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पिछड़े और समृद्ध कहे जाने वाले वर्गों की समस्याओं के स्वरूप तो अलग-अलग हैं, पर विपन्नता और उद्विग्नता की दृष्टि से कोईर् भी कम परेशान नहीं है। किसी की भी उलझन दूसरे की तुलना में कम नहीं है। हाँ उन कठिनाइयों के नाम, रूप अवश्य अलग-अलग हैं। गरीबों के लिए अभाव अभिशाप है तो अमीरों के लिए वैभव कम संकट नहीं है। ...

हमारा असमंजस
आज समस्याओं की वेदना से विकल जन-जीवन को सहसा अपने कर्ण कुहरों पर विश्वास नहीं होता कि उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष साकार होने जा रहा है। उसका संतप्त मन सोच नहीं पाता कि नवयुग के अरुणोदय का आधार क्या है? 
उज्ज्वल भविष्य एक सुनिश्चित भवितव्यता है। आतंक, अलगाव, अस्थिरता की घनी अमावस में जी रहे लोगों को यदि प्रभात के माधुर्य भरे उल्लास की ठीक अवधारणा कठिन लगती है तो उसमें उनका कोई दोष नहीं। एक छोटे से कालखण्ड की घटनाओं, परिस्थितियों का सांख्यकीय गुणन करके युगों की परिवर्तित स्थिति का आकलन नहीं हो सकता। छोटे से पात्र में कुछ बूँद जल लेकर कोई महासागर के विशाल आगार में स्थाई विशाल जलराशि की हलचलें कहाँ माप सकता है।

समस्या कहाँ नहीं है?
सामान्य संदर्भ में प्रत्येक समस्या किसी न किसी अभाव से उपजी दीखती है। इसके औचित्य से इन्कार नहीं किया जा सकता। किंतु देखना यह है कि क्या इसके निवारण भर से ही काम चल सकेगा। यदि अभीष्ट सुविधा-साधन विनिर्मित कर दिये जायें तो क्या उन समस्याओं का समाधान हो जायेगा, जो इन दिनों हर किसी को संत्रस्त किये हुए हैं ? 

इस संदर्भ में हुए अनेकों प्रयोगों के परिणामों का कड़वा-मीठा अनुभव दुनिया उठा चुकी है, उठा रही है। तीसरी दुनिया के नेतृत्व का दावा करने वाले देशों ने प्रायः अपने अभाव को दूर कर लिया है। अमेरिका जैसे देशों को तो टनों साधन बाहुल्य भार घटाने के लिए नष्ट करने पड़ते हैं। किंतु अपने अभाव दूर करने का दावा प्रस्तुत करने वाले इन देशों को भी समस्याओं के कँटीले जाल में फँसी मछली की सी तड़पन का तीखा अनुभव उठाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। 

अभाव का एक दूसरा पहलू है अशक्तता। दोनों एक-दूसरे के इतना नजदीक हैं, इस कदर गहराइयों से जुड़े हैं कि एक के बिना दूसरे की सोचा भी नहीं जा सकता। अभावग्रस्त ही अशक्त है और अशक्त ही अभावग्रस्त। जिसने एक को दूर किया वह दूसरे का अधिपति सहज बन बैठता है। 

उपरोक्त देशों के अतिरिक्त पिछड़े देशों में भी सुसम्पन्न वर्ग है। इसके ऊपर भी निगाह दौड़ाई जा सकती है। यों कहना चाहिए कि मौलिक दृष्टि से पिछड़े हुए और साधन सम्पन्न वर्गों को पृथक करके यह देखा जा सकता है कि आखिर अभाव और अशक्तता के निवारण से मानवीय समस्याओं के समाधान में किस सीमा तक योगदान मिल सकता है। क्या अभाव और अशक्तता दूर हो जाने से, साधन-सम्पन्न हो जाने मात्र से समस्याओं का समाधान हो जाता है ?

पिछड़े और समृद्ध कहे जाने वाले वर्गों की समस्याओं के स्वरूप तो अलग-अलग हैं, पर विपन्नता और उद्विग्नता की दृष्टि से कोईर् भी कम परेशान नहीं है। किसी की भी उलझन दूसरे की तुलना में कम नहीं है। हाँ उन कठिनाइयों के नाम, रूप अवश्य अलग-अलग हैं। गरीबों के लिए अभाव अभिशाप है तो अमीरों के लिए वैभव कम संकट नहीं है। एक अशक्तता के पाषाण खण्ड पर सिर पटक-पटक कर रो रहा है, दूसरा शक्ति के उन्माद में विक्षिप्त है। वैभव का उपयोग कहाँ किया जा सकता है, उसके उपार्जन और संग्रह का औचित्य किन मर्यादाओं से बँधा है? इसे भुला देने से अवांछनीय मात्रा में अनुचित रीति से कमाया हुआ धन एकत्र होता है। उसकी प्रतिक्रिया अनियंत्रित विलासिता के रूप में सामने आती है। दुर्व्यसन बढ़ते हैं। उपभोग की आतुरता चरम सीमा तक पहुँचती है व उपार्जन से लेकर उपभोग तक का सारा का सारा ढाँचा विकृतियों से चकनाचूर हो जाता है। फलतः वैभव के रसास्वादन की तुलना में अनेकों गुना विग्रह और संकट पल्ले पड़ते हैं। सम्पन्नता का यह व्यापार दरिद्रता से भी महँगा पड़ता है। 

एक भूख से संत्रस्त, दूसरा अपच का मरीज। एक को कुपोषण की शिकायत है, दूसरे इंद्रिय शक्ति के दुरुपयोग से खोखले हो रहे हैं। यौन रोग, मधुमेह, अनिद्रा, रक्तचाप, हृदय रोग प्रायः सुसम्पन्न वर्ग को ही होते हैं और वैभवजन्य सभ्यता की देन समझे जाते हैं। नैतिक खोखलेपन में भी अमीर ही गरीबों से आगे हैं। असन्तोष और विक्षोभ की मात्रा भी उन्हीं के पास ज्यादा है। समझदार लोगों के द्वारा जो प्रपंच रचे जाते हैं, उनके कुचक्र में पिसकर तो अगणित लोगों का कचूमर निकल जाता है। शोषण की बाजीगरी से वे उतना कमा लेते हैं, जितना कोई चोर-उठाईगीरा अनेकों जन्मों में नहीं कमा सकता। 

दृष्टिकोण में सुख-दुःख

अपनी चिंतन चेतना का विस्तार करके विचित्रताओं, विभिन्नताओं की उलझन से भरे जखीरे को उलट-पुलट कर देखने से पता चलेगा कि आतंक, अलगाव, अस्थिरता जैसी सभी समस्याएँ कहीं न कहीं एक-दूसरे से जुड़ी हैं। इनके पीछे कोई न कोई एक मूल कारण अवश्य है। मनीषी, अभोरी क्लीवलैण्ड अपने चिंतन कोष ‘हू किल्ड सोसायटी’ में स्थिति का विश्लेषण करते हुए दृष्टिकोण की विकृति को इसका जिम्मेदार ठहराते हैं। इस छोटे से बिल से समस्याओं के अनंत साँप-बिच्छु निकल पड़े होंगे, यह पहेली जैसा लगता हुआ भी कठोर सत्य है। इतना ही नहीं, इसी की तह में मानवीय जीवन की पहेली का हल भी छिपा हुआ है। 
सम्पन्नता से एक प्रकार की विपत्तियाँ पैदा होती हैं, दरिद्रता से दूसरी तरह की। इसके विपरीत दोनों ही पक्षों में सुखी और संतुष्ट लोग भी पाये जाते है। झोपड़ियों में भी स्वर्ग बरसता है। किसान और मजदूर स्वल्प संसाधनों में निर्वाह करते हुए भी हँसते-हँसते सुखी-संतुष्ट जीवनयापन करते हैं। अफ्रीका के मसाई वनवासी अर्धनग्न स्थिति में रहते, साधनहीनता का जीवन जीते हुए भी अपनी काया को इतना बलिष्ठ रखते हैं कि भयानक बबर शेर से भाले के सहारे गुत्थम-गुत्था करके उस पर विजय प्राप्त कर सकें। 

प्राचीन भारत के ऋषियों और तत्वज्ञानियों का जीवन प्रत्यक्षतः अभावग्रस्त स्थिति में गुजरता था,  पर इससे उनकी गरिमा, प्रतिभा, प्रतिष्ठा पर कोई आँच नहीं आती थी। समस्याओं में उलझने की जगह उनका समय औरों की गुत्थी सुलझाने में बीतता था। 

आज समस्याओं की गुत्थी व्यक्ति विशेष की हो अथवा बृहदाकार समुदाय की, इसका यथार्थवादी पर्यवेक्षण यही बताता है कि समस्याओं की जड़ें अभाव और अशक्तता तक सीमित नहीं हैं। इनके अंकुर जहाँ से निकलते हैं, वह है अज्ञान, जिसे विकृत दृष्टिकोण, विचारहीनता, कोई भी नाम क्यों न दिया जाय, दूर किये बगैर कोई उपचार नहीं। शक्ति का ठीक अर्जन और समुचित उपयोग जीवनदृष्टि पाये बगैर नहीं बन पड़ते। इसके बगैर अर्जन शोषण होता है और उपभोग उन्माद। यह फिर कोई एक व्यक्ति करे या समूचा समुदाय, सिवाय इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परिणति का दायरा विशाल से विशालतर होता जाता है। 

बदलेंगे विचार
उज्ज्वल भविष्य की भवितव्यता के उद्घोष का तात्पर्य है जीवनदृष्टि प्रदान करने का उद्घोष। समस्याओं की पीड़ा से छटपटाते आज के समाज की बिलखन, व्याप रही पीड़ा के कारुणिक रव का संवेदनापूर्ण निदान यही है। जीवनदृष्टि देने की योजना किसी व्यक्ति विशेष का प्रयास न होकर महाकाल की है। यदि इस तथ्य को समझा जा सके तो व्यक्ति और समाज की समस्याओं का निराकरण इसमें झाँकता हुआ नजर आयेगा। फिर यह सुस्पष्ट हो जायेगा कि व्यक्ति की अंतःचेतना को स्पर्श किया जाय, क्योंकि उसके अस्तित्व में आदर्शवादी आस्थाओं का पुनर्जीवन भवितव्यता के प्रकाशमय संसार में जीने का अनिवार्य शुल्क है। इसे चुकाने और समस्त समस्याओं से छुटकारा पाने की शुभ घड़ी यही है, इसे दिये बगैर प्रगति के लिए किये जाने वाले प्रश्न हमें मृगतृष्णाओं में ही भटकाते रहेंगे।  

(वाङ्मय खंड-राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बने, पृष्ठः १.७१-७३ से संकलित संपादित)


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