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युग पुरुषों के कथन
आदि शंकराचार्य जी ने नारी के कामिनी रमणी भोग्या स्वरूप को घातक बताते हुए उससे दूर रहने की सलाह दी है, तो नारी के मातृ स्वरूप की वन्दना करते उसके अनुग्रह की कामना या छल भी है! आदि शक्ति भगवती की वन्दना करते हुए उन्होंने लिखा है-
विद्या समस्तास्तव दोवि भेदाः, स्त्रिया समस्ताः संकपा जगत्सु।
अर्थात् के देवि सारी विद्याओं तथा संसार की सारी नारियों में आपका ही रूप आसित होता है। इसलिए उन्होंने नारिमात्र के प्रति पवित्र दृष्टि तथा सम्मानजनक व्यवहार आवश्यक कहा है।
ठाकुर रामकृष्ण परमहंस अपनी धर्मपत्नि को भी माँ के रूप में देखते और सम्मानित करते रहे। वे अपने अंतरंग शिष्यों, प्रशंसकों से कहते थे कि एक बार मेरी अवज्ञा भले ही करना देना किन्तु माँ शारदामणि की अवज्ञा कभी मत करना।
युगऋषि (पं. श्री आचार्य श्रीराम शर्मा ) भी अपनी धर्मपत्नी माता भगवती देवी शर्मा के प्रति इसी प्रकार के भाव व्यक्त करते रहे हैं। उन्होंने ईश्वरीय योजना के नाते २१वी सदी उज्ज्वल भविष्य की घोषणा के साथ २१वी सदी को नारी सदी भी कहा है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि वर्तमान विसंगतियों-विपत्तियों के पीछे मनुष्य की संवेदना के क्षेत्र में नारी नर से श्रेष्ठ-वरिष्ठ है। इसलिए श्रेष्ठ युग को उत्कृष्ट भावसंवेदना के आधार पर लाने के लिए नारी को प्रधानता दी जायेगी।
उक्त सब महापुरुषों के कथन और नवरात्रि जैसे पर्व पर कन्याओं के पूजन की परम्परा निबाहते हुए भी नारी की अवमानना, उपेक्षा और प्रताड़ना की घटनाएँ हर क्षेत्र में हर वर्ग में घटित होती रहती हैं। पुरुष प्रधान समाज जाने-अनजाने ऐसे अपराध करता जा रहा है जिसकी प्रतिक्रिया झेलना सारे समाज को भारी पड़ जायेगा। अच्छा हो कि नारी को उसकी गरिमा काबोध कराने, तदनुसार उसके मनोबल और कौशल को विकसित करने तथा पुरुषों को अपनी मर्यादा में रहते हुए नारी को सम्मान और विकास के अवसर देने के लिए हर संभव प्रयास किए जायें।
अपसंस्कृति के अभिशाप
समाज को शर्मसार, कलंकित करने वाली सारी घटनाओं के पीछे अपसंस्कृति के अभिशापों को सक्रिय देखा जा सकता है। पश्चिम से उभरी सुख-सुविधाओं की चकाचौंध में अपने महान सांस्कृतिक मूल्यों को भुला बैठे। पश्चिम के भी गुणों का अनुकरण करने लगे। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप नारी के जननी, माता, पालनकर्त्री स्वरूपा को भुला दिया गया और उसके रमणी-कामिनी, भोग्या स्वरूपों को उभारा उकसाया जाने लगा। फलस्वरूप नारी नारीत्व लोहे और सोने की जंजीरों में जकड़ दिया गया।
नारी को हीन मानकर उसे पर्दे पर अन्य प्रतिबंधों के नाते विकसित न होने देने की मान्यता लोहे की जंजीरों की तरह है। इसी तरह उसको सजा सँवारकर प्रदर्शन-मनोरंजन, भोग की गुड़िया मानने की रीति-नीति सोने की जंजीरों की तरह है। दोनों ही उसके जननी, सृजन-पालन करने वाले गरिमामय स्वरूप को कुंठित करने वाली सिद्ध हो रही है। युगऋषि ने नारी को इन दोनों जंजीरों से मुक्ति दिलाने की जरूरत बतलाई है। पुरुष समाज को भी आत्महीनता की ग्रंथियों को त्याग कर अपने तेजस्वी स्वरूप में उभरना होगा।
उपयुक्त उपचार जरूरी है
स्वामी विवेकानंद जी से किसी पुरुष ने पूछा कि ‘‘मैं नारी जागरण के लिए कुछ करना चाहता हूँ क्या करूँ? स्वामी जी ने उत्तर दिया कि ‘यदि वास्तव में नारी जागरण चाहते हों तो उसे स्वयं विकसित होने के अवसर दो उसके मार्ग में बाधक मत बनो।’’
युगऋषि पू. गुरुदेव इस संदर्भ में पुरुषों से कहते रहे हैं कि नारी को विकसित करना चाहते हो तो अपनी माता, बहिन, पत्नी, बेटी आदि पर पड़ने वाले रसोईदारिन, चौकी दानि के भार को कम करो। उसे आगे चलने दो, पीछे रहकर उसका सहयोग करो। उन्होंने नारा दिया-
‘‘नारी का सम्मान जहाँ, संस्कृति का उत्थान वहाँ है।’’ इस दृष्टि से नारी के स्वाभिमान करने के प्रयास सभी को सहयोग पूर्वक करने होंगे। इसके लिए समझदारों को प्रेरणा प्रशिक्षण देकर तथा दुष्टों को दण्ड और दमन की सटीक व्यवस्था बनाकर रास्ते पर लाना होगा।
ज्योति को ज्वाला बनाये |
अभी पिछले दिनों नारी प्रताड़ना की जघन्य घटनाओं के कारण इस दिशा में कुछ करने की जागृति उमड़ी है ज्योति जागी है। इस उमंग रुपी ज्योति को प्रचण्ड क्रान्ति की ज्वाला के रूप में विकसित करना जरूरी है। देवी प्रेरणा इस दिशा में काम कर रही है, देखना यह कि कितनी जागृत आत्माएँ इस क्रय में अग्रदूत की सृजनशीलता भूमिका में आगे आती है।
जो हो रहा है वह अच्छा तो है, किन्तु नाकाफी है। इसके साथ और भी बहुत कुछ किया जाना है। इसके लिए भी १. प्रचार २. प्रदर्शन ३. संघर्ष के तीनों मोर्चों पर चुस्ती-मुस्तैदी दिखानी होगी। जैसे-
. कड़े कानून बनाये जाने का दबाव तो जारी करवा दी जाये कानूनों को सही ढंग से लागू करने की जागरूकता तथा कर्त्तव्य परायणता जगानी होगी।
. साथ ही नारी उत्पीड़न करने वालों को लम्बे समय तक प्रताड़ना मिले ऐसी व्यवस्था बनानी होगी। उनके आधार कार्ड पर बलात्कार लिखा जाने उनके चेहरे पर कोई स्थाई चिह्न गुदना या ........जैसे बना देने जैसे प्रयोगों पर भी सोचा जा सकता है। उसके लिए सामाजिक बहिष्कार जैसे क्रम भी निर्धारित किए जा सकते हैं।
. फिल्मों, टी.वी. सीरियलों तथा विज्ञापनों में नारी को रमणी-भोग्या रूप में प्रस्तुत किए जाने वाले दृश्यों पर रोक लगायी जा सके तो अच्छा है।
. नई पीढ़ी को नारी के प्रति पवित्र दृष्टि रखने के लाभों को समझाते हुए उसके लिए प्रेरित प्रशिक्षित करना होगा।
. इस कार्य में नारी की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण होगी। उसकी अपनी संख्या ५० प्रतिशत है। बच्चें १५ प्रतिशत यदि उसी के प्रभाव में पलते हैं। इसलिए नारी के स्वाभिमानक जगाने के लिए लोहे और सोने की जंजीरों को तोड़ने के लिए नारी समाज को भी तैयार करना-कराना जरूरी है।
. नारी को नारी के प्रति संवेदनशील होना होगा। ऐसा होने सास, बहू, देवरानी बिठानी, ननद भाभी कैली तकरार घटेगी सहयोग बढ़ेगा। इसके फलस्वरूप नारी शक्ति संगठित होकर नारी उत्कर्ष के लिए सक्रिय दे सकेगी।
. पढ़ी लिखी नारियों को चाहिए कि वे अपने परिवार की जिम्मेदारियों के साथ ही नारी जागरण के मोर्चें पर भी आगे बढ़े। हर पुरुष किसी नारी की गोद में पला और देख रेख में बढ़ा होता है। उन्हें संस्कार देने की क्षमता नारी के पुरुषों से अधिक है। इस कौशल को विकसित और प्रयुक्त करने से अनगढ़ सीढ़ी को सुगढ़ बनाया जा सकता है।
युग निर्माण परिवार स्वयं तो इस दिशा में प्रयास कर रही/रहा है। अन्य संगठनों को भी इसके लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। अपनी प्रामाणिकता बढ़ायें और प्रभाव क्षेत्र को प्रामाणिक बनाने में सहयोग दे तो बात बहुत जल्दी बनेगा।


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