प्रचार-प्रदर्शन के सम्मोहन से उबरें, युगऋषि के सृजन तंत्र के अंग, ढलाई के साँचे बनें

युगऋषि की जन्म शताब्दी ने हमें एक नई दिशा और नई ऊर्जा दी है। जो कर चुके उसकी आत्म प्रशस्ति के सम्मोहन को तोडक़र आत्म समीक्षा करते हुए-अगले चरण के दायित्वों को समझते हुए उन्हें पूरा करने का संकल्प जगाया। मिशन ने थोड़ा रुककर संतुलन बनाया और युगऋषि के संकेतों के अनुसार संशोधित दिशाधारा में प्रवृत्त हो उठा।


उस क्रम में ग्रामतीर्थ जागरण यात्राओं का क्रम चल पड़ा है। उस क्षेत्र की बढ़ती माँग की आपूर्ति के लिए परिव्राजक प्रशिक्षण के देशव्यापी प्रयोग प्रारंभ किए जा रहे हैं। युगऋषि अपने निकटस्थ परिजनों से यही उम्मीद करते रहे है कि उनमें व्यक्तियों के मर्मस्थल को छूने, उनके व्यक्तित्वों को परिष्कृत करने की क्षमता विकसित हो। उनकी उम्मीद के अनुरूप स्वयं को बनाने, सिद्ध करने की साधना हमें करनी ही चाहिए।


उनकी अपेक्षाएँ

वाङ्गमय क्र.68 पृष्ठ 1.13-14-15 पर दिए उनके उदाहरण देखें ....।
‘‘हमने जीवन भर व्यक्तियों के मर्म को छुआ है और अपना ब्राह्मण स्वरूप खोलकर रख दिया है। नतीजा यह हुआ कि हमारे साथ अनगिनत आदमी जुड़े। तुम यदि सही अर्थों में जुड़े हो, तो अपना भीतरवाला हिस्सा भी लोकसेवी का बना लो और समाज के लिए कुछ कर डालने का संकल्प ले डालो।’’

इसके लिए स्वयं को विकसित करने के लिए उन्होंने सही अर्थों में समर्पण की साधना करने को कहा है। समर्पण की साधना कैसी होती है, इस संदर्भ में वे कहते हैं—

‘‘अपनी इच्छा, बड़प्पन, कामना, स्वाभिमान को गलाने का नाम समर्पण है, जिसे करने को मैंने कहा है। इसकी अनन्त फलश्रुतियाँ हैं।’’

‘‘अपनी इमेज विनम्र से विनम्र बनाओ, मैनेजर की, इन्चार्ज की, बॉस की नहीं, बल्कि स्वयंसेवक की। जो जितना बड़ा है, वह उतना ही विनम्र है, महान बनने के उतने ही बीजांकुर उसमें हैं। तुम सबमें वे मौजूद हैं।’’

यदि वे युग परिवर्तन के महान संकल्प से आये हैं, तो हम सबको भी उसी क्रम में अपनी छोटी-छोटी भूमिकाएँ निभाने के लिए लाया गया है। इसलिए युगक्रान्ति के लिए आवश्यक बीजांकुर हमारे भीतर होने की बात उन्होंने की है। इसके लिए हमें अपने क्षुद्र अहं को उनके विराट् व्यक्तित्व में समर्पित करना होगा। वे हमें अपने विराट् व्यक्तित्व का एक प्रामाणिक अंग बनाना चाहते हैं कहते हैं—

अंग बनें : ‘‘हमारी एक महत्त्वाकांक्षा है कि हम सहस्र भुजा वाले, सहस्रशीर्ष पुरुष बनना चाहते हैं। तुम सब हमारी भुजा बन जाओ, हमारे अंग बन जाओ, यह हमारे मन की बात है। अब यह तुम पर निर्भर है कि तुम कितने हमारे बनते हो?


पति-पत्नी की तरह गुरु एवं शिष्य की आत्मा में भी परस्पर विवाह होता है। दोनों एक-दूसरे से घुलकर एक हो जाते हैं। समर्पण का अर्थ होता है-दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो। अपनी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षा को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षा में विलीन कर दो। जिसका अहं जिन्दा है वह वैश्या है। जिसका अहं मिट गया, वह पतिव्रता है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिष्क बनने के लिए तुम अपने अहं को कितना गला पाते हो। इसके लिए निरहंकारी बनो। स्वाभिमानी तो होना चाहिए, पर निरहंकारी बनकर। ’’


इसके लिए वे वाणी की साधना का सूत्र देते हैं। कहते हैं—

‘‘वाणी सही है तो तुम्हारा व्यक्ति जीवन्त हो जायेगा, बोलने लगेगा और सामने वाले को अपना बना लेगा। अपनी विनम्रता, दूसरों का सम्मान और बोलने में मिठास, यही व्यक्तित्व के प्रमुख हथियार हैं। इनका सही उपयोग करेंगे, तो व्यक्तित्व वजनदार बनेगा।’’
सृजन तंत्र के घटक : उन्होंने जीवनभर अपनत्व के आधार पर सृजन साधना की है। वे हमें अपने सृजनतंत्र के प्रामाणिक घटक बनाना चाहते हैं। कहते हैं—
‘‘तुम्हीं को कुम्हार और तुम्हीं को चाक बनना है। हमने तो अनगढ़ सोना-चाँदी ढेरों लाकर रखवा दिया है। तुम्हीं को साँचा बनकर सही सिक्के ढालना है। साँचा सही होगा तो सिक्के भी ठीक आकार के बनेंगे।’’

उन्होंने समय की समीक्षा करते हुए समझाया है कि आज तमाम पार्टियों-संगठनों के पास लेबर हैं-कार्यकर्ता नहीं। कार्यकर्ता वो, जो अपने जैसे कई बना दे। वे कहते हैं—

‘‘हमारी यह दिली ख्वाहिश है कि हम अपने पीछे ऐसे ही कार्यकर्ता छोडक़र जायें। इन सभी को सही अर्थों में डाई, एक साँचा बनना पड़ेगा। यह मुश्किल काम है। श्रेष्ठ कार्यकर्ता ‘डाई’ बनता है। तुम सबसे यही अपेक्षा है कि तुम भी अपने गुरु की तरह एक श्रेष्ठ साँचा बनोगे। ’’

यह साधना प्रारंभ हो गयी है

देर से ही सही, यह तथ्य अब युगऋषि के नैष्ठिक परिजनों की समझ में आने लगा है। फलस्वरूप इस दिशा में केन्द्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर पर ईमानदार प्रयास किये जाने लगे हैं। ढाले जाने वाले सोने-चाँदी, स्टील आदि की कीमत करोड़ों रुपये होती है। उसे ढालने, प्रामाणिक रूप देने वाली ‘डाई’ भले ही कम कीमत की होती है, पर वह करोड़ों के माल को प्रामाणिक करार देने में समर्थ होती है। हममें से प्राणवानों को साँचा, डाई बनने की साधना करनी होगी।

क्षेत्रीय स्तर पर भी प्राणवान भाई-बहनों ने यह क्रम प्रारम्भ कर दिया है। कहीं बाल-संस्कार शालाओं के संचालन के लिए छोटे-छोटे प्रशिक्षण चलाये जा रहे हैं, कहीं आन्दोलनों को गति देने के लिए प्राण ऊर्जा फूँकी जा रही है। युवा मंडल भी इस दिशा में सक्रिय हो उठे हैं। फलस्वरूप मैदानों और पहाडिय़ों को हरीतिमा से ढक देनेे से लेकर नदियों, जलाशयों की शुद्धि-पुष्टि के प्रयास जगह-जगह उभरने लगे हैं।

केन्द्र, शांतिकुंज हरिद्वार में प्रशिक्षण सत्रों का क्रम लम्बे समय से चला आ रहा है। अत: उसे विकेन्द्रित करके क्षेत्रों में फैला देने के लिए तथा शांतिकुंज के प्रशिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने के प्रयास प्रारंभ कर दिए गये है।

क्षेत्रीय प्रशिक्षण शृंखला

क्षेत्र में प्रामाणिक परिव्राजकों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। शक्तिपीठों-प्रज्ञापीठों को जाग्रत्ï करने के लिए तो उनकी जरूरत है ही, नये क्षेत्रों में जन-जन को युगधर्म में प्रकृत करने के लिए भी वहाँ जमकर कार्य करने वालों की आवश्यकता है। उनकी संख्या भी अधिक चाहिए तथा विकसित होते हुए अभियान को गति देने योग्य गुणवत्ता भी बेहतर चाहिए।

इस दृष्टि से सभी प्रान्तों की संगठित इकाइयों जोन-उपजोन से चुने हुए 250 से अधिक कार्यकत्र्ताओं की एक कार्यशाला दि. 11 से 20 जुलाई तक चलाई गई। उसमें से ऐसे प्रशिक्षकों को चुना और निखारा गया है, जो अपने क्षेत्र में अथवा नये क्षेत्र में जाकर परिव्राजक प्रशिक्षण के सत्र चला सकें।


प्रशिक्षण चलाने के लिए प्रशिक्षकों के अतिरिक्त ऐसे समर्थ स्थान भी चाहिए, जहाँ कम से कम 30 से लेकर 100 प्रशिक्षार्थियों के लिए एक मासीय क्षेत्रीय प्रशिक्षण चलाये जा सकें। इसके लिए लगभग 40 समर्थ पीठों को चुना गया है। प्रथम चरण में 14 स्थानों से शुभारम्भ किया जा रहा है। ये प्रशिक्षण इसी वर्ष 1 सितम्बर से 29 सितम्बर तक चलेंगे। नीचे दिये  गये पैनल में चुने हुए स्थानों के नाम-सम्पर्क सूत्रों के साथ प्रशिक्षार्थियों के लिए नियम-मार्गदर्शन भी दिए गये हैं।


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