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नवरात्र साधना का तत्त्वदर्शन भी समझें-अपनायें, लाभ उठायें


शक्ति साधना करें-समर्थ बनें

भारत देश अपनी शक्ति साधना के प्रभाव से ही चक्रवर्ती और विश्वगुरु जैसे गौरवपूर्ण सम्मान पाता रहा है। ऋषियों ने उपासना, साधना, अनुष्ठान आदि विधि- विधान, जीवन को समर्थ- सशक्त बनाने के उद्देश्य से बनाये थे। परमात्मा को, देवशक्तियों को, समर्थता- सशक्तता का आदर्श मानकर उनकी उपासना से अपने अंदर भी समर्थता विकसित करने के लिए विवेकपूर्वक साधना- अनुष्ठान किए जाने की परिपाटी बनायी गयी थी। उस परिपाटी का अनुसरण करते हुए लम्बे समय तक राष्ट्र समर्थ और सशक्त बना रहा। कालचक्र की विसंगति कहें या दुर्मतिजनित दुर्भाग्य; उपासना- साधना का दर्शन विकृत हो गया। समर्थ सत्ता के सम्बन्धी, अनुयायी के नाते उनसे समर्थ बनने में सहयोग माँगने की जगह स्वयं को असमर्थ मानकर भीख माँगने की हीन परम्परा चल पड़ी। शिष्य या भक्त की विनम्रता के स्थान पर भिखारी जैसी दीनता स्वभाव में आने लगी। शक्ति के साधक, दीन- याचक रह गये। इस उल्टी मान्यता को उलटकर फिर से शक्ति साधना का क्रम अपनाना होगा।

साधना मार्ग में शक्ति सम्पन्न होने की कसौटी लौकिक मान्यता से भिन्न है। लौकिक मान्यता के अनुसार शक्तिशाली व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों को परास्त करने, सुख- साधनों पर अधिकार जमाने लगता है। साधना- पथ में शक्ति- साधक अपनी अन्दर की हीन प्रवृत्तियों को परास्त करके उन्हें दबोच कर जीवन में महानता विकसित कर लेता है। ईश्वर ने यह संसार जड़- चेतन तथा गुण-देाष के मिश्रण से बनाया है। अन्तःचेतना अविकसित अवस्था में जड़ प्रकृति के प्रभाव में रह जाती है, तब दोष बढ़ने लगते हैं, पतन होने लगता है। इसके विपरीत जब अन्तःचेतना- आत्मसत्ता विकसित होकर जड़ सम्पदा को अपने नियंत्रण में, अुनशासन में ले लेती है, तब गुणों के विकास से महानता का विकास होने लगता है। अध्यात्म साधना को आत्मविज्ञान- साइंस ऑफ सोल कहा गया है। युगऋषि ने स्पष्ट लिखा है-

‘‘मित्रो! मैं आप से कह रहा था कि आप एक सिद्धान्त यहाँ से नोट कर लें-अध्यात्म का अर्थ होता है अपने आपको सही करना ‘साइंस ऑफ सोल’। यह आत्मा को चेताने का विज्ञान है।

नवरात्र साधना में अध्यात्म के यही मूलभूत सिद्धान्त मैंने आपको समझाने का प्रयास किया है। आप समर्थ बनिये, अपने पैरों पर खड़ा होना सीखिए। अपने चिन्तन और व्यवहार को सही ढंग से रखना सीखिए। अपने आपको दबोचना सीखिए।’’

अपने आपको दबोचने से युगऋषि का तात्पर्य है अपनी वृत्तियों को नियंत्रण में रखना, उन्हें संयमित, अनुशासित रखने का माद्दा पैदा करना। शक्ति की उपयोगिता संयम से ही बढ़ती है। पानी से बनने वाली भाप से बड़े- बड़े इंजनों, फैक्ट्रियों आदि को चलाया जाता है, लेकिन यह तभी संभव होता है जब उसे बिखरने से रोककर किसी कार्य में नियोजित किया जाय। बॉयलर में थोड़े से पानी से बनी नियंत्रित ‘भाप’ कमाल दिखा देती है, जबकि विशाल समुद्र से उठने वाली भाप का उपयोग नहीं हो पाता। छोटे से जैनरेटर की नियंत्रित बिजली ढेर सारे काम कर देती है, किन्तु आकाश की विराट बिजली चमक दिखाकर गायब हो जाती है। हमें शक्ति साधना को समझ कर सही ढंग से अपनाना ही होगा।

नवरात्र साधना का पर्व सामने है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा दिनांक ८अप्रैल कीे और रामनवमी १५ अप्रैल को है। एक तिथि (तृतीया) की हानि होने से नवमी आठवे दिन ही पड़ रही है। युगऋषि ने स्पष्ट किया है कि तिथियाँ चाहे घटें या बढ़ें, नवरात्र साधना-दिन में ही पूरी की जायेगी।

संकल्प करें, ठान लें

नवरात्र पर्व पर हमें शक्ति साधना करनी है। स्वयं को समर्थ बनाने की अपनी क्षमता को बढ़ाना ही है। यह ठान लेना, संकल्पपूर्वक उसमें लग जाना ही ‘अनुष्ठान’ का मूल उद्देश्य है। जप और तप के सभी क्रम इसी उद्देश्य से किए जाते हैं।

जप-तप- युगऋषि ने ‘साधना में प्राण आ जाये तो कमाल हो जाये’ नामक पुस्तिका में स्पष्ट लिख है कि साधना के मूल्यांकन के लिए भगवान के यहाँ संख्या का कोई हिसाब नहीं रखा जाता। जप संख्या के माध्यम से अपने भावों- विचारों को प्रभु के प्रभाव में, ध्यान में डुबोये रखना ही मूल उद्देश्य है। जप संख्या के माध्यम से या समय निर्धारित करके उतने समय मंत्रजप या लेखन के माध्यम से प्रभु के सान्निध्य का बोध हो, तो बात बन जाती है।

इसी प्रकार तप साधना से अपने अभ्यास को दुरुस्त किया जाता है। उसके लिए समुचित नियम बनाये जाते हैं। भगवान की दी हुई सम्पदाओं- शक्तियों को संयमित रखकर सदुद्देश्य में नियोजित करने की ठान ली जाये तो अनुष्ठान का उद्देश्य भली प्रकार सध जाता है। उन्हें अपने संकल्प के अनुशासन में चलाने की संयम साधना की जाती है।

समय संयम -समय जीवन की मूल सम्पदा है। अनुष्ठान काल में यह ठान लें कि हमें अपने समय का बेहतर उपयोग करने की क्षमता विकसित कर ही लेनी है। चौबीस घंटे की दिनचर्या को पहले से अधिक अनुशासित बनाने का संकल्प करें। जागने, सोने, जप, स्वाध्याय, सेवा आदि के लिए समय निर्धारित कर लें। अपनी स्थिति देखें और उसके अनुसार प्रगति के अगले चरण निश्चित करें। संकल्पित साधना से उतने ही समय में कार्य की मात्रा और कार्य का स्तर पहले से बेहतर बना लेने की क्षमता बढ़ती है। अनुष्ठान काल की दिनचर्या समय पर बेहतर पकड़ बनाने के उद्देश्य से बनायें। अपनी अस्त- व्यस्तता को समय संयम से दबोचें।

आहार संयम -आहार की अनगढ़ आदतें स्वास्थ्य को भी चौपट करती हैं और मन को भी असंयमित बनाती हैं। युगऋषि ने स्पष्ट लिखा है कि आपने क्या खाया, क्या नहीं खाया? इसका हिसाब भगवान के यहाँ नहीं रखा जाता। वहाँ तो यह परखा जाता है कि साधक ने अपनी इंद्रियों और मन को पहले की अपेक्षा कितना साध लिया। उपवास के माध्यम से अपने अंदर दो तरह की क्षमताओं के विकास को ध्यान में रखा जाता है-

एक-आहार केवल स्थूल शरीर को पोषण देता है, ऊर्जा के स्रोत उससे भिन्न भी है। इसीलिए संयमी स्वल्पाहारी भी अधिक आहार करने वालों की अपेक्षा अधिक स्फूर्तिवान और सक्षम दिखते हैं। साधना के दौरान साधक का सम्पर्क ऊर्जा के सूक्ष्म स्रोतों से बनता है। इसलिए सीमित आहार के बाद भी स्फूर्ति बढ़ती रहती है। इस तथ्य का बोध साधक को होना चाहिए।

दो- अन्न के संस्कार भाग से मन बनता है। उपवास के क्रम में साधक आहार में पदार्थ के स्थान पर उसके संस्कारों को महत्त्व देना सीखता है। सात्विक आहार जो भी लिया, प्रभु के प्रसाद के रूप में लिया। उसमें प्रभु प्रेरित श्रेष्ठ संस्कारों की प्रचुरता को अनुभव करते हुए मन अस्वाद आहार को पाकर भी प्रसन्न, उल्लसित रह सकता है।

उपवास के माध्यम से अपनी इन्द्रियों और मन को अधिक संयमित परिष्कृत बनाने का लक्ष्य निर्धारित करके आहार संयम को सार्थक बनाया जा सकता है।

विचार संयम- ध्यान साधना तथा स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के माध्यम से अपने विचारों को अनुशासित और सन्मार्गगामी बनाने का संकल्प भी अनुष्ठान में शामिल किया जाना चाहिए।

निराकार ध्यान में परमात्मा को सूर्य के प्रकाश की तरह सर्वत्र अनुभव करते हुए उसे धारण करने का भाव किया जाता है। वह सर्वव्यापी न्यायकारी उच्च आदर्शों का समुच्चय है। उसके सम्पर्क से आपके अंदर नैतिकता, उच्च आदर्शवादिता पनपने का भाव रखा जाता है।

साकार ध्यान में -युवा अवस्था की गायत्री के प्रति मातृत्व के पवित्र भावों का अभ्यास होता है। यह मातृसत्ता सर्वत्र शाक्तिरूप में विद्यमान है। प्रत्येक नारी में उसी की सत्ता विराजमान है। यह भाव बनते ही मानसिक ब्रह्मचर्य सध जाता है। महारथी अर्जुन और छत्रपति शिवाजी को इसी भावना ने अजेय बना दिया था। गायत्री मंत्र का जप हो या गायत्री चालीसा का पाठ, यदि उसके साथ उक्त भाव और चिन्तन पनप रहे हैं, तो अनुष्ठान का परिपूर्ण लाभ मिलना सुनिश्चित है। सत्साहित्य का स्वाध्याय मनन- चिन्तन भी विचारों और भावों को पवित्र- प्रखर बनाने के निमित्त किया जाता है।

यज्ञ, सम्पदा का सुनियोजन-अनुष्ठान के क्रम में युगऋषि ने इसे बहुत महत्त्व दिया है- वे लिखते हैं।

‘‘किस आदमी ने कैसे कमाया, यह मैं हिसाब नहीं रखता। मैं तो आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करता हूँ कि किस आदमी ने कैसे खर्च किया? जो पाया या कमाया है, वह कहाँ खर्च हुआ? मुझे खर्च का ब्यौरा दीजिये- बस। अगर आप खर्च में अपव्यय करते हैं, गलत कामों में खर्च करते हैं, तो मैं आध्यात्मिक दृष्टि से आपको ‘बेईमान’ कहूँगा। आप कहेंगे यह हमारी कमाई है। हाँ, कमाई आपकी है लेकिन उसे आपखर्च कैसे करते हैं, यह बताइये। आपका धन, आपकी अकल, आपके साधन, श्रम आदि किन कामों में खर्च होते हैं? इसका ब्यौरा दीजिए, इसकी फाइल पेश कीजिए हमारे सामने। अपने बेटे को खैरात में बाँट दिया, मौज- मस्ती में उड़ा दिया, तो हम आपको आध्यात्मवादी कैसे कहें? खर्च के बारे में भगवान का बड़ा सख्त नियम है। खर्च पर अध्यात्म का अंकुश लगाने के लिए यज्ञ का अभ्यास कराते हैं।

आप यज्ञ-अग्निहोत्र को एक कर्मकाण्ड मान बैठे हैं। अग्निहोत्र यज्ञ विज्ञान का नाम है। यह एक परम्परा ही नहीं, इसका वैज्ञानिक आधार भी है। यज्ञ कहते हैं कुर्बानी को, सेवा को। भूदान यज्ञ, नेत्रदान यज्ञ, सफाई यज्ञ, ज्ञान यज्ञ आदि हजारों तरह के यज्ञ हैं। इन सबका एक ही अर्थ होता है- लोकहितार्थ आहुतियाँ देना। यज्ञ कीजिए, पूर्णार्हुति दीजिए, लेकिन जनकल्याण को जीवन में स्थान दीजिए। संस्कृति की रक्षा के लिए, देश और मानवीय आदर्शों को जीवन्त रखने के लिए अपने पसीने की आहुति दीजिए, अपने ज्ञान की आहुति दीजिए।

अगर आप फिजूलखर्ची, विलासिता की कुर्बानी देने की हिम्मत दिखा सकें, तो यज्ञ सफल है। तब आप असली अध्यात्मवादी होंगे। उस दिन आप देखेंगे भगवान का असली रूप। तब आपको सुदामा की तरह से आपके चरण धोता हुआ, शबरी की तरह जूठे बेर खाता हुआ, राजा बलि की तरह आपके दरवाजे पर साढ़े तीन कदम जमीन माँगता हुआ, गोपियों से छाछ माँगता हुआ भगवान दिखाई देगा।’’

गुरुदेव चाहते हैं कि हम नवरात्रि अनुष्ठान के माध्यम से अपने अंदर अध्यात्म साधक के श्रेष्ठ गुण विकसित करें। इसी आधार पर गुरु के अनुदान भी मिलते हैं?

गुरु के अनुदानों की शर्त

युगऋषि ने स्पष्ट किया है कि साधकों को समर्थ गुरु के अनुदान भी अवश्य मिलते हैं। लेकिन उनकी भी अपनी कुछ शर्त होती हैं, वे कहते हैं-

‘‘हाँ, हम सिद्ध पुुरुष हैं। हम वरदान और आशीर्वाद भी देते हैं। पर हम देते उन्हीं को हैं, जो पहले अपने आपको ठीक करने के लिए कदम बढ़ाते हैं। चमत्कार तो सिर दर्द के लिए एस्प्रीन की दवा की तरह है। आप ठीक हो जाते हैं? नहीं आप तब तक ठीक नहीं हो सकते, जब तक अपना पेट ठीक नहीं करेंगे। टाइमली रिलीफ (सामयिक आराम) हम देते हैं, लेकिन ठीक होने की ताकत तो अन्दर से ही उभारनी पड़ेगी। बाहर का खून (प्राण) हम इसलिए आपको देते हैं, ताकि आपका अपना सिस्टम काम करना आरंभ करते दे। वरदान, चमत्कार किसी को परावलम्बी बनाने के लिए नहीं, उसे सहारा देने के लिए होते हैं, ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।’’

गुरुदेव हमें शक्ति साधना से समर्थ बनाना चाहते हैं। इसके लिए अपने अनुदान- वरदान भी प्रसन्नतापूर्वक देना चाहते हैं। नवरात्र अनुष्ठान के क्रम में हमें पहले से बेहतर अध्यात्म साधक बनने का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। व्यक्तिगत एवं सामूहिक अनुष्ठानों का ऐसा क्रम बनायें, जिससे अधिक से अधिक नर- नारी नवरात्रि की शक्ति साधना को समझ सकें, अपना सकें और भरपूर लाभ उठा सकें। शक्ति साधना की ऐसी लहर पैदा करें, ताकि नवयुग अवतरण का सशक्त आधार बन जाये।






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Leeladhar Prasad Sahu
2016-05-05 15:40:29
Jay Gurdev
Radhakant
2016-04-13 16:20:41
jai Gurudev ke charno me ham smarpit hi
shriram yadav
2016-04-08 21:58:32
good
radhe yadav
2016-04-08 10:11:28
param pujya guru dev ne hamare jeevan jeene ke mahtwapurn tathya diye hai hum sub guru dev ke aabhari hai
अखिलेश सोनी
2016-04-07 16:15:11
सौभाग्यशाली हैं हम सभी कि परम पूज्य गुरुदेव और वन्दनीय माताजी के शिष्य हैं, अब बारी हमारी है कि परम पूज्य गुरुदेव कि कसौटी पर खरा उतरें.
हर्ष कुमार मिश्र
2016-04-07 15:59:23
युगद्रष्टा युगऋषि गुरुदेव के पावन सन्देश " नवरात्रि अनुष्ठान के तत्व दर्शन को समझें, अपनाएं और लाभ उठाएं" में साधना के हर बिंदु को गहराई से बताया गया है जिसे अंगीकार कर हर साधक अपने जीवन को हर दृष्टिकोण से सार्थक, समर्थ और महत्वपूर्ण बना सकता है.
Arun Kumar Yadav
2016-04-07 12:39:19
es massage ko jun jun tak pahuchye ta ki logo ke andar shakti ka vikas ho aur jeevan ko age le jaye Thanking you with regardsArun YadavLucknow 8960350729
Arun Kumar Yadav
2016-04-07 12:29:31
es massage ko jun jun tak pahuchye ta ki logo ke andar shakti ka vikas ho aur jeevan ko age le jaye Thanking you with regardsArun YadavLucknow 8960350729
NARESH CHANDRA SHARMA
2016-04-04 16:32:29
GURUVAR HUM TRY KARNGE KI CHETRA NAVRATRA SE AAPKE BATYE MARG DARSAN PER CHALE. JAI GURU DEV JAI VANDINAYA MATA JI~~~
NARESH CHANDRA SHARMA
2016-04-04 15:47:59
JAI GURU DEV - AAPKE MAGDARSHAN SE HUM JAISE MAND BHUDHI LOGO KO KUCH KARNE KA PROTSHAN MILE. SADA AAPKI SHARAD MAIN RAHE AISA ASHIRWAD HUM PER BANEYE RAKHE. JAI GURDU JAI VANDNIYA MATA JI ~~~ Main abke chetra NAVRATI PER AAPKE BATAYE HUE MARG PER CHALNE KAY PRIAYS KARUNJGA..
kishan choudhary
2016-04-04 11:32:06
Achha laga
Aditya kasyap
2016-04-03 17:02:55
Bahut Bahut Dhnyawaad