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वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, [सन् 1971 में बिलासपुर, मध्य प्रदेश में दिये गये एक प्रवचन से संकलित]

कर्मकाण्ड नहीं, भाव प्रधान


मेरे व्यक्तिगत जीवन को विकसित करने का आधार है मेरी पूजा करने की शैली, मेरी उपासना विधि। मेरी उपासना की विधियाँ भावनात्मक हैं, कर्मकाण्डात्मक नहीं। कर्मकाण्डात्मक 24 लक्ष्य के 24 पुरश्चरण हैं। 24  पुरश्चरण मैंने किये थे, गुरु के कहने के मुताबिक ब्रह्मचर्य से रहा था, जमीन पर सोया था, जौ की रोटी खायी थी, न जाने क्या- क्या किया था। लम्बे- चौड़े कर्मकाण्ड कभी भी मुझे नहीं आते थे, अभी भी मुझे नहीं आते हैं।

कर्मकाण्डों के आधार पर भगवान को प्राप्त करने में कोई खास सफलता मिल जाती हो, ऐसा विश्वास मेरा नहीं है। यदि ऐसा होता तो जिनको हृदय, कवच यह सब करना आता है, वे सब लक्ष्मी जी का, बगलामुखी का जप कर लेते और बगलामुखी और लक्ष्मी जी को पकड़- पकड़ कर अपने काबू में कर लेते और सब लखपति हो जाते। पर सब भूखे मरते हैं और दरवाजे- दरवाजे पर पाठ करने के लिए मारे डोलते हैं। इसीलिए मुझे यह विश्वास नहीं है कि कर्मकाण्डों के आधार पर भगवान की मोहब्बत और भगवान की शक्ति पायी जा सकती है।

प्रियतम से प्रेमभाव

मेरे उपासना करने के दो- तीन तरीके हैं, आप ध्यान रखिये, शायद आपको कभी काम आयें। मुझे मालूम है कि सुहागरात के लिए लड़कियाँ अपनी सहेली को बताती हैं कि पहले दिन अपने पति के पास जाना हो तो चमेली का तेल सिर में डालकर जाना चाहिए। लाल रंग की मेंहदी हाथ में रचा कर जाना चाहिए। अमुक तरीके से कपड़े पहनकर जाना चाहिए, अमुक तरीके से काजल आँख में डालकर जाना चाहिए। सहेलियाँ बड़ी- बड़ी बातें बताती हैं और रोजाना ट्रेनिंग होती रहती है कि बहिन तेरा ब्याह होने वाला है, पति के पास ऐसे जाना चाहिए।

मैं भी अपने आप को बहुत ट्रेनिंग देता रहता हूँ कि मुझे कैसे अपने खाविंद के पास जाना चाहिए। भजन करने के लिए मैं जाता हूँ तो मैं यह ख्याल करता रहता हूँ कि मेरा मन कषाय- कल्मषों से भरा हुआ तो नहीं है। मेरे कपड़े गंदे वाले तो नहीं हैं। मैं अपने पूजा करने के स्थान को ऐसे झाड़कर- बुहारकर ठीक कर रखता हूँ, जहाँ मेरा प्रियतम आये और मुझसे प्यार करे।

सफाई! सफाई!! सफाई!!! भीतर की सफाई, पानी की सफाई, कपड़ों की सफाई और आप वो आदमी हैं कि गायत्री माता का कपड़ा जाने कौन जन्म का बिछा हुआ है। रोली- चंदन के निशान और धब्बे न जाने कब से पड़े हुए हैं। वहाँ जहाँ आपका भगवान बैठा हुआ है, वहाँ सब मकड़ी के जाले भरे पड़े हैं और धूल ढेरों पड़ी हुई है। रोज हनुमान चालीसा पढ़ जाते हैं और धूपबत्ती जला जाते हैं, धूपबत्ती की राख सब हनुमान जी के सिर पर पड़ी हुई है। आप साफ करते हैं क्या? नहीं।

मैं और मेरा भगवान एक ही पलंग पर एक कम्बल में लिपटकर साथ- साथ सोते हैं। मैं वह आदमी हूँ जिसकी थाली में दो आदमी साथ- साथ खाना खाते हैं। मैं भगवान के मुँह में निवाला देता रहता हूँ और भगवान मेरे मुँह में निवाला देता रहता है। ये मेरी उपासना करने की विधियाँ हैं, जिनके द्वारा मेरा मन भक्ति- भावना से ओतप्रोत बन सका।

बच्चों जैसा कोमल और छोटा

मित्रो! जब में भगवान के पास जाता हूँ, तब ऐसा कोमल और ऐसा छोटा हो जाता हूँ मानो एक साल का बालक हूँ। आप भी एक वर्ष का बालक बन करके जाया कीजिए। एक वर्ष का बालक मतलब? मतलब यह कि जिसकीे कामनाएँ नहीं, तृष्णाएँ नहीं, वासनाएँ नहीं, माँगना नहीं। उससे कहें तेरा ब्याह कर दें, तो अम्मा से पूछता है कि ब्याह क्या होता है। चल बेटे! तेरे नाम बैंक में रुपया जमा कर दें? तो बच्चा कहता है कि बैंक क्या होता है? माँ कहती है बेटा तेरे लिए रेशमी कपड़ा बनवा दूँ? तो बालक विचार करने लगता है कि रेशमी कपड़ा किसे कहते हैं? कुछ पता नहीं, कुछ नहीं केवल माता का प्यार।

एक वर्ष का बालक अर्थात् निष्काम, कामना रहित। कामना सहित उपासनाएँ वेश्यावृत्ति हैं। इम्तहान में पास हो जायें तो हनुमान जी आपको सवा रुपये का प्रसाद चढ़ायेंगे, यह वेश्यावृत्ति है। आप हमारा ये काम कर दीजिये तो हम आपका यह काम कर देंगे, यह दुकानदारी है। भगवान के साथ दुकानदारी नहीं की जा सकती। भगवान के पास लेनदेन के मोह के साथ नहीं जाया जा सकता। भगवान के दरवाजे पर भिखारी के तरीके से नहीं जाया जा सकता। भिखारी के तरीके से नहीं, उसके प्रेमी के रूप में हम जायें।

मैं अपने भगवान के पास प्रेमी के रूप में जाया करता हूँ। मैं माँगने लगा होता आपके तरीके से, जैसा कि आप सब मुझसे माँगने आते हैं, यदि यही मनःस्थिति मेरी रही होती तो मेरा गुरु आपके गुरु की अपेक्षा एक लाख गुना जबरजस्त है। मैंने माँगा होता कि मैं तीस रुपये महीने के किराये के मकान में रहता हूँ और मुझे तीस हजार रुपये की आमदनी वाला महल चाहिए तो मुझे तीस हजार रुपये महीना का किराया की आमदनी देने वाली कोठी मिल गयी होती, क्योंकि आपका गुरु जितना समर्थ है, उसकी अपेक्षा मेरा गुरु एक लाख गुना समर्थ है। पर मैं माँगता हूँ क्या? मेरी बेइज्जती हो जायेगी, जिस दिन मैं माँगने लगूँगा तब।

बस प्यार और प्रकाश चाहिए

मैं बड़ा स्वाभिमानी हूँ। जो चीजें मिली हैं वो काफी हैं मेरे लिए। जानवर बिना कपड़े के जिंदा रह सकते हैं और मैं कपड़े समेत क्या जिंदा नहीं रह सकता? जानवर पेड़ की छाया में गुजारा कर सकते हैं, क्या मैं किराये के मकान में गुजारा नहीं कर सकता? जानवर आधा दिन भूखा रह करके कठिनाई के दिनों में गुजारा कर सकते हैं, क्या मैं दोनों वख्त की रोटियाँ खाकर गुजारा नहीं कर सकता? मुझे संतोषी होना चाहिए और मैं संतोषी हूँ।

मैं भगवान के पास जब कभी माँगने के लिए गया, एक ही चीज माँगने के लिए गया- मुझे तेरा प्यार चाहिए, मुझे प्रकाश चाहिए, मुझे मानवता चाहिए, मुझे शांति चाहिए, बस। यदि माँगना ही होगा तो मैं अपनी भुजाओं से माँगूँगा। मेरी कलाइयाँ बहुत मजबूत हैं। बूढ़ा हूँ तो क्या, मेरी लात बड़ी मजबूत है। मैं जमीन में लात मारूँगा तो पानी निकाल लूँगा। मैं घास छीलूँगा और अपना पेट भरने के लिए रोटियाँ कमा लाऊँगा।

चौबीस लक्ष्य के पुरश्चरण न जाने कैसे कर डाले। अब मेरे लिए नामुमकिन है। अब तो मुझे उपासना में मेरा प्रियतम दिखाई पड़ता है और मैं लिपट पड़ता हूँ दीपक और पतंगे के तरीके से। मैं लिपट पड़ता हूँ उस प्रकाश पुंज के साथ। मैं चातक- पपीहा के तरीके से अपने प्रियतम को पुकारता रहता हूँ। जिस तरीके से दो अभिन्न मित्र मिलकर एक हो जाते हैं, मैं अनुभव करता रहता हूँ कि मेरा भगवान मेरे पास है। वह मुझे अपनी शक्ति देता है, अपना प्यार देता है और प्रकाश देता है। मैं उसके बदले में अपनी सारी की सारी श्रद्धा उड़ेल देता हूँ भगवान के चरणों पर। पति अपने स्त्री को प्यार देता है और स्त्री अपना सारा का सारा शरीर, मन, आत्मा, प्यार जो कुछ भी है, सब का सब पति के चरणों पर उड़ेल देती है। मैं उड़ेलता रहता हूँ और पाता रहता हूँ। उपासना में यही खेल- खिलौने किया करता हूँ। आप कहेंगे भजन क्या करते हैं? कितनी माला जप करते हैं? भगवान जाने कितनी माला जप करता हूँ। जाने कितनी माला होती हैं, कितनी नहीं होती। प्यार और मोहब्बत में डूबा रहता हूँ।

सफलता का रहस्य
मेरी मनोभूमि


मित्रो यह मेरी मानसिक अवस्था है, जिसके द्वारा राम का नाम और गायत्री मंत्र मुझे फल देता रहता है। आपकी मनोभूमियाँ उजड़ी हुई और बिखरी हुई हैं। न जाने कहाँ से कहाँ आपका मन भागता फिरता है। दौलत में मन, औरत में मन। पाँच मिनट के लिए भगवान के पास गये और आपका मन नहीं लगा, क्योंकि मुहब्बत नहीं की। प्यार का, मन लगाने का और कोई तरीका नहीं है।

हमारा मन नहीं लगता, गुरुजी कोई उपाय बता दीजिए। बेटा! क्या तरकीब बता दूँ? एक ही तरकीब है कि भगवान को अपना सबसे ज्यादा प्यारा मित्र मान, उसके साथ मिलने की, अपना प्यार उसके ऊपर उड़ेल देने की अनुभूति का विकास अपने अंतःकरण में कर।

प्यार तेरे जीवन में कभी रहा नहीं। तूने कभी अपनी औरत को प्यार किया नहीं। औरत को प्यार किया होता तो मजा आता। तुझे मालूम पड़ता कि गंगा और यमुना मिलकर एक संगम बन गया। बच्चों को प्यार किया होता तो मालूम पड़ता कि बाल गोपाल- श्रीकृष्ण भगवान बच्चों के रूप में तेरी छाती पर खेलते हैं। माँ को प्यार किया होता तो तुझे मालूम पड़ता कि गायत्री माता की तसवीर तो एक ओर रखी है, लेकिन मेरी जिंदा माता मेरे घर में बैठी है, मजा आता। प्यार के अभाव में प्यासे मनुष्य, भूखे मनुष्य, तृषित मनुष्य, कलुषित मनुष्य बाकी सारी की सारी चीजें तेरे पास रहीं, बस प्यार तेरे पास रहा नहीं।

बहुत प्यार के स्रोत मैंने उगा लिये हैं, यही मेरी उपासना की विधियाँ हैं। मैं चाहता हूँ कि आपके भीतर भी ये विधियाँ विकसित होती चली जायें। आप प्यार करने वाले इंसान कहलाएँ। आप अपनी औरत को प्यार करें, अपनी माँ को प्यार करें, अपने बच्चों को प्यार करें। अपनी जिंदगी को प्यार करें, अपने परलोक को प्यार करें, अपनी समाज- संस्कृति को प्यार करें, अपने भगवान को प्यार करें और अपनी आत्मा को प्यार करें। ये प्यार आपके भीतर जैसे- जैसे विकसित होता हुआ चला जायेगा, मेरे ही तरीके से आपकी आत्मा विकसित होती चली जायेगी और आपके भीतर प्रकाश आता चला जायेगा। मेरी पूजा करने की विधि और मन को टस से मस न होने देने की विधि का सार और रहस्य कदाचित आपकी समझ में आये। यदि आ सकता हो तो आप इसी विधि से उपासना किया कीजिए।


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