The News (All World Gayatri Pariwar)
Home Editor's Desk World News Regional News Shantikunj E-Paper Upcoming Activities Articles Contact US

अंगदान एवं शरीरदान का एक प्रभावशाली अभियान चल पड़े

[Shantikunj], Feb 08, 2018
जीवन में यज्ञीय भावनाओं- आदर्शों एवं गुरुनिष्ठा का सार्थक समावेश हो

पूर्व निवेदन
अखण्ड ज्योति जनवरी २०१८ के अंक में 'अपनों से अपनी बात' के अन्तर्गत परिजनों से अंगदान की अपील की गयी है। इस संदर्भ में परिजनों का ध्यान एक विशेष तथ्य की ओर आकर्षित करना उचित और आवश्यक समझकर यह आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है।

परम गुरुसत्ता के निर्देशानुसार पू. गुरुदेव का मथुरा छोड़कर अनिश्चित काल के लिए हिमालय जाना था। तब अपने जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए हिमालय जाने के उत्साह के साथ ही परिजनों, प्रियजनों से बिछुड़ने की व्यथा- वेदना भी उनके अंत:करण से फूट पड़ी थी। वह अभिव्यक्ति अखण्ड ज्योति में 'अपनों से अपनी बात' के अंन्तर्गत कई अंकों में हुई थी। इसी क्रम में जनवरी १९६९ के अंक में पूज्य गुरुदेव ने अपने शरीर के हर अंग का उपयोग लोकहित के लिए करने के भाव भी व्यक्त किए थे। प्रस्तुत आलेख में उनके भावों की अभिव्यक्ति समझने पर अंगदान, शरीरदान अभियान को पूरी निष्ठा और तत्परता से आगे बढ़ाना हम सबका पवित्र कर्त्तव्य बन जाता है।

इस आलेख में उनकी अभिव्यक्तियों को यथावत विशेष टाइप में 'उनके कथन' उप शीर्षक के अंतर्गत दिया गया है तथा तत्सम्बन्धी विविध जानकारियाँ- समीक्षा को 'अपनी दिशा' उप शीर्षक के साथ सामान्य टाइप में दिया गया है। उम्मीद की जाती है इस तथ्य को पढ़- समझकर परिजन 'अंगदान एवं शरीरदान' कार्यक्रम को एक प्रभावशाली अभियान का रूप देने के लिए प्रतिबद्ध होंगे।

काया की वसीयत

जनवरी १९६९ के अंक में उनकी पहली व्यथा परिजनों के स्नेह- सहयोग के प्रतिदान चुकाने की तड़प के रूप में व्यक्त हुई है। उसके लिए वे अपने जीवनमुक्त- अवतारी स्वरूप को भूलकर पुन: ८४ लाख योनियों के चक्र में प्रवेश करने के लिए मचलते हैं। उनकी दूसरी व्यथा अपने नश्वर शरीर का सार्थक उपयोग करने से सम्बन्धित रही है। देखें-

उनका कथन :
मन की दूसरी व्यथा जो खोलकर रखनी है वह यह है कि यह शरीर साठ वर्ष की लम्बी अवधि तक अगणित मनुष्यों और जीव- जन्तुओं की सेवा- सहायता से लाभ उठाता रहा है। जीवन धारण करने की क्रिया में असंख्यों की ज्ञात- अज्ञात सहायता का लाभ मिला है। अन्त में ऐसे शरीर का क्या किया जाय? सोचते हैं यह मरते- मरते, नष्ट होते- होते किसी के कुछ काम आ सके तो इसकी कुछ सार्थकता बन जाय। मौत सबको आती है, जराजीर्ण शरीर के तो वह और भी अधिक निकट होती है। आज नहीं तो कल हमें भी मरना है। कहीं अज्ञात स्थिति में यह जल जाय तो बात दूसरी है अन्यथा मनुष्यों की पहुँच के भीतर स्थिति में प्राण निकलें तो उस विकृत कलेवर का धूमधाम से संस्कार प्रदर्शन बिल्कुल न किया जाय। हमने वसीयत कर दी है और इस घोषणा को ही वसीयत मान लिया जाय कि मरने से, पूरी मौत से पहले ही जब तक जीवन विद्यमान् रहे, सारा रक्त निकाल लिया जाय और उसे किसी आवश्यकता वाले रोगी को दे दिया जाय।

अब आँखें, फेफड़े, गुर्दे, दिल आदि अंग दूसरों के काम आने लगे हैं, तब तक शायद चमड़ी, माँस, हड्डी आदि का भी कुछ उपयोग दूसरे रोगियों को यह अंग लगाने में होने लगे। जो भी अंग किसी के काम आ सकता हो तो उसे सरकारी संरक्षण में प्रसन्नतापूर्वक निकाल लिया जाय और उनकी जहाँ भी आवश्यकता समझी जाय, प्रयोग कर लिया जा। पूर्ण मौत के समय यह चीजें बेकार हो जाती हैं, इसलिए अधूरी मौत के समय, जबकि डॉक्टर अपने विवेक के अनुसार शरीर के उपयोग का ठीक समय समझें, तभी थोड़ी सजीव अवस्था में ही उनके अंगों का उपयोग कर लिया जाय और इस उपयोग में कोई बाधक न बने।

अपनी दिशा : युगऋषि ने तो शरीर की पूरी मौत होने के पहले ही शरीर के रक्त सहित उपयोगी अंगों को निकालकर जरूरतमंदों को उनका लाभ देने की बात लिख दी है, लेकिन वर्तमान कानून के अन्तर्गत ऐसा कोई नियम अभी नहीं बना है कि पूरी मौत होने के पहले ही दाता की इच्छा और परिजनों की सहमति से अंगदान की प्रक्रिया को अंजाम दिया जा सके। सामान्य मृत्यु के बाद सामान्य रूप से तो नेत्रदान के अलावा अन्य अंगों का दान संभव नहीं होता। ब्रेन डैथ या सेरीब्रल डैथ (मस्तिष्क निष्क्रिय) होने पर भी शरीर की रक्त संचार प्रक्रिया कुछ देर तक चालू रहती है। इसलिए हृदय, किडनी, लीवर, फेफड़े आदि को समय रहते निकालकर उनका प्रत्यारोपण संभव हो जाता है।

यह कैसे होता है? :-
जिन लोगों की ब्रेन डेथ हो जाती है, उन्हें डॉक्टर वेंटिलेटर्स पर ले जाते हैं। फिर डॉक्टरों का एक पैनल इस बात की पुष्टि करता है कि उसकी ब्रेन डेथ हो चुकी है। कुछ समय बाद एक बार फिर उसकी पुष्टि की जाती है। इसके बाद घरवालों की इच्छा से और कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद मरने वाले के शरीर से अंगों को निकाल लिया जाता है। यह प्रक्रिया मरने के बाद जल्द से जल्द शुरू कर दी जाती है। इस काम को करते वक्त बॉडी में सिर्फ एक चीरा लगाया जाता है और उसी से अंग निकाल लिए जाते हैं। इस पूरे काम में बॉडी को पूरे सम्मान के साथ रखा जाता है और बाद में उसे साफ करके परिजनों को दे दिया जाता है। इस प्रक्रिया में आधा दिन तक का वक्त लग सकता है। हो सकता है अंतिम क्रिया करने के काम में मामूली- सी देरी हो जाए, लेकिन अंगदान की संतुष्टि के सामने यह कोई बड़ी बात नहीं है।

कहाँ है अड़चन? :-
आॅर्गन डोनेशन एक्ट १९९४ के नियमों के मुताबिक अंगदान सिर्फ उसी अस्पताल में किया जा सकता है, जहाँ उसे ट्रांसप्लांट करने की भी सुविधा हो। यह अपने आप में बेहद मुश्किल नियम है। इस नियम से दूर- दराज के इलाकों के लोगों का अंगदान तो हो ही नहीं पाता। इस समस्या को देखते हुए सरकार ने २०११ में इस नियम में कुछ बदलाव करने के लिए एक बिल पास किया। नए नियम के मुताबिक अंगदान आप किसी भी आईसीयू में कर सकते हैं। यानी उस अस्पताल में ट्रांसप्लांट न भी होता हो, लेकिन आईसीयू है तो वहाँ भी अंगदान किया जा सकता है।

व्यावहारिक :-
यह है कि अंगदान के इच्छुक व्यक्ति किसी मेडिकल कॉलेज या आईसीयू की सुविधा प्राप्त अस्पताल से पहले ही सम्पर्क कर लें। अंगदान या शरीरदान का फॉर्म भर दें। अपने परिजनों को सहमत कर लें तथा मृत्यु के समय आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दें। अंगदाता की मृत्यु की संभावना बनने पर उसे आईसीयू में यथाशीघ्र पहुँचा दिया जाय। सभी अस्पताल ऐसे प्रस्तावों को सहर्ष और सम्मानपूर्वक स्वीकार कर लेते हैं।

नेत्रदान :- अंगदान की प्रक्रिया में नेत्रदान सबसे आसान है। दानदाता किसी भी आई बैंक (नेत्र कोष) से सम्पर्क कर लें। उनका फॉर्म भर दें। अपने परिजनों को नेत्रदान की जिम्मेदारी सौंप दें। सूचना मिलने पर आई बैंक के विशेषज्ञ समय रहते पहुँच कर आँखों के गोले (आई बॉल) निकाल लेते हैं। यदि यह संभव न हो सके तो कोई भी शल्य चिकित्सक मृत्यु के १- २ घंटे के अन्दर आई बॉल निकालकर उन्हें बर्फ के साथ च्थर्मसज् में रख दे। उसे आई बैंक पहुँचा दिया जाय। वहाँ च्कॉर्नियाज् टेस्ट करके उसे प्रत्यारोपित किया जा सकता है। अन्य अंगों को तो निकालने के बाद कुछ ही घंटों में प्रत्यारोपित करना पड़ता है, लेकिन आँख को ३ दिन तक भी सुरक्षित रखकर प्रयुक्त किया जा सकता है।

युग निर्माण परिवार यदि नेत्रदान के लिए प्रतिबद्ध हो जाये तो अपने बूते ही कुछ ही वर्षों में देश को अंधेपन से मुक्ति दिलाई जा सकती है।

भ्रमों में न उलझें
अंगदान को लेकर कुछ रुढ़िवादियों ने अनेक भ्रम भी फैला रखे हैं। गायत्री, प्रज्ञा, सद्विवेक के उपासकों को इन निरर्थक भ्रमों में नहीं उलझना चाहिए।

जैसे :-
नेत्रदान, अंगदान के बाद अन्त्येष्टि की गयी तो अगले जन्म में उनसे वंचित रहने का भय है। यह बात एकदम अनर्गल है। इस तर्क से तो धनदान करने वाला अगले जन्म में धनहीन, ज्ञानदान करने वाला ज्ञानहीन तथा प्रेमदान करने वाला प्रेमहीन हो जायेगा। सत्य यह है कि धनदाताओं को श्रेष्ठ सम्पदा, ज्ञानदाता को दिव्य ज्ञान, प्रेम देने वाले को दिव्य प्रेम- भक्ति आदि की प्राप्ति होती है। इस सत्य के आधार पर नेत्रदाता को श्रेष्ठ दृष्टि, अंगदाता को श्रेष्ठ अंगों की प्राप्ति होना सुनिश्चित है। अस्तु विवेकशील परिजन बिना किसी झिझक के उत्साहपूर्वक इस सत्प्रयोजन में भागीदार बनें।

अंगदान किसी भी आयु के व्यक्तियों का किया जा सकता है। शिशुओं से लेकर ९० वर्ष की आयु के व्यक्तियों के अंगों का प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किया जा चुका है।

शरीरदान की प्रक्रिया

अंगदान के क्रम में तो दाता के उपयोगी अंग निकालने के बाद शेष काया परिजनों को अन्त्येष्टि आदि के लिए सौंप दी जाती है। शरीरदान के क्रम में पूरा शरीर ही चिकित्सालयों को सौंप दिया जाता है। युगऋषि ने अपनी काया के लिए ऐसी ही इच्छा व्यक्त की है।

उनका कथन :-
बचे हुए ढाँचे को सरकारी स्कूल के छात्रों को शरीर ज्ञान का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए दे दिया जाय और इसके उपरान्त उस बचे कलेवर को किसी ऐसे सुनसान में डाल दिया जाय जहाँ गिद्ध, स्यार तथा कीड़े- मकोड़े उससे कुछ तृप्ति प्राप्त कर लें। इतने पर भी शायद कुछ हड्डियाँ बच रहें, उनका खाद बना लिया जाय और उसे किन्हीं वृक्ष की जड़ में गाड़ दिया जाय। इस प्रकार हमारे शरीर का प्रत्येक कण उस उपकार के प्रतिकार में लगा दिया जाय, जिसके आधार पर यह शरीर जन्मा, बढ़ा और सुविधापूर्वक जी सका।

अपनी दिशा :- शरीरदान की प्रक्रिया वर्तमान कानून के अनुसार सुगम भी है। दानदाता तथा उसके परिजन किसी भी मेडिकल कॉलेज में शरीरदान के लिए फॉर्म भर देते हैं। किसी भी प्रकार की मृत्यु होने पर दानदाता की काया को वहाँ यथाशीघ्र पहुँचा दिया जाता है। यदि अन्त समय में ही उस काया को आईसीयू में पहुँचा दिया जाय तो उपयोगी अंगों को प्रत्यारोपण के लिए प्रयुक्त भी किया जा सकता है। यदि ऐसा न हो सके तो शरीर को बरफ की सिल्लियों के बीच सुरक्षित रखकर सुविधानुसार कई घंटों बाद भी दिया जा सकता है।

पूरा शरीर दान करने की स्थिति में काया की अन्त्येष्टि करने की जरूरत नहीं रह जाती। पूरा शरीर यज्ञीय भाव से परमार्थ प्रयोजन के लिए दे देना एक श्रेष्ठ यज्ञ है। इसलिए चिता में जलाकर शरीर को यज्ञीय चक्र में डालने की अनिवार्यता नहीं रह जाती।

परम्परा नहीं, विवेक

पूज्य गुरुदेव ने इस सम्बन्ध में परम्पराओं का अन्धानुसरण न करके विवेकपूर्ण प्रक्रिया अपनाने को
कहा है :-

उनका कथन :- जलाने या गाड़ने की इसलिए जरूरत नहीं है कि यह दोनों ही क्रियायें आज खर्चीली, कितने ही लोगों का श्रम व समय बर्बाद करने वाली हैं। हमारे जैसे भावुक प्रकृति के व्यक्ति के लिए यही उचित है कि मरने के बाद उसके शरीर पर उपकारों का और ऋण न लादा जाय।

व्यक्तिगत उपयोग की दृष्टि से हम सदा अतिशय कंजूस रहे हैं। इस शरीर को जलाने में जो लकड़ी खर्च हो, उसे किसी शीत में ठिठुरते व्यक्ति की व्यथा हल्की करने में लगाया जा सकता है। गाड़ने से भूमि का एक टुकड़ा रुक जायगा। जल प्रवाह से उपयोगी जल गन्दा होगा। तीर्थों में हमारी भस्म और हड्डियाँ पहुँचाने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि हमारी श्रद्धा के अनुरूप भारतभूमि का चप्पा- चप्पा तीर्थ है। हम अपने समय, श्रम, विवेक, तप, शरीर और मन का प्रत्येक अंश लोकमंगल के लिए निरन्तर खर्च करते रहे हैं। अच्छा यही है कि निष्प्राण शरीर का उपयोग भी किन्हीं ऐसे ही प्रयोजन में हो जाय।

किसी को हमारा स्मारक बनाना हो तो वह वृक्ष लगाकर बनाया जा सकता है। वृक्ष जैसा उदार, सहिष्णु और शान्त जीवन जीने की शिक्षा हमने पाई। उन्हीं जैसा जीवन- क्रम लोग अपना सकें तो बहुत है। हमारी प्रवृत्ति, जीवन विद्या और मनोभूमि का परिचय वृक्षों से अधिक और कोई नहीं दे सकता। अतएव वे ही हमारे स्मारक हो सकते हैं।

अपनी दिशा :- युगऋषि का मार्गदर्शन एकदम स्पष्ट है। शरीरदान करने वालों को शरीरदान का पुण्य तो मिलता ही है, साथ ही लकड़ी की बचत, परिजनों के कीमती समय और श्रम को बचाने का, तीर्थों को प्रदूषित न करने के अतिरिक्त पुण्य भी मिलना निश्चित है। केवल परम्पराओं के स्थान पर विवेक को महत्त्व देने का साहस भर दिखाना है।

इस मार्गदर्शन के आधार पर भस्म- अवशेषों को प्रवाहित करने की जगह उन्हें खाद- मिट्टी में मिलाकर मृतक की स्मृति में वृक्ष रोपने की शानदार परम्परा भी प्रारंभ की जा सकती है।

भावनाशील परिजनों को शरीर यज्ञ की श्रेष्ठ प्रक्रिया अपनाने; गुरुवर की, युगऋषि की इच्छा पूरी करने जैसे असाधारण पुण्य प्रदान करने वाली यह प्रक्रिया जीवन्त बनाने के लिए भरपूर प्रयत्न करने चाहिए।






Click for hindi Typing


Related Stories
Recent News
Most Viewed
Total Viewed 121

Comments

Post your comment