•  उसे अपने जीवनोद्देश्य से जोड़ें, उनके जीवनोद्देश्य को समझें-अपनाएँ, उस हेतु पात्रता बढ़ाएँ अनुदान पायें
‘बोधमयं नित्यं शंकर रूपिणं’

संत तुलसीदास जी ने श्रीरामचरित मानस में गुरु वंदना करते हुए लिखा है-
वन्दे बोधमयं नित्यं, गुरुं शंकर रूपिणं।
अर्थात - बोधमय नित्य शंकर रूपी गुरु को नमन है। बोधमय और शंकर रूप के बीच में ‘नित्यं’ शब्द हैं। वह स्वतंत्र भी है और दोनों विशेषणों से जुड़ा भी है। गुरुचेतना बोध करने-कराने वाली है, नित्य अर्थात् हमेशा है तथा शंकर-कल्याण रूप है। अथवा गुरुचेतना सदैव बोधमय और सदैव शिवरूप है। गुरुचेतना से जुड़ने से बोधतत्व और शिवत्व की प्राप्ति होनी ही चाहिए। इससे कम में गुरु से जुड़ने का उद्देश्य सिद्ध ही नहीं होता।

बोध किसका करना है? ईश्वर (परमात्मा), जीव (स्वयं) और प्रकृति (विश्व) तीनों का बोध आवश्यक है। ईश्वरबोध का सूत्र है ‘उपासना’, जीवबोध का सूत्र है ‘जीवन-साधना’ और प्रकृतिबोध, विश्वबोध का सूत्र है ‘लोक आराधना’। बोध का आधार है श्रद्धा। कहा भी है ‘श्रद्धयासत्यमाप्यते’। अर्थात् श्रद्धा से ही सत्य की प्राप्ति या उसका बोध होता है।
ईश्वर ने मनुष्य को विभिन्न प्रकार के बोध, अहसास करने-कराने के लिए विभिन्न प्रकार के माध्यम-उपकरण दिए हैं। पाँचों तत्व (आकाश, वायु, अग्रि, जल और पृथ्वी) के बोध के लिए पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) हैं। पाँचों तत्वों का बोध इन्हीं तन्मात्राओं के आधार पर होता है। इनका बोध करने के लिए मनुष्य को पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ दी गयी हैं। शब्दबोध के लिए ‘कान’, स्पर्शबोध के लिए ‘त्वचा’, रूपबोध के लिए ‘नेत्र’, रसबोध के लिए ‘जीभ’ तथा गंधबोध के लिए ‘नाक’ का जाग्रत् होना जरूरी है। इसी प्रकार चेतन के, दिव्यता के बोध के लिए श्रद्धा का जाग्रत् होना जरूरी होता है। श्रद्धा जितनी विकसित-जाग्रत् होगी, दिव्य-चैतन्य का बोध भी उसी अनुपात में होगा। गुरु के बोधमय स्वरूप को खोलने के लिए शिष्य का श्रद्धामय होना जरूरी है।

शिवत्व ः-कल्याणकारी के अपने अनुशासन होते हैं। वस्तु अथवा शक्ति अपने आप में भली-बुरी, शिव-अशिव नहीं होती। उनका अनुशासित उपयोग उन्हें शुभ-शिव सिद्ध करता है और अनगढ़ अनुशासन रहित उपयोग उन्हें अशुभ-अशिव बना देता है। पानी का सदुपयोग उसे जीवनदायी सिद्ध करता है। अग्रि का, ऊर्जा का अनुशासित उपयोग अनेक साधन-सुविधाएँ देता है, जबकि इन दोनों का अनगढ़ उपयोग हानिकारक-विनाशक सिद्ध होता है। इसलिए गुरुचेतना से शिवत्व की प्राप्ति के लिए साधक को उनके द्वारा निर्धारित अनुशासनों को धारण करना होता है। जीवन के सभी क्षेत्रों में उनका पालन करना होता है।

नित्य ः- बोध के लिए श्रद्धा तथा शिवत्व के लिए अनुशासन, यह दोनों नित्य, सदैव होने चाहिए। कभी-कभी से शुरूआत हो सकती है, किन्तु नित्यता, नियमितता के बिना समुचित लाभ नहीं मिलते। स्वास्थ्य के लिए भोजन और व्यायाम के अभ्यास को नियमित बनाना पड़ता है। 

ध्यान रहे कि साधक के जीवन में श्रद्धा की कमी से भटकाव और अनुशासन की कमी से अटकाव आते हैं। श्रद्धा की कमी से बोध स्पष्ट नहीं होता, भ्रम पैदा होते हैं और भटकाव आ जाता है। अनुशासनों का पालन न कर पाने से साधक चाहते हुए भी वाञ्छित कार्य करने में समर्थ नहीं होता तथा प्रगति में अटकाव आ जाता है। इसलिए गुरुसत्ता का समुचित लाभ उठाते रहने के लिए साधकों को श्रद्धा और अनुशासनों में निरंतर निखार लाते रहने का साधना-पुरुषार्थ करते ही रहना चाहिए।


श्रद्धा की सक्रियता
गुरुदेव ने कहा, ‘‘समय आ गया है कि श्रद्धा को सक्रियता में बदला जाय।’’ हम सक्रिय हैं, यह पर्याप्त नहीं। सक्रिय तो स्वार्थी, अपराधी, आतंकवादी भी होते हैं। देखना होगा कि हमारी सक्रियता किस प्रवृत्ति से उभरी है। हीन कर्म करने वाले अथवा सामान्य कर्म करने वाले संसारियों की सक्रियता के पीछे प्रेरक प्रवृत्ति के रूप में भय, लोभ, मोह, अहंकार आदि को ही कार्यरत देखा जा सकता है। जीवन में सक्रियता का आधार श्रद्धा बनती है तो कर्म में आदर्शवादिता, श्रेष्ठता का समावेश अनायास ही होने लगता है। सभी क्षेत्रों के महापुरुषों, सत्पुरुषों के जीवन में श्रद्धा की सक्रियता के तथ्य को परखा और पाया जा सकता है। श्रद्धा की सक्रियता ही उनके जीवन में महानता ला देती है।

श्रद्धा - अर्थात् उत्कृष्टता से असीम प्यार। सामान्य रूप से हमारा प्यार अपने लौकिक संसाधनों से, सुविधाओं-स्वार्थों से होता है। इसके कारण उनको पाने का लोभ, उनके बने रहने का मोह, उनके छूट जाने का भय अथवा उनके होने का अहंकार ही हमारी सक्रियताओं के पीछे दिखाई देता है। जब श्रद्धा सक्रिय होती है तो फिर गुरु या ईश्वर से लौकिक संसाधनों, सुविधाओं की प्राप्ति या स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रार्थना की जगह उनकी उत्कृष्टता के वरण के लिए उमंगें उभरने लगती हैं।

लोभ, मोह, भय आदि से उभरी सक्रियता सामान्य ईंधन की आग की तरह अपनी सामान्य जरूरतें पूरी करने, शरीर सेकने, भोजन पकाने जितनी ऊर्जा दे पाती है। धातुओं को गलाने, ढालने की तरह प्रवृत्तियों की गलाई-ढलाई के लिए तेज आंच देने वाले ईंधनों की तरह श्रद्धा की सक्रियता की जरूरत पड़ती है।

गुरुपर्व पर हर साधक को आत्मसमीक्षा करनी चाहिए कि हमारी सक्रियता के पीछे अभी कौन-कौन सी प्रवृत्तियाँ काम कर रही हैं। जब श्रद्धा की सक्रियता उभरने लगेगी, तब जीवन परिवर्तन-युग परिवर्तन के योग्य ऊर्जा का अनुभव अपने अंदर होने लगेगा।


उद्देश्य-युग परिवर्तन
युगऋषि के अवतरण का उद्देश्य युग परिवर्तन की ईश्वरीय योजना को मूर्तरूप देना रहा है। इस स्तर की अवतारी आत्माओं के साथ उनके साथ जुड़ी विभिन्न स्तर की जीवात्माएँ भी उनके उद्देश्य की पूर्ति में भागीदारी के लिए रीछ-वानर, ग्वालबालों की तरह भेजी या लाई जाती हैं। गुरुवर के साथ स्नेह बन्धनों में बँधे सभी व्यक्तियों को भी यह समझना चाहिए कि उन सबके आने या भेजे जाने का उद्देश्य भी ईश्वरीय योजना में अपनी सुनिश्चित भागीदारी निभाना है।

हम सब अपने मनों में गुरुकार्य के लिए उत्साह और व्याकुलता अनुभव करते हैं। किन्तु उस दिशा में जितना करना चाहिए, उतना कर नहीं पाते, कहीं भटक या अटक जाते हैं।

भटकाव ः- जब सांसारिक कार्यों के दबाव में हम युगधर्म के लिए समयदान नहीं कर पाते, तब वह एक तरह का भटकाव ही है। जब हमारा साधना-पुरुषार्थ युगनिर्माण की अपेक्षा श्रेय, प्रतिष्ठा, स्वार्थसाधन जैसे उद्देश्यों को लक्ष्य करके होता है, तब भी वह भटकाव ही कहा जा सकता है। श्रद्धा, अर्थात् युगनिर्माण के श्रेष्ठ उद्देश्य या गुरुकार्य के प्रति लगाव की कमी से ही ऐसा होता है। 

हम बड़े-बड़े आयोजन करते हैं, किन्तु उनका मूल्यांकन व्यक्ति निर्माण और संगठन विस्तार की कसौटी पर नहीं करते तो यह भी एक भटकाव ही है। हम दुनियाँ की वाहवाही भले ही लूट लें, लेकिन युगऋषि को ऐसे आयोजनों से कोई प्रसन्नता नहीं होती।

गुरुपर्व के प्रसंग में हमें अपनी श्रद्धा को इतना परिष्कृत करना चाहिए कि अपने साधना-पुरुषार्थ की दिशाधारा गड़बड़ाये नहीं।

अटकाव ः- अटकाव के भी अनेक रूप उभरते रहते हैं। जब हम समय निकालते हैं या निकाल सकते हैं, किन्तु उसे कहाँ लगायें यह बात समझ में नहीं आती तो अटकाव आता है। हम संगठन बढ़ाना अथवा नये क्षेत्रों-व्यक्तियों तक युगनिर्माण के उद्देश्यों और उमंगों को पहुँचाना चाहते हुए भी वैसा कर नहीं पाते, तब भी अटकाव आता है। हम कई आन्दोलनों को गति देना चाहते हैं, पर दे नहीं पाते तो भी अटके रह जाते हैं।
यह सारे अटकाव इसीलिए आते हैं कि हम या तो कार्य का उचित मार्गखोज नहीं पाते अथवा उस पर आगे बढ़ने में कमजोरी अनुभव करते हैं। यह कमजोरियाँ-समर्थ सत्ता से जुड़े नैष्ठिकों में क्यों आती हैं? गुरुवर ने लिखा है, ‘‘समर्थसत्ता ही शक्ति-साधन देती है तो फिर कमी क्यों?’’

इस कमी का कारण होती है साधक की पात्रता की कमी। पात्र छोटा हो तो देने वाला कैसे दे? पात्रता बढ़ाने के लिए मार्गदर्शक सत्ता के द्वारा बताए गये अनुशासनों का पालन नियमित रूप से और लम्बे समय तक करना होता है। उसमें कमी रह जाने पर मार्ग पहचानने और कठिनाइयों को जीतते हुए आगे बढ़ने का कौशल भी कमजोर रह जाता है। इसी प्रकार लम्बे अभ्यास की कमी होने से लम्बे मार्ग पर बिना थके, बिना रुके बढ़ते रहने का दमखम, प्रचण्ड पुरुषार्थी क्षमता में भी कमी रह जाती है। इसलिए इष्ट कार्य या तो शुरू ही नहीं हो पाते अथवा बीच में ही रुक जाते हैं।

युग परिवर्तन के उद्देश्य को अपनाने वाले को लक्ष्य के अनुरूप अपनी श्रद्धा, साधना तथा अनुशासित जीवन साधना को निरंतर प्रखर बनाते रहना जरूरी होता है। कार्य के अनुसार पात्रता का, क्षमता का विकास और पात्रता, क्षमता के अनुरूप कार्य का संकल्प करते रहना युग परिवर्तन की साधना के लिए अनिवार्य है। हम सब को गुरुपर्व के संदर्भ में अपनी स्वयं की और अपने संगठन की आत्मसमीक्षा करते हुए अपनी श्रद्धा और अनुशासन क्षमता को विकसित करने, कार्य के अनुरूप समर्थ-सशक्त बनाते रहने के संकल्प करने चाहिए।


सोचें, समझें, करें
युगऋषि ने युग परिवर्तन के लिए दो माध्यम अपनाये-१. गायत्री २. यज्ञ। हमें ढर्रे से निकलकर व्यापक रूप से इनका उपयोग करना होगा। इन्हीं के माध्यम से ईश्वरीय योजना में भागीदारी पाना और सौभाग्य कमाना संभव होगा।

गायत्री ः- अर्थात् सद्भाव, सद्विवेकयुक्त चिन्तन और प्रार्थना। इससे सबको जोड़ना है। विभिन्न सम्प्रदायों, वर्गो तथा रुचियों वाले नर-नारियों को इस दिशा में सूचित, प्रेरित और सक्रिय करना है। जिन वर्गों, सम्प्रदायों को गायत्री मंत्र से परहेज नहीं उन्हें गायत्री मंत्र जपने के लिए प्रेरित करना है। जिन्हें गायत्री मंत्र से परहेज है, उन्हें ‘सबके लिए सद्बुद्धि, सबके लिए उज्ज्वल भविष्य’ की भावना के साथ अपने किसी इष्ट मंत्र या नाम का जप करने के लिए प्रेरित करना है। इसके लिए प्रखर जन-अभियान चलाया जाना जरूरी है। इस हेतु केवल गायत्री मंत्र अथवा उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना वाले आकर्षक चित्र तैयार कर दिए गये हैं। उन्हें किसी के भी पूजा स्थल पर चित्र-स्थापना के रूप में सहज ही स्थापित किया-कराया जा सकता है। अगले चरण में गायत्री, अर्थात्  प्राणों को प्रखर बनाने वाले जीवन सूत्रों का बोध और प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

यज्ञ ः- अर्थात् लोकहित की भावना के साथ प्रयास और कार्य करना। कुण्डीय यज्ञों, दीपयज्ञों में जिन्हें रुचि है, उन्हें उनके माध्यम से परमार्थ कार्यों के लिए प्रयास और कार्य करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना है। जिन्हें यज्ञ या दीपयज्ञों में रुचि नहीं, उन्हें सीधे सेवा-आराधना यज्ञों के लिए प्रेरित किया जाना है। यज्ञकर्म का आधार है- ‘इदं न मम’ के भाव से परमार्थ कार्य करना। अपने सभी आन्दोलन इसी यज्ञीय भाव के साथ चलाये जाने हैं। इसके लिए सृजनसाधकों को अपनी योग्यता और क्षमता का विकास करना है।

मनुष्यमात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थनारूप में गायत्री तथा उज्ज्वल भविष्य लाने वाले निःस्वार्थ पुरुषार्थ रूप यज्ञ की साधना में जन-जन को प्रवृत्त करने का अभियान चलाया जाना है। इसके लिए अपनी पात्रता बढ़ानी है। जितनी पात्रता बढ़ेगी, उसी अनुपात में युग देवता के उदार अनुदानों का लाभ उठाया जा सकेगा।

गायत्री और यज्ञ का सर्वसुलभ, सबके लिए रुचिकर स्वरूप सभी तक पहुँचाने, उसके लिए उन्हें प्रेरित-प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी युगऋषि ने युग साधकों पर डाली है। इसे तो करना ही है। इसी के साथ मनुष्यमात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य लाने में समर्थ युगऋषि की एक इकाई साकार करने तथा उज्ज्वल चरित्र बनाते हुए उज्ज्वल भविष्य तक पहुँचाने वाले सूत्रों को व्यवहार में लाने के लिए भी सभी को उल्लसित करना है। युगशक्ति का प्रतीक है ‘लाल मशाल का व्याख्या युक्त चित्र’। और युगसूत्र है ‘युग निर्माण सत्संकल्प के 18 वाक्य’। इन्हें भी घर-घर में स्थापित करने, हर मन तक पहुँचाने की साधना की जानी है। इसके लिए भी अपने आप को श्रद्धा, साधना तथा अनुशासित जीवन साधना द्वारा सक्षम बनाना है। 

गुरुपूर्णिमा के संदर्भ में हर परिजन से यही निवेदन है कि गुरुसत्ता के जीवनोद्देश्य को अपने जीवनोद्देश्य में शामिल करें तथा उसे सफल बनाने के लिए श्रद्धायुक्त पुरुषार्थ की साधना को अधिक प्रखर-प्रभावी बनायें। 


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