बदलते युग की विशिष्ट आत्माएँ
आज हम युगसंधि की वेला में अवस्थित हैं। अनीति, अविवेक, अहंता, दुर्बुद्धि और दुर्भावना भरा अंधकार अब तिरोधान होने को है। इसके विपरीत समता, ममता, एकता एवं शुचिता के आधार पर खड़ा होने वाला सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का प्रभात अब उदय होने को ही है। 

अन्धकार मर रहा है और प्रकाश उग रहा है। इस तथ्य को हमें हजार बार स्वीकार करना चाहिए और अपने अन्तरंग की गहराई तक इस वास्तविकता को जान लेना चाहिए कि आप लोग जो युग निर्माण परिवार के सदस्य हैं, वस्तुुतः विशिष्ट आत्माएँ हैं और इस अति महत्त्वपूर्ण सन्धिवेला में उनका विशिष्ट कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व है। वह समय आ गया जबकि पेट और प्रजनन की, वासना और तृष्णा की कभी न सुलझने वाली समस्याओं को एक कोने पर रखकर हमें सर्वतोभावेन ईश्वरीय प्रयोजन की, युग की पुकार की पूर्ति करने के लिए जुट जाना चाहिए।

योगक्षेमं वहाम्यहम्
हम अपने परिजनों के अन्तःकरणों तक अपने अन्तरंग की आग की एक-एक चिनगारी के रूप में यह प्रेरणा पहुँचाना चाहते हैं कि वे अब तक का जीवन कैसा ही क्यों न जी चुके हों, भावी जीवन लम्पट और लोभी की तरह न जियें। हमें प्रभु समर्पित जीवन जीना चाहिए। इस युग-परिवर्तन की सन्धिवेला में तो हममें से प्रत्येक को अपने चिन्तन और कर्तृत्व को इसी दिशा में नियोजित कर देना चाहिए। 

जाग्रत् आत्माओं के अपने परिवार के किसी सदस्य के मन में यह नास्तिक भाव नहीं आने देना चाहिए कि यदि आप लोकमंगल के लिए कुछ करने लगे तो आपकी निर्वाह-व्यवस्था टूट जाएगी। विश्वास रखा जाए कि जो ईश्वर स्वार्थियों, पापियों, निन्दकों और नास्तिकों को भी पेट भरता है, वह उसी के कार्यों में संलग्न आस्थावानों को भूखा-नंगा क्यों रहने देगा? 

आकाश-पाताल छूने वाली तृष्णा की पूर्ति तो कौन कर सका है, पर निर्वाह सुनिश्चित है। लोक-मंगल की दिशा में कदम बढ़ाने वालों को भगवान के ‘योगक्षेमंं वहाम्यहम’् पर भरोसा और पक्का विश्वास करते हुए युग की पुकार को पूरा करने के लिए अब तक जो किया जाता रहा है, उससे बहुत अधिक करने का साहस समेटना चाहिए।

हम चैन से बैठने नहीं देंगे
वासना-तृष्णा की कीचड़ से निकालकर हमें परिजनों को महानता के पथ पर अग्रसर और ईश्वरीय इच्छा की पूर्ति के लिए नियोजित करना है। जिन्हें हम प्यार करते हैं, उन्हें सहज छोड़ने वाले नहीं हैं। वे अनुभव करेंगे कि कोई अदृश्य सत्ता उन्हें ऊपर उठने और आगे बढ़ने के लिए कहती-सुनती ही नहीं, नोचती-झकझोरती भी है। हमें चैन से जीवन भर बैठने नहीं दिया गया। चैन और आराम की बात, दौलत और अमीरी की बात को अपने आदर्शवादी परिवार को सोचना बन्द कर देना चाहिए और वह करना चाहिए जिसके लिए आज हमें हर दिशा से आमन्त्रित किया जा रहा है।

आज की अगणित उलझनों और विपत्तियों का एकमात्र कारण मानवीय दुर्बुद्धि है। उसका निराकरण किए बिना सुख-सुविधा के पहाड़ खड़े कर देने पर भी दुःख-दारिद्रय से पिण्ड छूटने वाला नहीं है। हमें विश्वमानव की दुर्दशा को दूर करने और धरती पर स्वर्ग अवतरित करने के ही सपने आते रहे हैं। इसी व्यथित मनःस्थिति के साथ हमने लम्बा जीवन जी लिया। जिन्हें हमारे भी वियोग की सचमुच व्यथा है, उनसे अनुरोध है कि वे हमारी अन्तर्व्यथा को समझें और अपने अन्तरंग में हमारी भावव्यथा को भी स्थान दे सकें तो उनकी वियोग-व्यथा को और अधिक महत्व दिया जा सकेगा और हमारे प्रति उनके ममत्व को और भी अधिक गहरा एवं सच्चा माना जा सकेगा। 

दिव्य पथ का अनुगमन
हमारे मार्गदर्शक ने हमें इसी एक प्रयोजन के लिए भेजा और अनेक प्रकार के दिखाई देने वाले कार्य इसी एक उद्देश्य के लिए कराए। उस दिव्यसत्ता के आदेशों का पालन करने में हमने अपने अस्तित्व का एक-एक कण समर्पित किया है और इस समर्पण के मूल्य पर दिव्य अनुकम्पा का अजस्र वरदान पाया है। जिस दिव्य-प्रेरणा का अनुगमन हम करते रहे हैं, हमारे सहचरों को भी उसी पथ पर चलना चाहिए। अभीष्ट प्रयोजनों के लिए हमारे मार्गदर्शक का प्रकाश, तप एवं सहयोग हमें अजस्र रूप से मिलता रहा है। परिजनों को भी वैसी ही उपलब्धियाँ मिलते रहने का हम आश्वासन देते हैं।

पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि मूल्य हमारे भावी अनुदान का भी चुकाना होगा। जिस दिव्य पथ में हमारा रोम-रोम आहुति रूप में जला-गला है, उसके लिए कुछ तो त्याग आप सबको भी करना चाहिए। ज्ञान-यज्ञ के लिए एक घण्टा समय और दस पैसे की माँग न्यूनतम थी, लोभ और मोह की कीचड़ में से मुँह निकाल कर प्रकाश की किरणें देखने भर के लिए वह आरम्भिक प्रयोग था। हमें उतने तक ही सीमित होकर नहीं बैठ जाना चाहिए, वरन् प्रयत्न यह करना चाहिए कि उमंग, उत्साह एवं अनुदान की मात्रा निरंतर बढ़ती चली जाए और उसका अंत हमारे जैसे सर्वमेध, सर्व-समर्पण में हो। पूर्णता का उपहार प्राप्त करने के लिए पूर्ण समर्पण की शर्त पूरी करनी पड़ती है, इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाये उतना ही अच्छा है। 

सर्वोत्तम साधना-ज्ञानयज्ञ
तत्त्वदर्शी समय-समय पर युग-परिस्थितियों के अनुरूप साधनाक्रम का निर्माण और निर्देश करते रहे हैं। आज की परिस्थितियों में लोकमानस का भावनात्मक नवनिर्माण, जिसे हम अक्सर ज्ञानयज्ञ अथवा विचार क्रांति के नाम से प्रस्तुत करते रहते हैं, सर्वोत्तम युग साधना है। परिजनों को अपना समस्त मनोयोग इसी प्रयोजन के लिए प्रयुक्त और नियुक्त करना चाहिए और विश्वास करना चाहिए कि आज की स्थिति में ईश्वर की प्रसन्नता, आत्मा की शांति और समय की चुनौती को स्वीकार करने के लिए इससे अच्छी साधना नहीं हो सकती। अपने समय, श्रम, मन-मस्तिष्क, प्रभाव एवं पैसे का जितना अधिक उपयोग ज्ञानयज्ञ के लिए कर सकना संभव हो, उसे करना चाहिए और उस प्रयत्न को आत्मिक साधना का सर्वश्रेष्ठ माध्यम मान लेना चाहिए। 

परमार्थ-प्रयोजन को साथ लिए बिना आत्मिक प्रगति का स्वप्न देखना निरर्थक है। यही कारण है कि संसार के महान साधकों ने अपने जीवन का अधिकांश भाग लोकमंगल के लिए समर्पित किया है। यह तथ्य समझ ही लेना चाहिए कि ईश्वर को खुशामद या रिश्वत देकर बहकाया जा सकना असंभव है। भक्तों की पंक्ति में खड़ा होना हो तो सेवा-साधना और उदार परमार्थ का अनुदान प्रस्तुत करना होगा। वह जितना ही बड़ा होगा, आत्मबल बढ़ने से लेकर ईश्वर का अनुग्रह मिलने तक का प्रयोजन उसी अनुपात में पूरा होता चला जाएगा। 

हमारे और  हमारे गुरुदेव तथा हमारे जीवन के बीच अतिघनिष्ठ और अतिमधुर संबंधों का आधार एक ही रहा कि हम अपने आप को भूले रहे। यह पता ही नहीं चला कि हम अभी जीवित हैं या मृत, हमारी भी कोई इच्छा-आवश्यकता है या नहीं। ईश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर, ईश्वर की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता मानकर कठिनाइयों, आपत्तियों को अपनी परीक्षा का सौभाग्य मानकर निरंतर अपने इष्टदेव के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचते रहे। यही समर्पण साधना का प्राण है।


गुरु के वाक्यों पर विश्वास रख हम विवेक और वैराग्य का जीवन जी सकें, यही आशीष इस गुरुपर्व पर हम पूज्यपाद गुरुसत्ता से माँगें।

जिन्हें हम प्यार करते हैं, उन्हें सहज छोड़ने वाले नहीं हैं। वे अनुभव करेंगे कि कोई अदृश्य सत्ता उन्हें ऊपर उठने और आगे बढ़ने के लिए कहती-सुनती ही नहीं, नोचती-झकझोरती भी है।  जब भी आप शान्त चित्त होंगे और हमें उमंग उठेगी, तब आपके अंतर्मन में यही कुछ उठता दिखाई देगा-

  1. बहुमूल्य मनुष्य जीवन पेट और प्रजनन के ही लिए खर्च कर डालने की वर्तमान रीति-नीति मूर्खतापूर्ण है।
  2. निर्वाह भर के लिए कमाओ और परिवार को स्वावलम्बी, सुसंस्कारी बनाने तक ही जिम्मेदारी निभाओ। समर्थ बेटों-पोतों के लिए दौलत मत छोड़ो, अन्यथा वे उस हराम की कमाई को खाकर अपना सर्वनाश करेंगे।
  3. यह युगसंधि है, नवयुग द्रुतगति से दौड़ा चला आ रहा है, उसके सहयोगी बनो। अपनी विचारणा, आकांक्षा एवं गतिविधियों को एकता, समता, शुचिता और ममता के आधार पर बनने जा रहे वातावरण के अनुरूप ढालो। 
  4. परमार्थ के नाम पर विज्ञापनबाजी मत करो, विचार-विकृति से उत्पन्न अगणित समस्याओं और संतापों का समाधान करने के लए ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया को युगधर्म मानो और अपनी समस्त प्रतिभा उसी दिशा में नियोजित करो। 
  5. संयमी बनो, सादगी अपनाओ, सत्प्रवृत्तियों और सद्भावनाओं का सहारा लो, जिससे प्रभुसमर्पित जीवन जीना सम्भव हो सके। 
  6. नित्यकर्म की तरह उपासना जारी रखो, पर अपना सारा समय जीवन साधना में लगा दो, जिसमें शरीर, मन और धन को न्यूनतम मात्रा में अपने लिए और अधिकतम भाग विश्वमानव के लिए समर्पित करना होता है। 
  7. परमार्थ पर बढ़ते हुए आंतरिक दुर्बलता से, तथाकथित मित्र-कुटुम्बियों के विरोध-उपहास से डरो मत, वरन महानता के पथ पर साहसपूर्वक कदम उठाओ। साथ में आत्मा, आचार्य जी, उनके गुरुदेव और भगवान मौजूद हैं। वे डूबने न देंगे, वरन कर्त्तव्य की सरिता में कूदने वालो आपको यह चारों मल्लाह खेकर पार करेंगे। 
  8. युगसंधि की यह वेला, कर्त्तव्य की यह चुनौती हजारों-लाखों वर्षों बाद इस बार आयी है। इस अनुपम अवसर को गँवाया जाना न चाहिए और कुछ करके दिखाना चाहिए। 
  9. एक सफल जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति (परम पूज्य गुरुदेव) के जीवन-साधनाक्रम की प्रतिक्रिया एवं उपलब्धियों को समझा जाना चाहिए और उसके अनुकरण की हिम्मत करनी चाहिए। 
  10. आप चैन से बैठ नहीं सकेंगे, लोभ और मोह का वासनाग्रस्त जीवन जिएँगे तो आत्मा की ही नहीं, आचार्य जी की प्रताड़ना आप पर बरसेगी और उस बेचैनी में बड़प्पन की अभिलाषा आप के लिए दिन-रात जलाने वाली बनकर रहेगी। ऐसी दशा में कंटकाकीर्ण मार्ग को छोड़कर श्रेय पथ को अपनाना ही उचित है। 

पू. गुरुदेव द्वारा २० जून, १९७१ की वेला में मथुरा में दिये गये विदाई उद्बोधन के कुछ अंश




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