गुरुकार्य के लिए समय लगायें
  • आप हमारे बच्चे हैं। हम जो कर रहे हैं, वह आप करें, यही हमारी इच्छा है। हम जिस परंपरा पर चले हैं, आपको भी उसी पर चलाना चाहिए। ... आपको भी जितना बन पड़े, त्याग करना चाहिए, परंतु बीच में काम बंद करके भागना ठीक नहीं है। ढीला-पोला होने में फायदा नहीं है। शानदार आदमी एकनिष्ठ रहते हैं, एक जैसे रहते हैं। ...आपको मुस्तैदी का जीवन जीना चाहिए। आप वैसा बैल न बनें, जो रास्ते में बैठ जाता है। आप एक निष्ठा से, एक श्रद्धा से काम करें तथा लगे रहें।

देवियो, भाइयो! 
आज हमारे ध्यान के दो केन्द्र हैं-एक तो भगवान्, जो हमें धक्का देता रहता है और आगे बढ़ाता रहता है। दूसरे भगवान आप लोग हैं, जो हमारे कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। हमारी बातों को मानते हैं तथा श्रम करते हैं, हमारे क्रियाकलापों में शामिल रहते हैं। आज हमारी इच्छा हुई कि आपसे अपने मन की बातें, जी की बातें करें। 

मित्रो! हमने अब तक बहुत काम किया है। अभी हमारे सामने तो आपको पता नहीं चलता है, परंतु बाद में पता चलेगा कि हमने काफी काम किया है। न केवल हिंदुस्तान में, वरन् उसके बाहर भी बहुत काम किया है। हमने ठोस काम किया है। ‘हम’ से मतलब आप सबके द्वारा है। आप हमारे मित्र हैं, सहयोगी हैं। हम एवं आपने मिलकर बहुत बड़ा काम किया है। एकाकी भगवान के लिए भी यह संभव नहीं था। भगवान राम ने समुद्र को पाटने एवं रावण पर विजय प्राप्त करने का कार्य क्या अकेले ही किया था? भगवान कृष्ण ने महाभारत, यानी ग्रेटर इंडिया का कार्य क्या स्वयं अकेले किया था? नहीं यह संभव नहीं था। 


यह संबंध अनायास नहीं है
जगत की परंपरा को जाग्रत् एवं जीवंत बनाए रखने के लिए, भगवान के कार्य को पूरा करने के लिए हमने भी एक संगठन बनाया। आप हमारे साथी एवं सहयोगी हैं। आपको हमने बहुत मुश्किल से ढूँढ़ा है। आपने तो सोचा होगा कि हम पत्रिका के ग्राहक बन गए और गुरुजी के हो गए। नहीं बेटे! हमने आपको हिलाया है, झकझोरा है, प्रेरणा दी है, तब आप आए हैं। आपको हमने बुलाया है। बहुत से बाबा जी आते हैं और न जाने क्या-क्या बातें बतला जाते हैं। उनकी बातों को कोई सुनता भी नहीं है, परंतु हमारे बारे में आपने ऐसा नहीं किया। आपने हमारी बातों को ध्यान से सुना, हृदय में धारण किया। इसके साथ ही उसे क्रिया में परिणत करने के लिए भी अपना समय, श्रम व अक्ल लगाने के लिए तैयार हो गए और लगे रहे हैं। यह बहुत प्रसन्नता की बात है। यह हमारे प्रयास के साथ ही साथ आपके पूर्व जन्म के संस्कार का ही फल है।

मित्रो! शेर का एक बच्चा भेड़ों के बीच में चला गया था और वह अपने स्वरूप को भूल गया था। जब एक शेर ने उसे उसकी छाया दिखाई और उसका स्वरूप दिखलाया, तो वह जाग्रत् हो गया। हम एवं आप दोनों सिंह हैं। भेड़ वह होता है, जो चौबीस घंटे पेट और प्रजनन की बात सोचता है। आप इससे आगे हैं। हमने आपको ढूँढ़ निकाला है। हमने गहरे पानी में डुबकी लगायी है और मोतियों को चुन-चुनकर इकट्ठा किया है। आपको बड़ी मुश्किल से जोड़ पाए हैं हम। आपको हमसे जुड़ा रहना चाहिए।


समझदार बनें, हमारी परंपरा निभायें
साथियो! आज दुनिया के सामने एक बड़ी मुसीबत आ गयी है। उसके समाधान के लिए हमें बड़ा काम करना है। यह प्रयास भगीरथ के गंगा अवतरण एवं दधीचि की हड्डी से वज्र बनाने से कम नहीं है, जो असुरता को समाप्त करने के लिए आवश्यक है। हमारा प्रयास उसी स्तर का है। इस महान कार्य को जब हम कर रहे हैं, तो आपको हमारा सहयोगी एवं सहभागी अवश्य बनना चाहिए। आपको बनना ही पड़ेगा, चाहे आप मन से करें या बिना मन से। आप हमारे बच्चे हैं। हम जो कर रहे हैं, वह आप करें, यही हमारी इच्छा है। हम जिस परंपरा पर चले हैं, आपको भी उसी पर चलाना चाहिए।

अभी तो आप इस समय जब उत्साह आता है, तो हमारे साथ चलने लगते हैं और जब उत्साह कम हो जाता है, तो मगर की तरह पानी में जा बैठते हैं। यह पानी के बुलबुले की तरह से काम करना क्या कोई शान की बात है? अगर चलना है, तो फिर चलना ही है, रुकना नहीं। यही शान की बात होगी। हमारे गुरु ने हमारी शान रखी, हम आपकी शान रखेंगे। आप हमारी जिंदगी को देखिए, गाँधी जी की जिंदगी को देखिए, अन्य संतों की जिंदगी को देखिए, जिन्होंने जो संकल्प लिया, जो लक्ष्य बनाया, उसके लिए जीवन के अंत तक डटे रहे। बीच-बीच में वह भागे नहीं हैं। 

आपको भी जितना बन पड़े, त्याग करना चाहिए, परंतु बीच में काम बंद करके भागना ठीक नहीं है। ढीला-पोला होने में फायदा नहीं है। शानदार आदमी एकनिष्ठ रहते हैं, एक जैसे रहते हैं। आपसे भी जितना बने, मिशन के लिए त्याग करें, महाकाल के लिए त्याग करें। हमारा एक ही निवेदन है कि नवयुग लाने के लिए जनमानस का परिष्कार करना है। इसके लिए आपको बढ़-चढ़कर काम करना है। आपको मुस्तैदी का जीवन जीना चाहिए। आप वैसा बैल न बनें, जो रास्ते में बैठ जाता है। आप एक निष्ठा से, एक श्रद्धा से काम करें तथा लगे रहें।


समारोहों की सार्थकता
एक बात और आपसे कहनी है कि अब हम पचहत्तर साल के हो गये।  जब आदमी पचहत्तर वर्ष का हो जाता है, तो यह हीरक जयंती मनाई जाती है; सौ साल में शताब्दी मनाई जाती है। हमारे पास ढेरों पत्र आए हैं कि गुरुजी हम (हीरक जयंती वर्ष में) आपका जुलूस, निकालेंगे, प्रदर्शनी लगाएँगे। इसी तरह न जाने क्या-क्या पत्र आए हैं। हमने विचार किया कि हमें इस हीरक जयंती वर्ष में क्या करना चाहिए? 

हमने जुलूस आदि के लिए लोगों को मना कर दिया। इस धूमधड़ाका से कोई लाभ नहीं होगा। हमने एक सौ आठ व एक हजार आठ कुंडीय तक यज्ञ किए, जो शानदार थे। लेकिन देखा कि उसके दो साल बाद लोग उसे भूल गए। इस तरह इस धूमधड़ाके से कोई लाभ नहीं होता है। अब इससे मेरा मन भर गया है। अभी हम इन्हें नहीं मनाना चाहते। 

अगर आप हमारी इच्छा के अनुसार मनाना चाहते हैं, तो हमारी एक इच्छा रह गयी है। हमने गायत्री शक्तिपीठें बनाई थीं। उस काम से भी अब मेरा मन भर गया है। अब वे केवल मंदिर बनकर रह गए हैं। वहाँ जागृति की-जनजागरण की कोई बात नहीं है। वहाँ एक देवी बैठी है, जिसकी सुबह-शाम आरती हो जाती है। हो सकता है, अगले दिनों रचनात्मक क्रिया-कलाप चलें, उनका भी कायाकल्प हो, पर अभी तो सब देखकर हमें बहुत दुःख होता है कि जनता के बहुत सारे पैसों को बर्बाद कर दिया गया व परिणाम स्वल्प ही हाथ आया।


 हमें हीरे चाहिए
हमारा मन है कि हमारे पास दस हजार ऐसे व्यक्ति हों, जिनकी हम माला पहनें, जो हमारे साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलें। हमारी व उनकी एक आवाज हो, एक दिशा हो तथा लगातार मिलकर लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें। उन्हें किसी बात का डर या भय न हो। इस वर्ष हमारी इच्छा दस हजार हीरे का हार पहनने की है। जब हमारा जुलूस निकले, तो जनता यह समझे कि यह बहुत मालदार आदमी है, बहुत शानदार आदमी है, वजनदार आदमी है।

यहाँ दस हजार हीरों से मेरा मतलब है कि दस हजार ऐसे साथी हो जाएँ, जो नियमित रूप से हमारे कार्य, अर्थात् मिशन के लिए समयदान दे सकें। पैसे की इच्छा नहीं है। इसका मतलब यह है कि हमारे हाथ-पाँव मजबूत हो जाएँ। हाथ-पाँव से हमारा मतलब आपसे है। आप हमारे चलते-फिरते हाड़-मांस के शक्तिपीठ बन जाएँ। हमने जो उम्मीद शक्तिपीठों से लगाई थी, वह आप स्वयं पूरा करना शुरू कर दें। 

हमें ज्ञानरथ के लिए नौकर नहीं चाहिए। हमें इसके लिए आपका समयदान चाहिए। विवेकानंद, गाँधी, विनोबा का काम स्वयं उन्होंने किया। इसी तरह यह काम आपको करने होंगे। आपके पास चौबीस घंटे हैं। आठ घंटे काम के लिए, सात घंटे सोने के लिए, पाँच घंटे नित्य काम के लिए रख लें, तो भी आपके पास चार घंटे बचते हैं। आपको नियमित रूप से चार घंटे नित्य मिशन के लिए, समाज के लिए, भगवान् के लिए देना चाहिए।

समयदान आज की अनिवार्य आवश्यकता है। इसके लिए आपको समय निकालना ही चाहिए। मान लीजिए अगर आप बीमार हो जाएँ, तो आपका समय बचेगा कि नहीं? आप यह समझें कि आप चार घंटे नित्य बीमार हो जाते हैं। आप कहेंगे कि गुरुजी हम किस काम के लिए समय दें, गुरुजी को पंखा झलने के लिए, पैर दबाने के लिए? नहीं बेटे! हमें तो जनजागृति के लिए समय चाहिए। आप समय की माँग को पूरा कीजिए। इस माँग से हमारा कान फटा जा रहा है, दिमाग पर बोझ-सा धरा है। यह कार्य अकेले से पूरा नहीं हो सकता है। इस कार्य हेतु आपसे समयदान चाहता हूँ। आपके चार घंटे से हमारा काम बन जाएगा। दो घंटे से कम में तो बन ही नहीं सकता। अगर इतना न बने, तो फिर आप वही हल्ला-गुल्ला करने वाले, जुलूस निकालने वाले बने रहेंगे।

हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र से, एकलव्य ने द्रोणाचार्य से, शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास से, विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा ली थी तथा गुरुदक्षिणा चुकायी थी। आपको भी गुरु-दक्षिणा के रूप में समय देना चाहिए। जनजागृति के लिए आपका समयदान हीरे-मोतियों से, जवाहरात से भी बढ़कर है। इससे कम में युगपरिवर्तन का लक्ष्य पूरा नहीं होगा। आप हमारे बेटे हैं, साथी-सहयोगी हैं। आपसे यही अपेक्षा है, आशा है।

प. पू. गुरुदेव द्वारा १९८५ में श्रावणी की पूर्व संध्या पर दियेगये प्रवचन के सम्पादित अंश


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