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समग्र क्रान्ति-महाक्रान्ति को विश्वव्यापी-प्रचण्ड बनाने के लिए कमर कसें

[Shantikunj], Nov 24, 2017
प्रज्ञा परिजनों, प्रज्ञा पुत्रों एवं प्रज्ञा पुञ्जों को जाग्रत्-जीवन्त बनाना जरूरी है

आयोजन बनाम अभियान
युगऋषि के निर्देशन के अनुसार युग शिल्पियों-सैनिकों ने प्रज्ञा अभियान को विस्तार देने के लिए जनसम्पर्क एवं विभिन्न आयोजनों का क्रम प्रारम्भ किया। विपरीत परिस्थितियों में भी जन समर्थन जुटाने में, जन सहयोग इकट्ठा करने में सफलता मिलने लगी। आयोजनों का स्वरूप क्रमश: बढ़ने लगा और विराट स्तर तक पहुँच गया। किन्तु इस सराहनीय सफलता के अनुरूप अभियान ने गति नहीं पकड़ी। आयोजन की सफलता के लिए सद्बुद्धि की प्रार्थना एवं सत्कर्म के अभ्यास के क्रम में जुड़े साधकों का जोश आयोजन समाप्ति के साथ ही ठंडा होने लगा। व्यक्ति, परिवार एवं समाज में दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन का वह क्रम नहीं चल सका जो चिन्गारी से आग और आग से प्रचण्ड ज्वाला की तरह क्रान्तिकारी अभियान तक जा पहुँचे।

सृजन सैनिकों, सृजन साधकों को गहन आत्म समीक्षा करके इस कमी को दूर करने के संकल्पबद्ध प्रयास करने चाहिए। नवनिर्माण के लिए, समग्र विश्व के उज्ज्वल भविष्य के विकास के लिए ऋषितंत्र ने सूक्ष्म जगत में जो समर्थ व्यवस्था बना रखी है, उसे धरती पर उतारने के लिए इससे कम में काम चलने वाला नहीं है। सामयिक स्थानीय सफलताओं से सम्मोहित होकर ऋषितंत्र द्वारा निर्दिष्ट विराट लक्ष्य को विस्मरण या उपेक्षा में डाल देना युग साधकों के लिए उचित नहीं। जैसे कोई विद्यार्थी एक कक्षा में उत्तीर्ण होने पर प्रसन्न तो होता है, किन्तु उस नशे में अगली कक्षा की तैयारी नहीं छोड़ता, वैसे ही युग साधकों को पिछली सफलता के उत्साह को अगली कक्षा की तैयारी करने, अगले चरण की बड़ी चुनौती स्वीकार करने में लगना चाहिए।

महाक्रान्ति लानी ही है
पू. गुरुदेव से कार्यकर्त्तागण चर्चा-परामर्श कर रहे थे। पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की जा रही थी। पू. गुरुदेव ने भी प्रसन्नता व्यक्त की और कहने लगे :-

इस चरण के प्रयास सफल हुए यह हर्ष का विषय है। लेकिन हमें इतने से सन्तुष्ट होकर रुकना नहीं है। हमारा लक्ष्य सामयिक कार्यक्रमों की सफलता भर नहीं है, हमें तो महाक्रान्ति करनी है। अभी तक जो क्रान्तियाँ हुई हैं वे एकक्षेत्रीय, एकदेशीय रही हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए जो  क्रान्ति उभरी उससे भारत स्वतंत्र हो गया। इसी प्रकार कभी अमेरिका स्वतंत्र हुआ था, रूस की क्रान्ति ने तानाशाही 'ज़ार' का शासन समाप्त करके रूस में समाजवादी तंत्र की स्थापना की थी। भगवान बुद्ध की क्रान्ति दक्षिण और पूर्व एशिया तक ही सीमित थी। अब ईश्वरीय योजना के अनुसार प्रज्ञा अभियान को विश्वव्यापी क्रान्ति के स्तर तक ले जाना है। पहले की हर क्रान्ति ने मनुष्य और मनुष्यता के सामने आने वाली कुछ विसंगतियों, बाधाओं को दूर किया। अब चूँकि विज्ञान के विकास ने सारे विश्व को परस्पर जोड़ दिया है, इसलिए एक मुश्त तमाम विसंगतियों एवं बाधाओं को दूर किया जाना है। इसलिए त्रिविध क्रान्ति, समग्र क्रान्ति, महाक्रान्ति करने की बाध्यता सामने आ गयी है।

क्रान्ति का अर्थ सामान्य परिवर्तन क्रम नहीं है। वह तो संसार में चलता ही रहता है। क्रान्ति के लिए वाञ्छित दिशा में, तीव्रगति से परिवर्तन की प्रचण्ड लहर चल पड़ना और उससे व्यापक क्षेत्र प्रभावित होना जरूरी है। समग्र क्रान्ति के लिए 'बौद्धिक', 'नैतिक' एवं 'सामाजिक' तीनों क्रान्तियों को परस्पर पूरक बनकर आगे बढ़ाना होगा।
 
बौद्धिक या विचार क्रान्ति :- विचार ही पुष्ट होने पर संकल्पों, प्रयासों और कार्यों के रूप में विकसित हो जाते हैं। कुविचार से कुकर्म और कुगति की शृंखला चल पड़ती है जो व्यक्ति और समाज को पीड़ा और पतन के मार्ग पर ठेल देती है। इसके विपरीत सद्विचार से सत्कर्म और सद्गति का क्रम विकसित होकर व्यक्ति और समाज के लिए हर्षोल्लास सहित उत्थान के मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए सभी विसंगतियों और समस्याओं के निवारण के लिए जरूरी है कि सद्विचारों को जन जीवन में प्रविष्ट और सक्रिय करके हीन मान्यता और विकृत परिभाषाओं के स्थान पर श्रेष्ठ मान्यताओं और परिभाषाओं को स्थापित करने का प्रचण्ड अभियान चलाया जाय।

नैतिक क्रान्ति :- जिन्हें जीवन के श्रेष्ठ सूत्रों का ज्ञान ही नहीं, वे तो भटकते ही हैं, किन्तु जिन्हें पता हैं, वह भी अपने अन्दर नैतिक बल की कमी के कारण उनको आचरण में नहीं ला पाते। इसलिए जन-जन तक जीवन की शुद्ध-श्रेष्ठ परिभाषाएँ पहुँचाने के साथ, उनमें उनके अनुरूप आचरण करने के लिए प्रेरणा, प्रोत्साहन, प्रशिक्षण देने की जरूरत है। सदाचरण की अदम्य साहसिकता ही नैतिक क्रान्ति को आगे बढ़ा सकती है। दीपक से दीपक प्रज्वलित करने की तरह प्राणवानों द्वारा अपने-अपने परिवार और क्षेत्र में नैतिक क्रान्ति को जीवन्त रूप देना समय की माँग है।

सामाजिक क्रान्ति :- बौद्धिक एवं नैतिक क्रान्ति से प्रभावित व्यक्ति जब एकजुट होकर समाज में व्याप्त अन्ध परम्पराओं, कुरीतियों, व्यसनों आदि  पर आक्रमण बोल देते हैं तब सामाजिक क्रान्ति तेजस्वी रूप ले लेती है। बौद्धिक एवं नैतिक क्रान्तियों की पूर्णता सामाजिक क्रान्ति के रूप में, व्यक्ति और परिवार की समग्रता समाज निर्माण के रूप में ही फलित होती है।

यह तीनों क्रान्तियाँ होनी ही चाहिए। ऋषिसत्ता ने उनको सूक्ष्म जगत में जाग्रत कर दिया है। उन्हें स्थूल जगत में प्रत्यक्ष गतिविधियों के रूप में उतारने, अवतरित करने की ज़िम्मेदारी प्राणवान परिजनों को निभानी है। अगले चरण की यह चुनौतियाँ स्वीकार करके ही अपने जीवन की प्रामाणिकता को सिद्ध करना सार्थक करना संभव है। हमें इसी उच्चस्तरीय जीवन साधना में प्राणपण से लगना है।  इसके लिए श्रेष्ठ यज्ञीय सहकारिता-संगतिकरण द्वारा समर्थ तंत्र विकसित करना होगा।

प्रामाणिक प्रखर तंत्र
तीनों क्रान्तियों को वाञ्छित गति देने के लिए हर क्षेत्र एवं हर वर्ग में प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक-सुधारात्मक गतिविधियों को चलाना होगा। इसके लिए हर क्षेत्र एवं हर वर्ग में ऐसे तेजस्वी क्रान्तिकारी खड़े करने होंगे, जो समझदारी से दिशा और कार्यों का चयन करें, ईमानदारी से उनका स्वयं अनुपालन और अभ्यास करें, ज़िम्मेदारी से उन्हें समाज में फैलाने, प्रखर बनाने की कमान सँभालें तथा बहादुरी से रास्ते में आने वाले अवरोधों को पार करते हुए क्रान्तियों को आगे बढ़ाते, प्रखरतर बनाते रहें। इसके लिए युगऋषि ने स्पष्ट कार्ययोजना बना दी है, हमें उसके अनुसार स्वयं को विकसित करना और प्रामाणिक-प्रभावी सिद्ध करना है।

प्रथम चरण :- सृजन सैनिकों को युग निर्माण के सूत्र जन-जन तक पहुँचाने और उनको अपनाने का उत्साह जगाने के लिए विविध प्रकार से जनसंपर्क एवं छोटे-बड़े आयोजनों का क्रम अपनाना होता है। उस मंथन में से जिन नर-नारियों  में उत्साह उभरता दिखे, उन्हें उनकी रुचि और आस्था के अनुरूप ईश उपासना, जीवन साधना एवं लोक आराधना के सुगम अभ्यास से जोड़ देना चाहिए। उनको चलाते रहने के लिए आवश्यक समय और साधनों का अंश निकालते रहने की प्रेरणा देनी चाहिए। युग निर्माण के लिए व्यक्ति निर्माण की यह पहली अनिवार्य सीढ़ी है। इसके साथ ही उन्हें सम्पर्क में रखकर विकसित करते रहने की साधना में प्रवृत्त होना होता है। जिससे वे प्रशंसक, समर्थक, साधकगण क्रमश: च्प्रज्ञा परिजनज्, च्प्रज्ञापुत्रज् एवं च्प्रज्ञापुंजज् की भूमिकाओं में प्रवेश करते रहें। उनकी संख्या और गुणवत्ता इतनी बढ़ती रहे कि महाक्रान्ति के सभी मोर्चों पर प्राणवान सैनिकों की आपूर्ति होती रह सके।

युगऋषि
ने इसकी व्याख्या अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर इस प्रकार की है :-
व्यक्ति और परिवार तक ही जिनकी साधना सीमित है उन्हें 'प्रज्ञा परिजन' (कनिष्ठ) साधक कहा गया है। जिन्हें समयदान और अंशदान की दृष्टि से कुछ अधिक पुरुषार्थ करने का सुयोग बन पड़ रहा है, उन्हें 'प्रज्ञापुत्र'(वरिष्ठ) की संज्ञा दी गयी है। वैसे तो कनिष्ठ और वरिष्ठ दोनों ही अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन कनिष्ठों से भी वरिष्ठ बनने की आशा की गयी है और वरिष्ठों को समर्पित बनकर विशिष्ट स्तर 'प्रज्ञापुंज' स्तर में प्रवेश करने का आग्रह किया गया है।

सूत्ररूप में उनकी जिम्मेदारियाँ इस प्रकार समझी-समझायी जा सकती हैं।
प्रज्ञापुत्र :- युगधर्म की आपत्तिकालीन आवश्यकताओं  को समझना और निजी आवश्यकताओं में कटौती करके उस बचत को समयदान-अंशदान के रूप में युग देवता के चरणों में समर्पित करना। युगान्तर चेतना को जन-जन के मन-मन में उतारने और घर-घर अलख जगाने की बहुमुखी प्रवृत्तियों में लगे रहना।

युगसृजन के अग्रदूत -युगशिल्पी, जो परिवर्तन के महान निर्णय को अपने में उतारने और दूसरों में प्रवेश कराने के लिए प्रचण्ड पराक्रम करेंगे, उन्हें च्प्रज्ञापुत्रज् कहा गया है।

इसी तथ्य को दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि उन्हें प्रचार-प्रसार के साथ अपने कार्यक्षेत्र के लिए पर्याप्त संख्या में समर्थ समयदानियों को खोजने, खरादने और नियोजित करने में कुशलता अर्जित करनी चाहिए।

प्रज्ञापुंज :-
इन्हें युगऋषि ने च्समर्पित-विशिष्टज् विशेषण भी दिया है। उनके उत्तरदायित्वों को स्पष्ट करते हुए लिखा है :-
  • प्रज्ञापुंजों (विशिष्टों) को मनस्वी मल्लाह की भूमिका निभानी है। उन्हें न केवल प्रवहमान प्रचण्ड धारा से खिलवाड़ करने, आँख मिचौनी खेलने का मजा लूटना है वरन् अपनी नाव में बिठाकर असंख्यों को पार उतारने का कार्य भी करना  है। अग्रदूतों को न केवल स्वयं जीवन मुक्त होना है, वरन् दूसरों की भवबंधन से बँधी मुश्कें भी छुड़ानी हैं। इसके लिए उनका ओजस, तेजस, वर्चस असाधारण स्तर का होना चाहिए।
  • केन्द्र के बढ़ते दायित्वों को सँभालना। जड़ों को सींचते रहना तथा समूचे तंत्र को सजग और कर्त्तव्य परायण बनाये रखने के लिए घड़ी की चाबी भरने जैसा पराक्रम करते रहना।

युगऋषि चाहते हैं कि प्रज्ञापुंजों का मनोबल-आत्मबल इतना समर्थ हो कि वे समाज में व्याप्त भीषण विसंगतियों से भयभीत न हों, बल्कि उनसे निपटने को एक खेल मानकर मस्ती के साथ सक्रिय हों। उसी प्रकार जैसे रावण के पराक्रम और उसकी व्यूहरचना से निपटने के लिए हनुमान, अंगद जैसे वीर कौतुक किया करते थे। लोभ, मोह, अहंता आदि के जिन भवबंधनों के कारण शुभेच्छु व्यक्ति भी अपने पराक्रम को प्रकट नहीं कर पाते, उनसे स्वयं तो बँधें ही नहीं, अपने प्रभाव क्षेत्र के अन्य सैनिकों, युगशिल्पियों को भी उनसे मुक्त कराने की पात्रता एवं क्षमता अर्जित करें।

  • वे युग निर्माण आन्दोलन को विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न वर्गों में प्रविष्ट कराने के व्यावहारिक सूत्र खोज सकें और उन्हें लागू कर सकें। आवश्यकता के अनुसार अपनी और अपने सहयोगियों की योग्यता, प्रामाणिकता को बढ़ाते रह सकें। प्रज्ञा परिजनों और प्रज्ञा पुत्रों को उनकी रुचि के अनुसार कार्य सौंपने, उनकी कठिनाइयों को हल करने और परस्पर बेहतर तालमेल-सहकार बढ़ाते रहने के लिए विकसित करने की जिम्मेदारी पूरी करते रह सकें।

इस प्रकार नवसृजन आन्दोलन को सफल और सशक्त क्रान्ति का रूप देने के लिए समाज में प्रचार-प्रसार द्वारा प्रज्ञा परिजनों को विकसित करने के साथ प्रज्ञापुत्रों और प्रज्ञापुंजों का समर्थ और प्रामाणिक तंत्र विकसित करना ज़रूरी हो गया है। नैष्ठिक सृजन सैनिकों को इस दिशा में पूरी तत्परता और मनोयोग के साथ जुट जाना चाहिए।

बढ़ते चरण, बढ़ती चुनौतियाँ
प्रज्ञा अभियान क्रमश: गति और विस्तार पाता जा रहा है। प्रत्येक मोर्चे पर तत्परता और कुशलता बरतने पर सफलता मिलती है। लेकिन हर सफलता के बाद अगली कक्षा में प्रवेश के साथ तत्परता और कुशलता बढ़ाने की जरूरत पड़ ही जाती है।

पूर्व राष्ट्रपति, भारत रत्न एवं मिसाइल मैन कहे जाने वाले डॉ. कलाम से किसी ने पूछा था कि आपकी इस प्रकार अबाध प्रगति का मर्म क्या है? उन्होंने कहा था कि प्रत्येक सफलता के साथ मैंने अपनी कुशलता को पहले से डेढ़ गुनी करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इसी कारण अगले चरण की बड़ी चुनौतियों से निपटते रहने का क्रम सधता रह सका।

हम सब को भी इसी सतत विकासशील विधा को अंगीकार करना होगा। अभी भी देश और विश्व में बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जहाँ नवयुग सृजन का संदेश नहीं पहुँचा है। युग चेतना का प्रवाह पिछड़े-उपेक्षित वर्गों में कुछ आगे बढ़ने, बेहतर करने की तड़प उभार रहा है। अनेक जाग्रत् आत्माएँ उसी से प्रेरित होकर अपने-अपने ढंग से कुछ सृजनात्मक-सुधारात्मक कार्य करने के लिए लगी हुई हैं। उन तक युगऋषि के द्वारा स्थापित सृजन सूत्रों को सही ढंग से पहुँचाया जा सके तो देखते-देखते नवसृजन क्रान्ति की लपटें दावानल जैसा रूप ले सकती है।

सृजन सैनिको उठो! अपने पुरुषार्थ को जगाओ और लक्ष्य प्राप्ति तक बिना रुके, बिना थके तीव्र गति से बढ़ते रहो।






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