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साधो सहज समाधि भली

रुढिय़ों में बँधी नहीं है साधना

रूढ़ अर्थों में साधना एक धार्मिक या आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसकी विभिन्न धर्म- संप्रदायों में अलग- अलग मान्यतायें हैं। हिन्दू धर्म में यम, नियम, आसन और प्राणायाम को बहिरंग तथा प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को अन्तरंग साधना- सोपान के रूप में स्वीकार किया गया है। बौद्ध धर्म में स्वपीडऩ और परपीडऩ विरहित तप को श्रेष्ठ माना गया है।

परन्तु साधना केवल धार्मिक कर्मकाण्ड सापेक्ष क्रिया मात्र नहीं है। उसको यह रूप देकर धर्माचार्यों ने मानव- मात्र को एक संकुचित दायरे में बंद कर दिया है। गृहत्यागी, विरक्त और संन्यासी महाप्राण मनीषियों के आचार आदर्श का मान बिन्दु ही स्थापित कर सकते हैं, परन्तु लोकधर्म का रूप नहीं ले सकते।

साधना या तप कोई जड़ प्रक्रिया नहीं है, जिसको नियमोपनियम के शिकंजे में कस दिया जाय। यह एक गत्यात्मक प्रक्रिया है, जिसका अनुगमन बदलती हुई परिस्थितियों के साथ व्यावहारिक धरातल पर होना आवश्यक है।

आज धर्म के नाम पर नई पीढ़ी नाक- भौं सिकोड़ती है, उसका दोष किस पर है? जो धर्म लौकिक जीवन के बदलते आयामों के साथ अपने को गत्यात्मक नहीं बनाये रख सकता, उसका स्थान शास्त्रों में सुरक्षित रहने योग्य है। बुद्धि- विलक्षण लोगों के तर्क- वितर्क का विषय बनने योग्य है, पर जनपथ पर उसका रथ अग्रसर नहीं हो सकता।

साधना प्रभावशाली हो

साधना वेष में नहीं है। साधना क्रिया- कांडों में भी नहीं है। साधना दिखाने के लिये नहीं की जाती। साधना परंपराओं को चलाने के लिए भी नहीं की जाती। साधना वह होती है, जो वातावरण को आनन्द और प्रेममय बना देती है। साधना वह होती है, जहाँ ईमानदारी और प्रामाणिकता मूर्त बन जाती है। ऐसी साधना आंतरिक पवित्रता, विशुद्ध प्रेम भावना, स्वार्थ- त्याग आदि सद्गुणों के पोषण और विकास से होगी। जिस दिन इस सहज प्रक्रिया से सहज जीवन विकसित होगा, उस दिन संसार का दूसरा रूप ही होगा।

जीवन अनेकमुखी होता है और विकास के रास्ते भी अनगिनत हैं। मनुष्य सबको तो आत्मसात् कर नहीं पाता। अत: वह कोई एक मार्ग पकड़ता है और उसी के द्वारा अपने जीवन को उन्नत बनाना चाहता है। कोई भक्ति का मार्ग चुनता है, कोई कर्ममार्ग की ओर अग्रसर होता है और कोई ज्ञानयोग की तरफ उन्मुख होता है।

विश्व में अनेक धर्मग्रन्थ हैं और उनके अपने- अपने सिद्धान्त तथा तौर- तरीके हैं और वे सब इसलिए हैं कि उनके द्वारा स्वयं व्यक्ति का, समाज का और अन्तत: विश्व का कल्याण हो, दु:ख मिटे। सदियों से सबकी अपनी- अपनी परम्पराएँ चली आ रही हैं। श्रद्धा और आस्थापूर्वक लोग उन परंपराओं पर चलते आ रहे हैं, उनको जीवन में उतारने का प्रयत्न कर रहे हैं।

जिन महापुरुषों ने जीवन और जगत की रीति को अंत: चक्षुओं से देखा, उन्होंने देश, काल, परिस्थितियों को ध्यान में रखकर युगानुरूप मार्ग निर्धारित किया और वही कालान्तर में धर्म बन गया। वही विशिष्ट साधना का पक्ष भी बन गया।

महात्मा कबीर का जीवन दर्शन

आज अपेक्षा है, उस साधना की, जिसका वर्णन संत कबीरदास के एक पद में किया गया है। साधो सहज समाधि भली  इस पद में कबीर ने नाम  समाधि का लिया है, पर वह एक सम्पूर्ण जीवन साधना का दर्शन है।

'साधना' शब्द अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता। हमने उसमें अपना अर्थ आरोपित कर दिया है, यह अलग बात है। अर्थ उसमें तब आता है जब कोई लक्ष्य, क्रिया प्रकट होती है। एक आध्यात्मिक सन्त की क्रिया भी साधना है और विज्ञान के क्षेत्र में अन्तरिक्ष यात्री की क्रियायें भी साधना है। एक माँ अपने बेटों के लिये, परिवार के लिए रसोई बनाती है, यह भी साधना है। इस साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता, लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके- चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है, तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है।

सब प्रकार की कलाओं की सिद्धि के लिए साधना करनी पड़ती है, अर्थात् एकाग्रतापूर्वक अभ्यास करना पड़ता है। परस्पर- व्यवहार को सभ्य या समाजमान्य बनाने के लिए बचपन से ही संस्कारों की साधना करनी पड़ती है। प्रेम, उदारता, सेवाभावना आदि गुणों के लिए भी निरन्तर साधना करनी पड़ती है। व्यापार- व्यवसाय में भी ऐसी सैकड़ों बातें हैं, जिनमें साधना की आवश्यकता होती है।

महात्मा कबीर ने अपने पद में यही बात कही है। उन्होंने जब देखा कि लोग अमुक क्रियाओं को ही साधना मानते हैं और उतना- सा करके समझते हैं कि वे साधक बन गये, तो उन्होंने मशाल हाथ में लेकर साधना- मार्ग प्रकाशित किया। लोगों की आँखें खोलने का प्रयास किया कि हमारी वे सारी क्रियायें धर्म- क्रियायें हैं।

साधनायें वे हैं जो हम सबेरे उठने से लेकर रात को सोने तक और निद्रा में भी करते हैं। उन्हें सिद्धि का रूप तभी प्राप्त होता है, जब वह साधना सहज हो जाती है। कबीर कहते हैं- मेरा चलना ही प्रभु की परिक्रमा है, मेरा कुछ भी करना सेवा ही है, मेरा सोना ही दण्डवत् है, जो कुछ बोलता हूँ वही जय है और खुली आँखों से जो कुछ देखता हूँ वही प्रभु का सुन्दर रूप है।

इससे एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि हमें अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों से कभी विमुख नहीं होना चाहिये और नित्य जीवन की समस्त क्रियाओं में उसी विराट विभु की लीला का, विराट विश्व की सेवा का रस प्राप्त करना चाहिये।

भ्रम में न रहें, सहज साधक बनें

जीवन की साधना का सबसे बड़ा सम्बल हमारा कर्मरत और समाजगत आचरण है। समाज से छिटक कर विशेष परिवेश को धारण करने से हम अपनी काल्पनिक मुक्ति भले ही प्राप्त कर लें, पर इससे हमारा तथा समाज का कोई वास्तविक लाभ नहीं होगा। बारह वर्ष तक साधना करके कोई व्यक्ति पानी पर चलने का अभ्यास करके चमत्कारी कहला सकता है, पर उसकी सिद्धि का कुल मूल्य रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में केवल चार पैसा है, क्योंकि चार पैसे खर्च करके नौका में बैठकर कोई भी नदी पार कर सकता है। हमारी बहुत सारी साधनाओं के मूल में यही अल्पमोली बातें हैं जिनसे हमें मुक्त होना है, अपने को सहज साधक बनाना है।

आज आवश्यकता है उस साधना की जो हल की मूठ पकड़े किसान, मशीन का पहिया घुमाते श्रमिक, प्रयोगशाला में प्रयोगरत वैज्ञानिक, व्यापारी- व्यवसायी एवं कलम घिसते कर्मचारी की परस्पर भिन्न परिस्थितियों में अध्यात्म की दीपशिखा प्रज्वलित कर सके। आज साधना को ही नहीं, अध्यात्म तक को नई व्यवस्था के साथ उपस्थित होना है।

जब कोई कृषक लू- धूप की परवाह किये बिना हल चलाता है, तब वह साधना ही तो करता है। जरूरत तो बस इतनी है कि उसके कर्म को आत्म- केन्द्रित न होने देकर लोकमंगल के पवित्र भाव से सम्पुष्ट किया जाए, ताकि उसका वही कर्म 'स्व' के साथ 'पर' के लिए होकर उसमें भाव- शुद्धि की भावना भर दे और उसको आध्यात्मिक दीप्ति प्रदान कर दे।

पसीना चुचुआते शरीर से मशीन के साथ जूझते श्रमिक का कर्म किस साधना से कम है ? उसे साधना का पवित्र पद देने के लिए उसके साथ लोकहित का भाव जोड़ दिया जाए, तो वही उसके लिए आध्यात्मिक धर्म बन जाएगा। व्यापारी के धृति- साध्य कर्म को यदि अनुचित मुनाफा कमाने के दूषण से मुक्त कर दिया जाये तो वही 'स्व' में 'पर' की साधना का पुनीत कर्म बन जायेगा। तात्पर्य यह है कि साधना ऊपर से ओढ़ी जाने वाली, अपने और दूसरे को सम्बोधित करने वाली रामनामी चादर न बने तो उसकी सहजता जीवन में व्यवहार्य हो सकेगी। यही उसके लिये सच्ची साधना होगी।

वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रगति को झुठलाया नहीं जा सकता। उनके द्वारा प्रदत्त सुविधाओं को भी नहीं त्यागा जा सकता और उसके कारण परिवर्तित जीवन- मूल्यों को भी नकारा नहीं जा सकता। साथ ही उसके आनुषंगिक दोषों से भी पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। तो फिर जो अपरिहार्य है, उसके साथ जूझकर अपनी शक्ति व्यर्थ गँवाने से क्या लाभ ? साधना और आध्यात्मिक उन्नयन के हमारे प्रयासों का उपादान तो आज का दिशाहारा, अशांत, स्थापित जीवन- मूल्यों के प्रति अनास्थावान मानव है। हम उसी को समेटें, सहेजेें। उसे साधना और तप की नई दीक्षा दें, तभी तो कुछ काम बने, बाकी तो कोरी सिद्धान्त चर्चा ही होगी।

अखण्ड ज्योति, फरवरी- ७१ से संकलित, संपादित 

मेरा चलना ही प्रभु की परिक्रमा है, मेरा कुछ भी करना सेवा है, मेरा सोना ही दण्डवत् है, जो कुछ बोलता हूँ वही जय है और खुली आँखों से जो कुछ देखता हूँ वही प्रभु का सुन्दर रूप है। • महात्मा कबीर






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ocean
2016-07-05 10:25:57
Nice
VIPIN SORI
2016-06-24 18:00:08
SANKLAN - BAHUT SHANDAR HAI, SADHUVAD. JO VYAST HAI, PURANI SAHITYA NAHI PAD PATE, UNKE LIYE AAPNE SAMUDRA ME SE MOTI NIKALNE KA KAM KIYA HAI, GURUG ASHIRWAD DE.