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युग देवता के साथ सक्रिय साझेदारी की तड़प से यह उद्देश्य सहज सध सकते हैं
पहले से बेहतर दिशाधारा


युग निर्माण अभियान के अंतर्गत प्रशिक्षण, संगठन एवं साधना के अपने प्रयास पहले भी चलते रहे हैं और अभी भी चल रहे हैं। परंतु अब उन्हें युगऋषि के दिशा- निर्देशों के अनुसार अधिक प्रभावशाली तथा व्यापक बनाने के लिए प्रयास चालू किये गये हैं।
उपयुक्त बनाने का तात्पर्य है उन्हें मिशन की व्यापकता और दिशा के अनुरूप समर्थ और शुद्ध बनाना। मिशन तो विश्वव्यापी है, हर संगठित इकाई स्वयं को उस विराट अभियान का एक सशक्त और प्रामाणिक अंग मानकर चले। अपने क्षेत्र को युग निर्माणमय बनाने के लिए सुनिश्चित लक्ष्य तथा योजना बनाकर चले। क्या करें?
अपने लिए एक सुनिश्चित कार्य का चयन कर लें। जैसे- जैसे सामर्थ्य बढ़े, उसके अनुसार कार्यक्षेत्र को बड़ा बनाते रहा जा सकता है।

मिशन की दिशाधारा के अनुसार, अपने क्षेत्र की आवश्यकता और परिस्थितियों के अनुसार कुछ छोटे- छोटे लक्ष्य बना लें। सामर्थ्य और कुशलता के विकास के साथ लक्ष्य भी बढ़ाये जा सकते हैं।

उस क्षेत्र में प्रचारात्मक, सृजनात्मक और संघर्षात्मक गतिविधियाँ चलाने के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण, संगठन तथा साधना के क्रम अपनाए जायें। उनके लिए समयबद्ध लक्ष्य बनाकर चला जाय। पहले सीमित गतिविधियों के साथ शुरुआत करते हुए क्रमशः उन्हें विस्तार दिया जाता रहे, यह जरूरी है।

युग निर्माण योजना स्पष्ट रूप से नवसृजन की योजना है। इसके अंतर्गत हर क्षेत्र तथा हर वर्ग में प्राणवान् प्रतिभाओं को खोज- खराद कर योजना की आवश्यकता के अनुरूप किन्हीं सृजन कार्यों में लगा देना है।

सृजन के लिए पर्याप्त संख्या में उपयुक्त प्रतिभाओं को खोजने के लिए जनजागरण की व्यापक प्रचारात्मक गतिविधियाँ चलानी पड़ेंगी। कार्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए संघर्षात्मक गतिविधियाँ भी अपनानी पड़ेंगी। प्रशिक्षण, प्रचारात्मक, रचनात्मक तथा संघर्षात्मक; सभी कार्यों के लिए प्रशिक्षण देने होंगे। सभी धाराओं के प्रशिक्षकों, प्रशिक्षुओं और साधकों को भी प्रशिक्षित करना पड़ेगा। साधना से उनके व्यक्तित्वों को प्रामाणिक- प्रखर बनाने के तथा संगठन से तंत्र को समर्थ और अनुशासित बनाते रहने के क्रम भी अपनाने होंगे।

युगऋषि के अनुसार ही चलें
युगऋषि ने स्पष्ट कहा है कि युग परिवर्तन ईश्वरीय कार्य है। ऐसे कार्यों में प्रेरणा और शक्ति ईश्वर की ही कार्य करती है, लेकिन परमात्मसत्ता उसके लिए माध्यम जाग्रतात्माओं को ही बनाती है। जनजागरण और लोकशिक्षण की गतिविधियों के द्वारा जाग्रतात्माओं को खोज- खराद कर ईश्वरीय प्रयोजनों में लग पड़ने के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी बड़े अंशों में अपने संगठन पर डाली गयी है। जनजागरण के प्रचारात्मक क्रम में ही उन तक पहुँचने तथा प्रेरणा देने में सफलता मिलेगी।
तीन विशिष्ट क्रम : इसके लिए युगऋषि ने तीन विशिष्ट कार्यक्रमों को चलाने की बात कही है।

1. ज्ञानयज्ञ 2. अभिनव शिक्षा योजना 3 . कला के द्वारा रोचक दृश्य- श्रव्य गतिविधियों का संचालन।

1. ज्ञानयज्ञ :- इसके अन्तर्गत मिशन के साहित्य (पत्रिकाओं और पुस्तकों) को अधिक से अधिक व्यक्तियों को नियमित रूप से पढ़ाने या सुनाने का प्रभावी तंत्र बनाना; यज्ञों, संस्कारों, पर्वों आदि के माध्यम से सद्ज्ञान के सूत्रों को नर- नारियों के गले उतारने के प्रयास करना; सत्संगों, कथाओं के द्वारा सद्विचारों की स्थापना के प्रयास करना आदि शामिल हैं। पत्रिकाओं के पाठक बढ़ाना, ज्ञान मंदिरों की स्थापना, झोला पुस्तकालय- ज्ञानरथ आदि का संचालन, विविध आयोजन आदि ज्ञानयज्ञ के ही अंग माने जाते हैं। इन सब के बारे में परिजनों को पर्याप्त जानकारी है, जरूरत है इनके लिए अधिक प्रखर, व्यापक और प्रभावी तंत्र बनाने की।

2. अभिनव शिक्षा योजना :- व्यक्ति और समाज निर्माण की दिशा में उपयुक्त शिक्षण व्यवस्था का महत्त्व समझाते हुए युगऋषि ने लिखा है :-
‘‘जर्मनी, इटली, रूस, चीन, जापान, क्यूबा, यूगोस्लाविया आदि देशों ने कुछ ही वर्षों में अपनी जनता की मनोदशा में तथा परिस्थितियों में कायाकल्प किया। उसका आधार शिक्षा पद्धति ही थी, जिसके आधार पर वहाँ के छात्रों एवं नागरिकों को एक विशेष पद्धति से सोचने की प्रेरणा मिली और वे व्यक्तिगत स्वार्थों को तिलांजलि देकर राष्ट्र- रचना में अति उत्साहपूर्वक जुट गये।’’
अपने देश में ऐसी सार्थक शिक्षा नीति लागू करने की आशा सरकार से की जाती रही है, किन्तु वैसा कुछ हो नहीं सका। अपनी रीतिनीति दूसरों की उम्मीद में बैठे रहने की अपेक्षा सही दिशा में अपनी शक्तिभर प्रयास करते रहने की रही है। युगऋषि ने इसके लिए स्कूली शिक्षण के अतिरिक्त श्रम+कौशल प्रधान स्वावलम्बन की शिक्षा के साथ सद्गुण+सत्प्रवृत्तियाँ   विकसित करने वाली शिक्षण व्यवस्था बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। लिखा है :-
‘‘मुख्य विषय वही है, जिसके आधार पर जीवन जीने की कला, व्यक्तित्व का विकास, प्रतिभा, दूरदर्शिता, विवेकशीलता, चरित्र गठन, मनोबल, देशभक्ति, लोक- मंगल के लिए उमंग आदि सद्गुणों को सुविकसित किया जा सकता है।’’
ऐसे शिक्षण (जीवन विद्या) की जरूरत स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है :-
‘‘लोगों की शिक्षा और सम्पदा बढ़ रही है पर वे व्यक्तित्व की दृष्टि से उलटे अधःपतित होते चले जा रहे हैं। दिन- दिन अनैतिकता की विघटनकारी प्रवृत्तियाँ बढ़ती जा रही हैं और भीतर ही भीतर अपनी संघशक्ति खोखली होती चली जा रही है। न इस सामाजिक स्थिति में व्यक्ति को उत्साह मिल रहा है और न व्यक्ति मिल- जुलकर समाज का स्तर उठा रहे हैं। विनाश और विघटन बढ़ रहा है और भविष्य का क्षितिज अंधकार से घिरता चला जा रहा है। इसको रोकने के लिए ऐसी तीव्र विचार पद्धति का विकास आवश्यक है जो जनमानस को झकझोर कर रख दे और विनाश की ओर बढ़ते कदमों को रोककर उन्हें निर्माण की दिशा में अग्रसर करे।’’
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए भी मिशन के द्वारा पर्याप्त साहित्य प्रकाशित किया जा चुका है। बाल संस्कार शालाओं के लिए समुचित पुस्तकें तथा प्रशिक्षण की व्यवस्था उपलब्ध है। भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के माध्यम से जिन स्कूलों, कॉलेजो में सम्पर्क सध गये हैं, उनके शिक्षकों तथा सृजन सैनिकों के सहयोग से नई पीढ़ी के लिए ऐसी शिक्षण कक्षाएँ चलाई जा सकती हैं। अपनी पीठों आदि के माध्यम से चलने वाली शिक्षण संस्थाओं में अनिवार्य रूप से ऐसे शिक्षण की व्यवस्था बनाई जा सकती है।
इस प्रकार की कक्षाओं को चलाने के लिए 1. युग निर्माण योजना- दर्शन स्वरूप और कार्यक्रम अथवा 1. नैतिक शिक्षा भाग- 2 एवं भाग- 3. को आधार बनाया जा सकता है। उच्च कक्षाओं के लिए क्रान्तिधर्मी साहित्य सैट की पुस्तकों का उपयोग किया जा सकता है।

शिक्षण संस्थाओं के अलावा युगऋषि तो चाहते हैं कि अपनी समर्थ शाखाओं द्वारा पुरुषों के लिए रात्रि पाठशालाओं तथा महिलाओं के लिए दोपहर की पाठशालों का भी क्रम चलाया जाय। उन्हें अपने यहाँ के प्राचीन गुरुकुलों अथवा सुकरात या अरस्तू की पाठशालाओं की तरह प्रश्रोत्तरी के क्रम से चलाया जाय। इस शैली से विचार शिक्षार्थियों के गले आसानी से उतर जाते हैं। यदि भावनाशील सुयोग्य नर- नारी इस कार्य में लग जायें तो यह प्रक्रिया छोटे से प्रयोग से शुरू होकर व्यापक रूप जल्दी ही ले सकती है। इसमें मुख्य कठिनाई क्या है? इस प्रकरण में गुरुवर ने लिखा है :-
‘‘कठिनाई केवल एक ही है कि अपने देश में लोग सम्पदा का महत्त्व समझ पाये है और सुविधाओं तथा उपभोगों को ही सुख- साधन मानते हैं, अतः उन्हें ही महत्त्व देते हैं और प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। अभी अपने देशवासियों को यह विदित नहीं हो सका कि मनुष्य की मूल शक्ति उसकी विचारणा ही है। वही हमारी भौतिक एवं आत्मिक, वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक सुख- शांति एवं प्रगति का आधार है। यह तथ्य समझ में आया होता तो निश्चय ही विचार निर्माण की दिशा में कहीं कुछ प्रयत्न हो रहे होते।’’

यों कहने के लिए तो बहुत कुछ इस दिशा में भी चल रहा है, किन्तु उसे युग निर्माणी लहर के स्तर तक ले जाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना है। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन तथा सभ्य समाज बनाने के लिए इस प्रकार के शिक्षण नियमित रूप से या समय- समय पर चलाये जाने की जरूरत है। शिक्षितों- अशिक्षितों सभी के लिए यह जरूरी है। युगऋषि लिखते हैं :-

‘‘अपने प्रशिक्षण में शिक्षित- अशिक्षित दोनों का समान महत्त्व है, क्योंकि विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता के क्षेत्र में दोनों ही समान रूप से पिछड़े हुए हैं। अशिक्षितों का पिछड़ापन किसी कोण में और शिक्षितों का किसी दूसरे कोण में हो सकता है पर सब मिलाकर दोनों का पिछड़ापन लगभग समान वजन का बैठेगा। इसलिए अपने विद्यालयों में दोनों का ही प्रवेश समान रूप से हो सकता है। नर- नारी का भी अन्तर नहीं किया जाना चाहिए। 13- 14 वर्ष से अधिक आयु के बालक जो विचार- विद्या में व्यक्ति और समाज का संदर्भ समझ सकने में समर्थ हो गये हैं, प्रसन्नतापूर्वक इस शिक्षा में सम्मिलित हो सकते हैं। शिक्षित पाठ्य पुस्तकें पढ़कर अपनी जानकारी अधिक सरलतापूर्वक बढ़ा सकते हैं, जबकि अशिक्षितों को इसे सुनाकर समझना पड़ेगा। इतनी कठिनाई के अतिरिक्त और कोई विशेष अन्तर पड़ने वाला नहीं है।’’

यदि सृजनशिल्पी संकल्पपूर्वक लग जायें तो ऐसे शिक्षणों को जनसामान्य से लेकर कथित प्रबुद्धों के स्तरों पर भी चलाया जा सकता है।
कला, दृश्य- श्रव्य माध्यमों से :- लोक शिक्षण के लिए कला आधारित स्वस्थ मनोरंजन परक कार्यक्रम बहुत प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। युगऋषि ने इसके लिए अनेक सुझाव दिए हैं, जैसे :-
संगीत टोलियों द्वारा :- विभिन्न आयोजनों के साथ तथा स्वतंत्र रूप से संगीत संध्या जैसे आयोजनों में इनका उपयोग किया जा सकता है। हिन्दी में इनके लिए हर धारा के प्रेरक गीत पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं। विभिन्न प्रान्तीय और क्षेत्रीय प्रचलित भाषाओं के लिए भी उन्हें तैयार किया जा सकता है।

अभिनय द्वारा :- कुरीतियों पर प्रहार करने वाले, सत्प्रवृत्तियों के लिए उत्साह उभारने वाले नाटकों, नुक्कड़ नाटकों, अभिनय गीतों आदि के माध्यम से भी जनचेतना को झकझोर कर जगा देने का कार्य बखूबी किया जा सकता है।
चित्र प्रदर्शनियों द्वारा :- उक्त उद्देश्यों के लिए चलती- फिरती चित्र प्रदर्शनियों की व्यवस्था बनाना तथा उन्हें चलाना बहुत कठिन नहीं है। प्रकाशित चित्रावलियों, चित्र कथाओं का उपयोग इस निमित्त आसानी से किया जा सकता है।
उपकरणों द्वारा :- कभी स्लाइड प्रोजेक्टर तथा टेप रिकार्डर इसके लिए बड़े उपयोगी माने जाते रहे हैं। अब तो ऑडियो- वीडियो रिकॉर्डिंग और उन्हें चलाने के लिए विज्ञान ने तमाम सुविधाएँ खड़ी कर दी हैं। व्याख्या सहित प्रदर्शनी को कम्प्यूटर के माध्यम से एक छोटे से पैन ड्राइव में भरकर उसके माध्यम से कहीं भी शानदार प्रस्तुतियाँ दी जा सकती हैं। विभिन्न विषयों पर पावर पॉइंटप्रज़ेण्टेशन तैयार करना अब कोई बहुत बड़ी बात नहीं रह गयी है।

उक्त सभी माध्यमों से जनजागरण करते हुए बौद्धिक, नैतिक तथा सामाजिक क्रान्ति के सूत्रों को जन- जन तक पहुँचाने की प्रक्रियाएँ चलाना बहुत उपयोगी है।

सृजनात्मक, संघर्षात्मक
जन चेतना जगाने के साथ- साथ रचनात्मक और संघर्षात्मक गतिविधियों को भी क्रान्तिकारी रूप दिया जाना जरूरी है। इस सम्बन्ध में भी युगऋषि के निर्देश स्पष्ट हैं। देखें ; -
रचनात्मक  ‘‘रचनात्मक कार्यों में देश के हर नागरिक को जुटा देने की अपनी शतसूत्री योजना बहुत ही लोकप्रिय होती चली जा रही है। रात्रि पाठशालाएँ, प्रौढ़ पाठशालाएँ, कोचिंग स्कूल, उद्योग , सहकारी समितियाँ, सेवा समितियाँ, सुरक्षा दल, पुस्तकालय, व्यायाम शालाएँ, खेल- कूद प्रतियोगिताएँ, सत्कर्मों का अभिनन्दन, पर्व और त्यौहारों के उत्सव, फूल और वृक्षों की अभिवृद्धि, स्वच्छता, गौ- संरक्षण, श्रमदान, कीर्तन, विचार गोष्ठियाँ, क्लब आदि अनेक रचनात्मक प्रवृत्तियों से देश के हर नागरिक को किसी न किसी प्रकार अपनी स्थिति और क्षमता के अनुरूप राष्ट्र निर्माण के कार्यों में लगने की प्रेरणा दी जा रही है। जब हर व्यक्ति इस प्रकार के लोकमंगल के कामों में भाग लेना आवश्यक कर्तव्य समझेगा, तभी नवनिर्माण के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी।’’

इस दिशा में कार्य चल भी रहे हैं। कई अच्छे कीर्तिमान भी बने हैं, किन्तु इन्हें जन आंदोलन का रूप देने के लिए तपसाध्य प्रक्रिया अपनानी होगी।
संघर्षात्मक :‘‘समझाने से भले आदमी मान जाते हैं, पर दुष्टता और मूर्खता को बदलने के लिए संघर्ष की जरूरत पड़ती है। असहयोग, विरोध, प्रदर्शन, सत्याग्रह, घेराव, कानूनी कार्यवाही आदि माध्यमों से अनैतिकता, आनाचार, भ्रष्टाचार, अपराध, धूर्तता, दुष्टता, बेईमानी, शोषण, अन्धविश्वास आदि अनेक स्तर की, अनेक रूपों की जो बुराईयाँ विभिन्न क्षेत्रों में बिखरी पड़ी हैं, उन्हें चुपचाप सहते रहने और मन ही मन कुढ़ते रहने भर से कुछ काम न चलेगा। प्रतिरोध के लिए सशक्त संघर्ष की जरूरत पड़ेगी, सो उसके लिए जितनी अपनी सामर्थ्य बढ़ती जायेगी उतने ही तेज कदम उठने लगेंगे।’’

संघर्ष के लिए युगऋषि के विचार बहुत स्पष्ट और दिशाबद्ध हैं। यह संघर्ष सृजन का पक्षधर होने के साथ बहुत व्यापक भी होना चाहिए।
कौशल जगाएँ- सौभाग्य कमायें
अपने प्रशिक्षण- संगठन तथा साधना के कार्यक्रम युगऋषि के व्यापक दृष्टिकोण तथा कल्याणकारी दिशा- धारा के अनुसार ही चलाए जाने हैं। हम यदि अपने जन्म- जन्मांतरों के शुभ संस्कारों को लेकर लग पड़ें तो युगधर्म निभाने का कौशल हम विकसित कर सकते हैं, और अतुलनीय श्रेय- सौभाग्य के भागीदार बन सकते हैं। यह कार्य कितना महत्त्वपूर्ण हैं, इस संदर्भ में वे लिखते हैं :-
‘‘बारीकी से देखने पर यह कार्य किसी भी योग साधना और परमार्थ प्रयोजन से कम वजन के नहीं बैठेंगे। इस प्रकार की सेवा- साधना को यदि ईश्वर भक्ति का सर्वोत्तम प्रकार कहा जाये तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं होगी। भावनात्मक दृष्टि से परिष्कृत व्यक्ति ही देवता कहा जाता है। अन्तःकरण में उच्च भावनाओं का हिलोरें लेने लगना ईश्वर का प्रत्यक्ष प्रकाश समझा जाना चाहिए। भीतर यदि आदर्शवादिता, उत्कृष्टता उमड़ती है तो उसे ईश्वर की अनुकम्पा का मूर्तिमान वरदान अथवा परमात्मा का साक्षात्कार ही माना जाना चाहिए।’’
महाकाल ने, ऋषिसत्ता ने तो हमारे लिए श्रेय- सौभाग्य के द्वार खोल दिए हैं, हमारे मनों में भी इस दिशा में उत्साह उभरा है, तो उसके श्रेयस्कर परिणाम भी सुनिश्चित रूप से सामने आयेंगे ही। आइये जुट जायें हम सब मिल करके...........


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