष्य और साधन

योग अर्थात् जुडऩा। जीवात्मा को परमात्मा से जोडऩा। जीव की अपूर्णता को ईश की पूर्णता के साथ जोड़कर योगयुक्त जीवन का लाभ उठाना। किसी भी कार्य की सफलता के लिए मनुष्य को तीन माध्यम अपनाने पड़ते हैं, वे हैं- १.तीव्र इच्छा, २.प्रबल पुरुषार्थ और ३.श्रेष्ठ कौशल।

इन तीनों में से एक में भी कमी हो तो बात बनती नहीं। इच्छा के बिना प्रयास- पुरुषार्थ शुरू ही नहीं होता। पुरुषार्थ कमजोर हो तो साधक मार्ग में ही थककर बैठ जाता है। कौशल की कमी से ढेरों पुरुषार्थ करने पर भी वाञ्छित- उचित परिणाम मिल नहीं पाते। इसीलिए महर्षि पतंजलि ने पहले शरीर और मन को सबल- पुष्ट बनाने के लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि का विधान दिया है और फिर धारणा, ध्यान, समाधि के उच्च स्तरीय सोपानों की विधि- व्यवस्था समझायी है। स्वस्थ शरीर और चमत्कारी क्षमताओं से सम्पन्न मन भी अगर लक्ष्य भूल जाये तो ईश्वरीय योग के स्थान पर बौद्धिक सिद्धियों के जाल- जंजाल में उलझ कर रह जाता है। गीता  में ऐसे साधकों को योगभ्रष्ट कहा है। यदि 'उच्च लक्ष्य से दृष्टि हटे तो अपनी ही प्रवृत्तियाँ कुयोग में फँसने लगती हैं।

इसीलिए योग साधक को तीन माध्यमों को बराबर अपनाये रखना पड़ता है। वे हैं- १.श्रद्धा, २.चरित्र और ३.कार्य का ऊँचा उद्देश्य।

श्रद्धा :: गीताकार ने कहा है कि जिसकी श्रद्धा जैसी होती है वह वास्तव में वैसा ही होता है। श्रद्धा के तीन विभाग तामसिक, राजसिक और सात्विक भी कहे गये हैं। योग साधक की श्रद्धा सात्विक होनी चाहिए। ईश्वर की अनुभूति ही श्रद्धा का लक्ष्य होना चाहिए। उपासना की सार्थकता इसी से होती है।

चरित्र :: समान चरित्र वालों में सहज अपनत्व स्थापित हो जाता है। परमात्मा के साथ अपनत्व बनाये रखना है तो साधक को अपने चरित्र को उसके अनुरूप ही ढालना पड़ता है। ईश्वरानुभूति में ईश्वरीय गुणों का बोध होने पर साधक को अपने अंदर भी वैसे ही गुणों का विकास करने की उमंग उठती है। जीवन साधना का सशक्त आधार इसी उमंग के नाते बनता है। जीवन में सिद्धियों- शक्तियों का उदय इसी आधार पर होता है।

कर्म का उच्च उद्देश्य :: श्रद्धा आधारित उपासना से दिव्य अनुदान प्राप्त होते हैं। चरित्र साधना से जीवन की तमाम शक्तियाँ विकसित होती हैं। इनका उपयोग भी योगयुक्तभाव से किया जाना चाहिए। जीवन में जो भी विभूतियाँ मिलें, शक्तियाँ जागें, उन सभी को ईश्वरीय प्रयोजनों, उच्च उद्देश्यों के लिए ही लगाना होता है। ऐसा न हो तो प्राप्त अनुदानों और जाग्रत् शक्तियों के दुरुपयोग से उपजे दुष्परिणाम ही भोगने पड़ते हैं।

परमात्मा स्वयं उच्च आदर्शों, श्रेष्ठताओं का समुच्चय है। हम उसे किसी भी नाम या रूप से याद करें, किन्तु उसकी अनुभूति तो दिव्य संवेदनाओं के रूप में ही होती है। युगऋषि ने स्पष्ट लिखा है-

व्यक्ति या प्रकाश रूप में परमात्मा की धारणा ध्यान के लिए की जा सकती है। यह एक सामयिक प्रयोजन भर है। वस्तुत: परमात्मा की अनुभूति अंत:करण से एक दिव्य संवेदना के रूप में प्रकट होती है। वैयक्तिक उत्कृष्टता एवं सामाजिक उदारता के रूप में ही उसकी व्याख्या की जा सकती है।

इस उक्ति में भी उक्त तीन माध्यमों की आवश्यकता स्पष्ट होती है। अनुभूति संवेदना (श्रद्धा) से तथा अभिव्यक्ति आत्मिक उत्कृष्टता (चरित्र) से तथा सामाजिक उदारता (उच्च उद्देश्ययुक्त कर्म) से ही जुड़ी है।

कुयोग से बचें, सुयोग साधें

युगऋषि ने जगह- जगह यह तथ्य स्पष्ट किया है कि सदुपयोग से विष भी औषधि की तरह काम करता है तथा दुरुपयोग से अमृत जैसे तत्त्व भी विषैला प्रभाव छोड़ते हैं। प्रत्यक्ष में धतूरे, संखिया जैसे विषों के औषधीय गुण तथा बदपरहेजी से घी- दूध जैसे अमृतोपम पदार्थों के विष जैसे प्रभाव सहजता से देखे जाते हैं। जीवन के अन्य क्षेत्रों  में भी ऐसे ही प्रमाण मिलते रहते हैं।

प्रेम का उद्देश्य जब ऊँचा होता है तो वही श्रद्धा- भक्ति बनकर साधक को परमात्मा से मिला देता है। वही जब हीन उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त होता है तो 'मोह बनकर दुर्गति का कारण बनता है।

पुरुषार्थ जब उच्च उद्देश्यों के लिए किया जाता है तो सेवा- सहयोग बनकर व्यक्ति को देवोपम बना देता है। वही जब हीन उद्देश्यों से जुड़ता है तो अत्याचार- अनाचार जैसी राक्षसी प्रवृत्तियों को जन्म देता है।

धन- साधन जब ऊँचे उद्देश्य के लिए प्रयुक्त होते हैं तो 'यजन (यज्ञ- परमार्थ) बन जाते हैं। वही जब हीन उद्देश्यों में लगते हैं तो 'व्यसन बनकर अनर्थकारी सिद्ध होते हैं।

विद्या- बुद्धि जब श्रेष्ठ प्रयोजनों में लगती है तो अगणित व्यक्तियों को जीवन की दिशा- प्रेरणा देकर जीवन को धन्य बना देती है। वही जब हीन उद्देश्यों के लिए काम करती है तो ठगी, भ्रष्टाचार, वर्ग संघर्ष आदि का कारण बन जाती है। बुद्धि के दुरुपयोग के मार्मिक उदाहरण युगऋषि ने दिये हैं।

भारत- पाकिस्तान के बँटवारे का कोई कारण या आधार नहीं था। चंद लोगों का बुद्धिबल ही था, जिन्होंने तिल का ताड़ खड़ा करके भारतभूमि के खण्ड- खण्ड करा दिये और  लाखों मनुष्यों को प्राण गँवाने, अपार सम्पदा नष्ट होने और कल तक के सगे भाइयों जैसे लोगों को जानी दुश्मन बना देने की भूमिका निभाई। उनकी विद्या बुद्धि का अभिशाप अभी न जाने कितने लोगों को किस- किस रूप में कितने दिन तक भुगतना पड़ेगा?

सम्प्रदायों का जाल विद्वानों का ही रचा हुआ है। प्राचीन काल में भारत में एक वेद धर्म था, एक हिन्दू जाति। एक उपास्य गायत्री, एक दर्शन, एक समाज। किन्तु तथाकथित विद्वानों के मस्तिष्क में कीड़े कुलबुलाए और वे सम्प्रदायों की पूँछ से सम्प्रदाय निकालते चले गये। उन्हें पंथ संचालक का श्रेय तो मिला, पर जो अनेकता और  बुद्धिभ्रम का भेदभाव फैला उसके कारण विभाजित हिन्दू जाति दिन- दिन दुर्बल होती गई और उसे उस दुर्बलता से जुड़े हुए अगणित कष्ट सहने पड़े।

रूढिय़ाँ और कुरीतियाँ सनातन नहीं हैं, उनका आरम्भ और प्रचलन यकायक नहीं हो गया। उन्हें प्रचलित और विस्तृत करने में अवश्य ही किन्हीं लोगों के दिमाग कार्य करते रहे होंगे, अन्यथा बेसिर- पैर की बातें इतने गहरे पाँव न जमा पातीं। बहुत जगह उनके समर्थन में धर्मग्रंथों में मेल- मिलाप भी ठूँसे गये हैं। यदि वे विद्वान इस अवाञ्छनीय ठूँस- ठूँस की अपेक्षा तात्कालिक विकृतियों के विरोध में कुछ नवीन लिखते तो कम से कम उनकी सदाशयता तो प्रकट होती, पर विकृतियों के अभिवर्धन के  लिए किया गया छल- छिद्र तो और भी अधिक निन्दनीय कहा जायेगा।

धर्म के नाम पर प्रचलित इतिहास पुराणों में देवी- देवताओं को, महामानवों को भ्रष्ट, चरित्र व दुर्बलताओं के साथ चित्रित किया गया है, जिससे किसी विवेकवान की श्रद्धा सहज ही डगमगाने लगती है। जहाँ धर्म- अध्यात्म दर्शन नीति और सदाचार का उच्च स्तरीय समावेश करने वाले तत्त्वदर्शी ऋषि ने हमारे लिए बहुमूल्य ज्ञानसम्पदाछोड़ी है, वहाँ इस प्रकार के बुद्धिभ्रम उत्पन्न करने वाले ब्रह्मराक्षसों की भी कमी नहीं रही। विद्या और बुद्धि का रावण ने कहाँ सदुपयोग किया? उनके पास जितना ज्ञान और बल था, यदि उसने उसका उपयोग लोकमंगल के लिए किया होता तो निश्चित ही राम से कम नहीं, कुछ अधिक ही श्रद्धास्पद होता।

सामन्तवादी युग में यह विद्या पैसे से खरीदी जाती रही। उनकी विलासी दुष्प्रवृत्तियों के पोषण में कविता, साहित्य, गीत, नाटक आदि बड़ी मात्रा में सृजे जाते रहे। मंदिरों में  पायी जाने वाली मूर्तिकला तक में पशुप्रवृत्तियों की भरमार मौजूद है, वैसे ही चित्र चित्रित किये जाते रहे। यह सब विद्या का दुरुपयोग है। हमारे क्रमिक अध:पतन में यही दुष्प्रवृत्तियाँ प्रधान रूप से कारण बनती चली आयी हैं। आतताइयों और आक्रमणकारियों ने भी क्षति पहुँचाई पर इस बौद्धिक क्षति ने तो समाज का मेरुदण्ड ही तोड़कर रख दिया।

आज जबकि घायल समाज को राहत देने वाले साहित्य की जरूरत थी, उद्बोधन आवश्यक थे, तब भी वह ढर्रा बदला नहीं है, वरन् स्वतंत्रता मिलने के बाद विनाश की स्वतंत्रता का भरपूर उपयोग किया जा रहा है। धर्ममंच से जो प्रवचन किये जाते हैं, उनमें गड़े मुर्दे उखाडऩे के अतिरिक्त जीवन संचार और प्रगति के लिए उद्बोधन की दिशा  दे सकने वाले तथ्य कहीं ढूँढ़े नहीं मिलते। सुनने मात्र से मुक्ति का अज्ञान और गहरा होता चला जा रहा है। अन्य मंचों में भी उथली ओर सामयिक समस्याओं की ही उखाड़- पछाड़ रहती है। व्यक्ति और समाज के युग निर्माण के आधारभूत सिद्धान्तों की कहीं चर्चा तक सुनाई नहीं देती। विद्या से सजी वाणी द्वारा लोकमानस को जो उद्बोधन मिलना चाहिए था, वह एक प्रकार से मौन ही हो गया है। साहित्य की दशा और भी दयनीय है। पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाला साहित्य लिखा जा रहा है, छप रहा है, बिक रहा है। उसी की बाढ़ आई हुई है। लगता है इस बाढ़ में जो कुछ श्रेयस्कर कहीं जीवित रहा होगा, वह भी बहकर मर- खप जायेगा।

उक्त सब विसंगतियों का समाधान यही है कि विभूतिवान व्यक्ति अपनी विभूतियों का उपयोग योग बुद्धि से ऊँचे उद्देश्यों के लिए करें। इस संदर्भ में गायत्री साधकों की जिम्मेदारी कुछ विशेष बन जाती है।

गायत्री योग की समर्थता

गायत्री विद्या अपने आप में एक समग्र योग है। गायत्री मंत्र में उसके शब्दों के उच्चारण से भी साधक की सूक्ष्म उपत्यिकाओं में स्फुरणा होती है तथा साधक की प्राणशक्ति हीन उद्देश्यों से विरत होकर उच्च उद्देश्यों की ओर उन्मुख होने लगती है। दूसरा पक्ष मंत्र के विभिन्न पदों की प्रेरणाओं के रूप में साधक को योगोन्मुख बनाता है।

१. गायत्री का शीर्ष ::  भूर्भुव: स्व। यह परमात्मा की सही सार्वभौम अवधारणा देता है। परमात्मा का प्रतीक ओंकार की ध्वनि के रूप में दिया है जो नाम- रूप के द्वंद्व से परे, पुल्लिंग, स्त्रीलिंग के भेद से परे परमात्म चेतना का सहज बोध कराता है। वह सर्वव्यापी है तथा प्राणरूप, दु:खनाशक, सुख स्वरूप है। ईश्वर के प्रति ऐसी अवधारणा बनते ही ईश्वर के नाम पर उभरने वाली तमाम विसंगतियों का समाधान सहज ही हो सकता है।

२. तत्सवितुर्वेरेण्यं :: यह चरण श्रद्धा को सात्विक रूप देता है। वह सविता- रूप है। उसी से सब उत्पन्न हुए हैं, इसलिए वह सबको पैदा करने वाला सविता है। चूँकि उसी से सब पैदा हुए हैं, इसलिए वही सबसे अधिक वरेण्य, वरण करने योग्य- अपनाने योग्य- आत्मीय है। उसके प्रति श्रद्धा पुष्ट होते ही सांसारिक प्रलोभनों- भटकावों का रास्ता बंद हो जाता है। आत्मीय भाव से साधक परम भाव में डूबा रहता है।

३. भर्गो देवस्य धीमहि :: यह चरण उस सविता देव के भर्ग- दिव्य तेज को अपने अंत:करण में धारण करने की प्रेरणा देता है। इष्ट के दिव्य तेज को धारण करने से व्यक्ति  का चरित्र स्वयं उज्ज्वल होने लगता है। देवत्व को धारण करने से देवोपम हो जाता है। फिर योग के लिए किया जाने वाला साधना पुरुषार्थ सहज होने लगता है।

४. धियो यो न: प्रचोदयात् :: यह चरण साधक के कर्म को उच्च उद्देश्यपूर्ण बना देता है। जब अपना इष्ट, प्रिय परमात्मा ही हमारी बुद्धि की चेतना को प्रेरित करेगा तो उसकी दिशा हमेशा उच्च आदर्शों वाली ही होगी। हीन कर्म उससे हो ही नहीं सकते।

इस प्रकार कोई भी योग- साधक योग की किसी भी साधना का अभ्यास करना चाहे तो गायत्री योग उसके लिए शुद्ध- सबल आधार की रचना करने में समर्थ होता है। यही कारण है कि तत्त्वज्ञ ऋषियों ने उपासना, योग साधना की किसी भी धारा के साधन के लिए 'गायत्री योग की साधना उपयोगी और आवश्यक बतायी है।

गायत्री परिवार से जुड़े, युगऋषि का मार्गदर्शन पाने वाले सभी साधक भाग्यशाली हैं कि उन्हें एक दुर्लभ सुयोग सहज ही प्राप्त हो गया है। आवश्यकता है इस सुयोग को भली प्रकार समझ कर अपनाने की। उसे अपनाने के सत्परिणाम सुनिश्चित हैं। हम सबको इस सुयोग का भरपूर लाभ स्वयं भी उठाना चाहिए तथा अपने प्रभाव क्षेत्र के व्यक्तियों को भी देना चाहिए।








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c.p.shukla
2015-06-10 14:49:07
प्रेरणादायक अॊर अपनाने योग्य है
shantanu kumar patra
2015-06-10 12:57:56
YOGA IS THE BEST OF OUR BODY, MIND & SOIL.
Dr.SUBHASH VERMA
2015-05-31 21:50:50
EXCELLENT !
सुनील कुमार
2015-05-22 23:04:08
प्रेरणादायक अॊर अपनाने योग्य है यह गायत्री योग।व्यक्ति को अपनी पूर्ण उन्नति के लिए इसका अभ्यास अवश्य करना चाहिए ।
kiran
2015-05-21 23:00:28
Inspired


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